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दृश्यों की कसीदाकारी में उभरा नारी का दर्द
Varanasi
Updated Sat, 09 Mar 2013 05:31 AM IST
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वाराणसी। तलवारबाजी में निपुण योद्धा आम्रपाली का वैशाली का पुरुष वर्ग मुकाबला नहीं कर सकता। फिर भी पुरुष प्रधान समाज के विधान के समक्ष उसे झुकना ही पड़ा। राष्ट्र की परंपरा का हवाला देकर उसे वैशाली की नगर वधू बना दिया गया। वसंत महिला महाविद्यालय राजघाट के शताब्दी वर्ष में स्त्री प्रेक्षा की ओर से कालेज के मुक्ताकाशी मंच पर प्रस्तुत डा. इरावती रचित और निर्देशित नाटक आम्रपाली में दृश्यों की कसीदाकारी एवं प्राचीन कथनोपकथन के बीच नारी अस्मिता का अधुनातन सवाल उभरा।
वैशाली की आम्रपाली रूपवती ही नहीं बल्कि शस्त्र, शास्त्र, कला निष्णात है। गुण ही उसे नगर वधू बनाने के अर्ह घोषित कर देते हैं। आम्रपाली नगर वधू बनना नहीं चाहती। मगध सम्राट बिंंबिसार की वाग्दत्ता पत्नी होने के बावजूद जनतांत्रिक व्यवस्था ने उसकी स्वतंत्रता छीन ली। उसे नगर वधू बना डाला। पर उसकी आत्मा को नगर वधू कहां बनाया जा सका? वह सब त्याग कर बुद्ध की शरण में चली गई। इस प्राचीन कथानक में आज की नारी अस्मिता के प्रश्न कई जगह उभरे। दृश्य विधान, नृत्य-संगीत में कई बार कथ्य का तनाव गुम हो गया। तथागत की यात्रा, दीप प्रज्जवलन, नागरिकों और आम्रपाली के आगमन, उत्सव एवं नृत्य में 28 मिनट लग गए। पूरे मैदान को छह ब्लाकों में बांट कर दृश्य विधान रचे गए। मंच सज्जा, वेशभूष, संगीत और सभी प्रमुख भूमिकाएं महिलाओं ने निभाईं। इसमें स्वाति आत्मनाथन, श्रीलक्ष्मी, भारती, भव्या, चारू सिन्हा, निधि, प्रेरणा, स्मृति, पूजा, अपराजिता, स्नेहिल, स्वाति, अंजली, सागरिका, कल्पना, पूजा, नम्रता, रंजना गुप्ता, नंदिनी, प्रेरणा, मोनिका ने महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाईं। प्रधानाचार्य डा. विजय शिवपुरी ने स्वागत किया।
निर्देशक के बारे में
वाराणसी। बंसत महिला महाविद्यालय राजघाट में प्राचीन भारतीय इतिहास एवं संस्कृति विभाग की प्राध्यापक डा. इरावती को 12 साल की उम्र में ही रंगमंच से लगाव हो गया। अभिनय करने का शौक वर्ष 1970 में निर्देशन और लेखन तक ले गया। तमसो मां ज्योर्तिगमय, श्रेणी विजानंद, गली बोलती है, सदा-ए-हक, आम्रपाली जैसे नाटकों के साथ ही त्रिशपथगा उपन्यास भी लिखा। भगवती चरण वर्मा की कृति चित्रलेखा, याकूब यावर की प्रलय सिंधु का नाट्य रूपांतरण किया। टेनेसी की द ग्लास मैनेजरी का हिंदी में नाट्य रूपांतरण भी उनकी देन है। वह कालेज की छात्राओं का मंच स्त्री प्रेक्षा के नाम से चलाती हैं। इस बार 80 छात्राओं को इस मंच से उन्होेंने नाट्य प्रशिक्षण देकर आम्रपाली की तैयारी की।
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वैशाली की आम्रपाली रूपवती ही नहीं बल्कि शस्त्र, शास्त्र, कला निष्णात है। गुण ही उसे नगर वधू बनाने के अर्ह घोषित कर देते हैं। आम्रपाली नगर वधू बनना नहीं चाहती। मगध सम्राट बिंंबिसार की वाग्दत्ता पत्नी होने के बावजूद जनतांत्रिक व्यवस्था ने उसकी स्वतंत्रता छीन ली। उसे नगर वधू बना डाला। पर उसकी आत्मा को नगर वधू कहां बनाया जा सका? वह सब त्याग कर बुद्ध की शरण में चली गई। इस प्राचीन कथानक में आज की नारी अस्मिता के प्रश्न कई जगह उभरे। दृश्य विधान, नृत्य-संगीत में कई बार कथ्य का तनाव गुम हो गया। तथागत की यात्रा, दीप प्रज्जवलन, नागरिकों और आम्रपाली के आगमन, उत्सव एवं नृत्य में 28 मिनट लग गए। पूरे मैदान को छह ब्लाकों में बांट कर दृश्य विधान रचे गए। मंच सज्जा, वेशभूष, संगीत और सभी प्रमुख भूमिकाएं महिलाओं ने निभाईं। इसमें स्वाति आत्मनाथन, श्रीलक्ष्मी, भारती, भव्या, चारू सिन्हा, निधि, प्रेरणा, स्मृति, पूजा, अपराजिता, स्नेहिल, स्वाति, अंजली, सागरिका, कल्पना, पूजा, नम्रता, रंजना गुप्ता, नंदिनी, प्रेरणा, मोनिका ने महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाईं। प्रधानाचार्य डा. विजय शिवपुरी ने स्वागत किया।
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निर्देशक के बारे में
वाराणसी। बंसत महिला महाविद्यालय राजघाट में प्राचीन भारतीय इतिहास एवं संस्कृति विभाग की प्राध्यापक डा. इरावती को 12 साल की उम्र में ही रंगमंच से लगाव हो गया। अभिनय करने का शौक वर्ष 1970 में निर्देशन और लेखन तक ले गया। तमसो मां ज्योर्तिगमय, श्रेणी विजानंद, गली बोलती है, सदा-ए-हक, आम्रपाली जैसे नाटकों के साथ ही त्रिशपथगा उपन्यास भी लिखा। भगवती चरण वर्मा की कृति चित्रलेखा, याकूब यावर की प्रलय सिंधु का नाट्य रूपांतरण किया। टेनेसी की द ग्लास मैनेजरी का हिंदी में नाट्य रूपांतरण भी उनकी देन है। वह कालेज की छात्राओं का मंच स्त्री प्रेक्षा के नाम से चलाती हैं। इस बार 80 छात्राओं को इस मंच से उन्होेंने नाट्य प्रशिक्षण देकर आम्रपाली की तैयारी की।
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