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ओलंपियन अंजू बाबी जार्ज ने छात्रों को दिया लक्ष्य हासिल करने का 'मंत्र'
ब्यूरो,अमर उजाला,वाराणसी
Updated Mon, 18 Dec 2017 01:56 PM IST
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सेठ एमआर जयपुरिया स्कूल पड़ाव में अंजू बाबी जार्ज
- फोटो : अमर उजाला
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ओलंपियन और पद्मश्री से सम्मानित अंजू बाबी जार्ज ने रविवार को कहा कि एथलीट में लड़कियां आगे बढ़ सकती हैं, इसके लिए उनमें लगन होना जरूरी है। लक्ष्य प्राप्त करने के लिए उन्हें ध्यान केंद्रित करना होगा। देश के लिए यह गर्व की बात है कि खेलों में लड़कियां आगे बढ़ रही हैं।
वाराणसी से सटे पड़ाव स्थित सेठ एमआर जयपुरिया स्कूल में बच्चों से विचार साझा करते हुए अंजू बाबी जार्ज ने छात्र-छात्राओं की जिज्ञासाओं को शांत कर उन्हें आगे बढ़ने के लिए उत्साहित किया।
बच्चों के प्रश्नों का उत्तर देते हुए उन्होंने कहा कि खेल के प्रति उत्साह पांच वर्ष की उम्र में ही उनके अंदर घर कर गया था। माता-पिता ने उनकी रुचि को देखते हुए बचपन में ही खेल के प्रति उत्साहित किया। अभिभावकों से मिले उत्साह का ही परिणाम रहा कि स्कूली शिक्षा के दौरान प्रत्येक खेल में उन्हें प्रथम पुरस्कार मिला।
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राज्य स्तरीय खेल स्पर्धाओं में भाग लेने के लिए उन्होंने कोच ज्वाइन किया और उन्हें सफलता की सीढ़ी चढ़ते देर नहीं लगी। वर्ष 1996 में उन्हें पहली बार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दिल्ली एशियन जूनियर चैंपियनशिप में भाग लेने का मौका मिला। वर्ष 2002 में उन्हें लंबी कूद में राष्ट्रीय स्तर पर कांस्य पदक मिला। वर्ष 2002 में ही बुसान एशियन एथलीट में उन्होंने भारत के लिए स्वर्ण पदक जीता।
बताया कि कैरियर में टर्निंग प्वाइंट वर्ष 2003 में आया, जब उन्हें पेरिस में हुई वर्ल्ड एथलीट चैंपियनशिप में लंबी कूद में कांस्य पदक मिलने के साथ ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक पाने वाली पहली भारतीय महिला एथलीट में उनका नाम शामिल हुआ।
बच्चों के प्रश्नों का उत्तर देते हुए उन्होंने कहा कि भारत में खेलों के विकास की असीम संभावनाएं हैं। मेहनत, लगन और लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करने से उन्हें सफल होने से कोई नहीं रोक सकता।
वाराणसी से सटे पड़ाव स्थित सेठ एमआर जयपुरिया स्कूल में बच्चों से विचार साझा करते हुए अंजू बाबी जार्ज ने छात्र-छात्राओं की जिज्ञासाओं को शांत कर उन्हें आगे बढ़ने के लिए उत्साहित किया।
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बच्चों के प्रश्नों का उत्तर देते हुए उन्होंने कहा कि खेल के प्रति उत्साह पांच वर्ष की उम्र में ही उनके अंदर घर कर गया था। माता-पिता ने उनकी रुचि को देखते हुए बचपन में ही खेल के प्रति उत्साहित किया। अभिभावकों से मिले उत्साह का ही परिणाम रहा कि स्कूली शिक्षा के दौरान प्रत्येक खेल में उन्हें प्रथम पुरस्कार मिला।
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राज्य स्तरीय खेल स्पर्धाओं में भाग लेने के लिए उन्होंने कोच ज्वाइन किया और उन्हें सफलता की सीढ़ी चढ़ते देर नहीं लगी। वर्ष 1996 में उन्हें पहली बार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दिल्ली एशियन जूनियर चैंपियनशिप में भाग लेने का मौका मिला। वर्ष 2002 में उन्हें लंबी कूद में राष्ट्रीय स्तर पर कांस्य पदक मिला। वर्ष 2002 में ही बुसान एशियन एथलीट में उन्होंने भारत के लिए स्वर्ण पदक जीता।
बताया कि कैरियर में टर्निंग प्वाइंट वर्ष 2003 में आया, जब उन्हें पेरिस में हुई वर्ल्ड एथलीट चैंपियनशिप में लंबी कूद में कांस्य पदक मिलने के साथ ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक पाने वाली पहली भारतीय महिला एथलीट में उनका नाम शामिल हुआ।
बच्चों के प्रश्नों का उत्तर देते हुए उन्होंने कहा कि भारत में खेलों के विकास की असीम संभावनाएं हैं। मेहनत, लगन और लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करने से उन्हें सफल होने से कोई नहीं रोक सकता।