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काशी में है कुतुब मीनार से भी ऊंचा शिवालय, ज्ञान और मुक्ति देते हैं नर्मदेश्वर बाणलिंग

Sat, 20 Jul 2019 07:23 PM IST
Sayali Maurya न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Published by: Sayali Maurya Updated Sat, 20 Jul 2019 07:23 PM IST
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BHU kashi vishwanath temple heighted from Qutub minar in varanasi
बीएचयू स्थित विश्वनाथ मंदिर - फोटो : अमर उजाला

महामना की बगिया (BHU) स्थित काशी विश्वनाथ मंदिर का वैभव हर किसी को बरबस ही आकर्षित करता है। सर्वविद्या की राजधानी में सिद्ध योगी ने इस मंदिर की आधारशिला रखी थी। कुतुब मीनार से भी ऊंचा यह मंदिर श्वेत संगमरमर से बना हुआ है। सालों के परिश्रम के बाद इस मंदिर का वर्तमान स्वरूप सामने आया। नर्मदेश्वर बाणलिंग के रूप में स्थापित बाबा विश्वनाथ यहां अभय, ज्ञान और मुक्ति प्रदान करते हैं।

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भारत कला भवन के निदेशक प्रो. अजय कुमार सिंह का कहना है कि कम लोग ही जानते होंगे कि देश का सबसे ऊंचा मंदिर काशी हिंदू विश्वविद्यालय में है। यह मंदिर दिल्ली के ऐतिहासिक कुतुब मीनार से भी 13 फीट ऊंचा है। कुतुब मीनार की ऊंचाई 239 फीट है।
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भारत की समस्त वास्तुशैलियों द्रविण, नागर और बेसर को समेटे हुए काशी विश्वनाथ मंदिर की स्थापना के पीछे महामना मदन मोहल मालवीय जी की सोच थी कि शिक्षा का एक ऐसा मंदिर हो जहां पढ़ने वाले सुबह उठकर गंगा स्नान करें और फिर यहीं परिसर में बाबा विश्वनाथ का दर्शन-पूजन भी करें।
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इसी सोच के साथ उन्होंने गंगा किनारे विश्वविद्यालय निर्माण की 1916 में आधारशिला रखी। उसी साल बाढ़ आई और स्थापना स्थल तक गंगा का जल पहुंच गया। मालवीय जी ने यह कह कर जमीन को छोड़ दिया कि यह गंगा मैया की जमीन है।

तपस्वी को मनाने में लग गए थे चार साल

BHU kashi vishwanath temple heighted from Qutub minar in varanasi

बीएचयू के ज्योतिषाचार्य पं. गणेश प्रसाद मिश्र का कहना है कि बीएचयू के निर्माण के दौरान ही महामना ने भव्य विश्वनाथ मंदिर के निर्माण के बारे में सोचा था। वह मंदिर की आधारशिला किसी तपस्वी से रखवाना चाहते थे। उन्हें जीके स्वामी कृष्णम नामक तपस्वी की जानकारी मिली।

स्वामी कृष्णम उस वक्त गंगोत्री ग्लेशियर से 150 कोस दूर कांड गुफा में तप कर रहे थे। मालवीय जी ने 1927 में गोस्वामी गणेशदास के हाथों विश्वविद्यालय परिसर में विश्वनाथ मंदिर के शिलान्यास के लिए न्योता भेजा।

तपस्वी कृष्णम को मनाने में गणेशदास को चार साल लग गए। 11 मार्च 1931 को स्वामी कृष्णम के हाथों मंदिर का शिलान्यास हुआ। इसके बाद मंदिर का निर्माण कार्य शुरू हुआ। दुर्भाग्य से मंदिर का निर्माण मालवीय जी के जीवन काल में पूरा ना हो सका। 

भव्य मंदिर के निर्माण के लिए उद्योगपति जुगल किशोर बिड़ला ने मालवीय जी से वादा किया था और उसको पूरा किया। 1954 तक शिखर को छोड़कर मंदिर का निर्माण कार्य पूरा हो गया।

17 फरवरी 1958 को महाशिवरात्रि के दिन मंदिर के गर्भगृह में नर्मदेश्वर बाणलिंग की प्राण प्रतिष्ठा के साथ भगवान विश्वनाथ की स्थापना मंदिर में हो गई। मंदिर के शिखर पर सफेद संगमरमर लगाया गया और उनके ऊपर एक स्वर्ण कलश स्थापित है। इस स्वर्णकलश की ऊंचाई 10 फीट है। भारत कला भवन में मंदिर का ब्लू प्रिंट सुरक्षित है।

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