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प्रेम हृदय की वस्तु, आत्मा की पूंजी

Sat, 14 Jul 2012 12:00 PM IST
Varanasi
Varanasi Updated Sat, 14 Jul 2012 12:00 PM IST
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वाराणसी। कथा मर्मज्ञ बालव्यास पं. श्रीकांत शर्मा ने शुक्रवार को योग और वियोग का अंतर समझाया। कहा कि योग से वियोग कम नहीं होता। योगी वन में कुटिया बनाकर रहता है जबकि वियोगी घर को ही वन बना लेता है। योगी रंगीन कपड़े पहनकर अपनी पहचान बनाता है जबकि वियोगी सब कुछ ईश्वर में देखते हुए रंगीन समझता है। इस दौरान रुक्मिणी विवाह के प्रसंग पर भक्त झूमे-नाचे। कथा मंडप में चौतरफा उत्सव जैसा माहौल था।
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बाल व्यास ने कहा कि जीवात्मा-परमात्मा का मिलन ही रुक्मिणी विवाह है। प्रेम हृदय की वस्तु और आत्मा की पूंजी है। प्रभु के आनंद में ही सब कुछ निहित है। बाल व्यास ने गोपियों के समर्पण भाव का उदाहरण दिया। गोपियां कहती हैं-उद्धव तुम ध्यान की बात करते हो। वह जिधर भी देखती हैं सिर्फ कृष्ण ही दिखाई पड़ते हैं। कहते हो आंख बंद कर ध्यान करो। कैसे करें, जब कृष्ण के बिना कुछ दिखाई ही नहीं पड़ता।
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रुक्मिणी की भूमिका में हर्षित बजाज और कृष्ण की भूमिका में उमंग इस मनोहारी दृश्य को जीवंत बना रहे थे। रानीगंज के विष्णु सराफ, ओसोम के भजन लाल तोंदी, सूरत के रघुनाथ कानोडिया, गोरखपुर के अशोर टिबड़ेवाल के अलावा सीता तोंदी, सुमित्रा तोदी, महाबीर प्रसाद बजाज, दीपक, मनोज, श्याम, पुष्पा बजाज, आरके चौधरी, अनिल जाजोदिया, कमला बाजोरिया, अनिल डिडवानिया भगवान श्रीकृष्ण के सहयोगी बने थे। बाल व्यास ने कहा कि भगवान की कृपा हो तो सब कुछ आनंदमय हो जाता है। कुब्जा चंदन घिसती थी उसे भगवान ने अपना लोक दिया। कबीर, नामदेव, गोरा, रैदास जैसे संतों को भी भगवान का स्नेह उनकी निष्ठा के चलते मिला।
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