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दलित उत्पीड़न पर अमेरिकी शिक्षाविदों ने जताई चिंता
अमर उजाला ब्यूराो
Updated Sat, 04 Jul 2015 02:13 AM IST
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वाराणसी। भारत में दलित उत्पीड़न की समस्या की तुलना अमेरिका के नस्लभेद से की जा रही है। दोनों देशों के शिक्षाविदों ने शुक्रवार को महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में रंग और जातीय भेदभाव में समानता पर चर्चा की। इसके लिए पहुंचे अमेरिका की इंडियाना यूनिवर्सिटी के प्रतिनिधि मंडल के प्रमुख प्रो.केविन ब्राउन ने कहा कि अगर दलित उत्पीड़न पर कोई शिक्षक या छात्र शोध करना चाहे तो वह उसके साथ काम करने और सहयोग देने के लिए तैयार हैं।
दोपहर दो बजे विद्यापीठ के राधाकृष्णन सभागार में कुलपति डॉ. पृथ्वीश नाग की मौजूदगी में हुई परिचर्चा में अमेरिका प्रतिनिधि मंडल के प्रमुख प्रो. केविन ने कहा कि अमेरिका में अश्वेतों के साथ किए जाने वाले अन्याय के विरुद्ध बड़ी तादाद में श्वेत खड़े हो रहे हैं। सरकारी नीतियों में बदलाव लाने की भी वह पहल कर रहे हैं। जबकि भारत में ऐसा नहीं हो रहा है। जवाब में डॉ.कमलवंशी, डॉ. नवरतन सिंह ने कहा कि यहां पाठ्य पुस्तकों में इस तरह के अन्याय या भेदभाव की चर्चा कम की गई है। उच्च जाति के बच्चों का सामाजीकरण जातिगत पूर्वाग्रहों के साथ किया जाता है। शिक्षा व्यवस्था कभी भी जातीय भेदभाव पर सवाल खड़ा
नहीं करती। लोग अब भी अपनी जातिके बाहर क्रांतिकारी ढंग से नहीं निकल पा रहे हैं। प्रो.केविन ने कहा कि अमेरिका के नस्ल भेद और भारत में दलित उत्पीड़न में काफी समानता है। अमेरिका में नागरिक अधिकार आंदोलनों के जरिए अश्वेतों के उत्पीड़न पर काफी हद तक काबू पाया जा रहा है। इस दिशा में यहां भी काम होना चाहिए। उन्होंने भरोसा दिलाया कि अगर कोई शोधार्थी इंडियाना
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यूनिवर्सिटी के सहयोग से शोध करना चाहे तो तो संपर्क कर सकता है। इस मौके पर डॉ. अनिल कुमार चौधरी, डॉ.केन, डॉ. लूइस, डॉ. जैकोबी विलियम्स, डॉ. मधु कुशवाहा, डॉ. भावना वर्मा, डॉ. राजू माझी समेत तमाम शिक्षाविद उपस्थित थे। संचालन प्रो. संजय ने किया। इसके बाद अमेरिकी प्रतिनिधि मंडल ने कुलपति डॉ. पृथ्वीश से बी मुलाकात की।
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दोपहर दो बजे विद्यापीठ के राधाकृष्णन सभागार में कुलपति डॉ. पृथ्वीश नाग की मौजूदगी में हुई परिचर्चा में अमेरिका प्रतिनिधि मंडल के प्रमुख प्रो. केविन ने कहा कि अमेरिका में अश्वेतों के साथ किए जाने वाले अन्याय के विरुद्ध बड़ी तादाद में श्वेत खड़े हो रहे हैं। सरकारी नीतियों में बदलाव लाने की भी वह पहल कर रहे हैं। जबकि भारत में ऐसा नहीं हो रहा है। जवाब में डॉ.कमलवंशी, डॉ. नवरतन सिंह ने कहा कि यहां पाठ्य पुस्तकों में इस तरह के अन्याय या भेदभाव की चर्चा कम की गई है। उच्च जाति के बच्चों का सामाजीकरण जातिगत पूर्वाग्रहों के साथ किया जाता है। शिक्षा व्यवस्था कभी भी जातीय भेदभाव पर सवाल खड़ा
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नहीं करती। लोग अब भी अपनी जातिके बाहर क्रांतिकारी ढंग से नहीं निकल पा रहे हैं। प्रो.केविन ने कहा कि अमेरिका के नस्ल भेद और भारत में दलित उत्पीड़न में काफी समानता है। अमेरिका में नागरिक अधिकार आंदोलनों के जरिए अश्वेतों के उत्पीड़न पर काफी हद तक काबू पाया जा रहा है। इस दिशा में यहां भी काम होना चाहिए। उन्होंने भरोसा दिलाया कि अगर कोई शोधार्थी इंडियाना
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यूनिवर्सिटी के सहयोग से शोध करना चाहे तो तो संपर्क कर सकता है। इस मौके पर डॉ. अनिल कुमार चौधरी, डॉ.केन, डॉ. लूइस, डॉ. जैकोबी विलियम्स, डॉ. मधु कुशवाहा, डॉ. भावना वर्मा, डॉ. राजू माझी समेत तमाम शिक्षाविद उपस्थित थे। संचालन प्रो. संजय ने किया। इसके बाद अमेरिकी प्रतिनिधि मंडल ने कुलपति डॉ. पृथ्वीश से बी मुलाकात की।