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श्रावणी फुहार: सावन आते ही गूंजने लगती है बनारस और मिर्जापुर की कजरी

Sun, 19 Aug 2018 03:51 PM IST
आलोक कुमार त्रिपाठी , अमर उजाला, वाराणसी
आलोक कुमार त्रिपाठी , अमर उजाला, वाराणसी Updated Sun, 19 Aug 2018 03:51 PM IST
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Banarasi and mirzapuri kajari special in sawan
डॉ. मानसी मजूमदार - फोटो : अमर उजाला
सावन में मेंहदी हथेलियों पर सजने लगती हैं। सावन का नाम सुनते ही मन हरा-भरा हो जाता है। उमंगें मन में हिलोरें भरने लगती हैं और बावरा मन हिंडोलों में झूलने को बेकरार हो जाता है। चारों तरफ हरे रंग में रंगी हुई प्रकृति हर किसी के मन को भाती है। प्रेम और विरह को जो भाव बरसात की बूंदों के साथ मन में बादलों के तरह उमड़ता और घुमड़ता है उसका वर्णन संगीत के माध्यम से ही किया जा सकता है। कजरी और ठुमरी के बोल होठों पर सजते हैं तो सुनने वाला भी संगीत की बरसात में भीगने से बच नहीं पाता है। यह कहना है कि बनारस घराने की गायिका डॉ. मानसी मजूमदार का।
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विरह और प्रेम की विविधताओं से भरी हुई है कजरी

 राधे झूलन पधारो झुकि आए बदरा, साजे सकल शृंगार दियो नैना कजरा, पहिरो पचरंग सारी ऊपर श्याम चदरा...। राग पीलू में कजरी की यह बंदिश जब फिजाओं में तैरती है तो राधा और कृष्ण का आध्यात्मिक प्रेम सभी के मन में जीवंत हो उठता है। राधा जी झूला झूलने आती हैं तो बादल भी उन्हें झुलाने के लिए खुद चले आते हैं। संपूर्ण शृंगार और आंखों में काजल सजाए राधा ने पांच रंगों वाली साड़ी पहनी हैं ऊपर से श्याम रूपी चादर भी ओढ़ ली है। ठुमरी साम्राज्ञी अप्पाजी की शिष्या डॉ. मजूमदार कहती हैं कि पूरब अंग की गायकी मेें विरह की और प्रेम की कजरी की जो विविधताएं हैं वह अद्भुत हैं। 
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सावन के महीने में प्रियतम के न होने पर विरहिनी को न बादलों की उमड़-घुमड़ सुहाती है न सावन की फुहारें। वह काली घटाओं को देख तड़प उठती है। यह हाल हर नायिका का होता है। वह बताती हैं कि सावन में ही स्त्रियों के सारे भाव जीवंत हो उठते हैं। वृंदावन में जहां ठाकुर जी का फूल बंगला सजाकर ब्रजनारियां कजरी, झूला के पद गाने लगती हैं, वहीं बनारस-मिर्जापुर में अलग मिजाज की कजरी शुरू हो जाती है। वह घटाओं के घिरने पर राग गौड़ मल्हार में कजरी की बंदिश का उदाहरण देती है- देख युगल छबि सावन लागे/इत घन उत घन श्याम लाडिलो...। इसमें नायिका कह रही है कि राधा और श्याम की युगल छवि को देखकर सावन लग गया है। एक तरफ काले बादल हैं तो दूसरी तरफ लाडले श्याम हैं।
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वह कहती हैं कि सावन आ जाए तो पिया घर नहीं हों तो सब किरकिरा हो जाता है। मन में गीत उठने लगता है- सावन की रुत आई रे सजनिया प्रीतम घर नहिं आए...। लगता है कि जैसे सावन में वर्षा होते ही मयूर नाचने लगता है, वैसे ही स्त्रियां उमंग से भर जाती हैं। वर्षा की बूंदों की ठंडक को महसूस करने के लिए वह नायिका प्रीतम को अपने पास चाहती हैं। इसके लिए तड़प उठती है। अकेलापन और भी उन्हें सहा नहीं जाता। प्रसंग मिलता है-बारी उमर और रैन अंधेरी रहि रहि जिया घबराए...।

सावन की फुहारों में नायिका अपने प्रियतम को याद कर कहती है कि काली अंधेरी रात में घनघोर वर्षा हो रही है और उसका मन घबरा रहा है। वह कहती है कि उसके पिया होते तो वह इस आनंद को साझा कर पाती। इसके बाद वह राग मेघ में किराना घराने की बंदिश गुनगुनाती हैं- छाई घटा घनघोर चहुंओर गरज गरज चमकत बिजुरिया....। राग प्रकृति से सीधा वह रिश्ता जोड़ने की ताकत रखते हैं जो उस पुरवाई को, घटाओं को और बिजुरी की चमक को महसूस करा सके।


शास्त्रीय संगीत की परंपरा को बढ़ा रही हैं आगे
वाराणसी। ठुमरी साम्राज्ञी पद्मभूषण गिरिजा देवी की शिष्या डॉ. मानसी मजूमदार शास्त्रीय संगीत की परंपरा को निरंतर आगे बढ़ा रही हैं। उनकी संगीत की शिक्षा पिता मनोरंजन राय चौधरी के निर्देशन में शुरू हुई। ठुमरी, कजरी, ख्याल और शास्त्रीय गायन में वह देश और विदेश के कई मंचों पर अपनी आवाज का जादू बिखेर चुकी हैं। कलक त्ता विश्वविद्यालय के संगीत विभाग में बतौर एसोसिएट प्रोफेेसर वह बच्चों को संगीत की शिक्षा दे रही हैं। 
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