फिटनेस का फॉर्मूला: एक किलो भी वजन बढ़ा तो चूक सकते हैं, राजकुमार पाल ने बताया 2028 का मिशन
पेरिस ओलंपिक में कांस्य विजेता और अर्जुन अवॉर्डी गाजीपुर के राजकुमार पाल से खास बातचीत हुई। इस दौरान उन्होंने फिटनेस का राज बताया। साथ ही कहा कि ओलंपिक मेडल का रंग बदलकर कांस्य से स्वर्ण करना होगा।
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वर्ष 2024 की पेरिस ओलंपिक में कांस्य विजेता और अर्जुन अवॉर्डी गाजीपुर के राजकुमार पाल इन दिनों अपने गांव करमपुर में हैं। जल्द ही वह जापान के एशियन गेम्स की ट्रेनिंग कैंप में होंगे। हॉकी मिडफील्डर के तौर पर विश्व में अपनी पहचान बनाने वाले राजकुमार पाल का कहना है कि फिटनेस के लिए कोई गांव या शहर नहीं होता। आप खुद को हर हाल में फिट रख सकते हैं। थोड़ा फैट बढ़ जाए या वजन एक से दो किलो ऊपर हो जाए तो सेलेक्शन में दिक्कत होने लगती है, ऐसे में नए खिलाड़ियों को सजग रहना होगा। अब 2028 के ओलंपिक मेडल का रंग बदलना होगा, यानी कि हमें कांस्य से स्वर्ण पदक जीतने की ओर बढ़ना है।
राजकुमार से बातचीत के कुछ अंश
शहर से गांव आने पर फिटनेस में दिक्कत आई तो उससे कैसे निपटते हैं?
करमपुर गांव में आपको किसी शहर से बेहतर खेल सुविधाएं मिलेंगी। ग्राउंड और जिम दोनों यहां पर है। अब तो एस्ट्रोटर्फ हो गया है। हां, ये नहीं होता तो फिर सोचना पड़ता। आपका फैट या वजन एक या दो किलोग्राम भी बढ़ जाए तो बड़े मैचों में खेलना मुश्किल हो जाएगा।
खान-पान क्या रखें और स्वास्थ्य पर मॉनिटरिंग कैसे करते हैं?
ऑयली, फैटी, कोल्ड ड्रिंक, जंक फूड से दूर रहें। इनके अलावा सामान्य और हेल्दी डाइट का पालन करें, लेकिन मोबाइल इस्तेमाल कम कर सिर्फ प्रैक्टिस पर ही फोकस रखें। खिलाड़ियों का फिटनेस टेस्ट, फैट टेस्ट, ब्लड टेस्ट, स्क्रीन टेस्ट में आपको इसका पता चलता ही रहता है।
यदि नया लड़का बड़ा टूर्नामेंट खेल रहा है तो वह सहज नहीं होता। पहले मुझे मानसिक उलझन होती थी कि बड़े स्तर पर खेलने पर कोई क्या कहेगा तो काशी के ललित उपाध्याय के साथ रहने से भी बहुत मदद मिली। खेल के साथ पढ़ाई को जारी रखें। टीम में दूसरों की इज्जत करना, ये सब काउंट होता है। अपने अंदर की कमी को ढूंढकर जल्दी से ठीक नहीं किया तो बाहर होने में समय नहीं लगेगा।
आगामी जापान एशियन, पंजाब एशियन चैंपियंस ट्रॉफी और 2028 के ओलंपिक को लेकर आपसे काफी उम्मीदें बनी हैं?
ओलंपिक 2028 को लेकर तैयारियां हैं। अब मेडल का रंग बदलना है। इसे कांस्य से स्वर्ण करना है। टीम काफी अच्छी है। जापान के एशियन गेम्स से पहले गाजीपुर के उत्तम सिंह और विष्णु भी हॉकी में दमखम दिखाने के लिए तैयार हैं।
हॉकी की जिम्मेदारियों के साथ डिप्टी एसपी की भी जिम्मेदारी को कैसे पूरा निभाते हैं?
पोस्टिंग मुरादाबाद में है। पुलिस विभाग को धन्यवाद देता हूं कि मुझे खेलने के लिए फ्री छोड़ दिया गया है। हॉकी के आगे के राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मैचों की तैयारियां चल रहीं हैं।
जिस गांव से आप निकले वहां पर अब खेलों की क्या स्थिति है?
गांव के दो लड़के जूनियर और अंडर 18 टीम में हैं। 10-12 साल के बच्चों को खेलने के लिए टर्फ मिलता है। अभी भी हमारे पुराने कोच ही ट्रेनिंग दे रहे हैं।
करमपुर के खिलाड़ियों को क्या-क्या सफलताएं मिली हैं?
करमपुर गांव की एकेडमी से ही 400 युवाओं को खेल कोटे के चलते नौकरी मिल चुकी है। रेलवे, आर्मी, सीएजी, आयकर और पुलिस विभाग में ये कार्य कर रहे हैं। इनमें तीन लड़कियां भी हैं। करमपुर की एकेडमी में अभी 40 लड़कियां प्रैक्टिस कर रही हैं।
हॉकी का सफर शुरू हुआ तो क्या दिक्कतें आईं?
40 साल से करमपुर में निशुल्क एकेडमी चल रही है। एकेडमी संचालक तेज बहादुर सिंह थे। ऐसे तो गांव रहने पर खेलने के लिए कभी आर्थिक संकट नहीं सामने आया। संसाधनों की कमी जरूर थी, उस समय एस्ट्रोटर्फ नहीं घास के ही मैदान पर प्रैक्टिस होती थी, इसलिए वहां से निकलकर लखनऊ स्पोर्ट्स कॉलेज में प्रवेश लेना पड़ा।
पिता ट्रक ड्राइवर की एक्सीडेंट में निधन, मां ने खेलने से नहीं रोका?
नहीं, पिता चौधरी कल्पनाथ पाल का ट्रक से ही एक्सीडेंट हो गया था। मां ने संभाला, वह चाहती तो नहीं जाने देतीं। करमपुर में ही खेलता था। निधन के एक साल के बाद ही लखनऊ चला गया था। पिता का साया उठा तो मां ने हिम्मत दिखाई। हॉस्टल भेज दिया। गाय और खेत संभालकर खर्च चलाती थीं।
पहली बार शहर के स्पोर्ट्स कॉलेज पहुंचने पर क्या दिक्कतें आईं?
लखनऊ हॉस्टल में गया था तो जूनियर के कैंप में नाम नहीं आया। आयु बढ़ गया तो सीधे सीनियर में गया। रेलवे की नौकरी का ऑफर आया था तो ज्वाइन नहीं किया। रेलवे कर्मचारी बनना मंजूर नहीं था। ऐसे में सीनियर वर्ग में मेहनत की।