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सफलता या फिर बलिदान : अविमुक्तेश्वरानंद

Varanasi Updated Wed, 09 May 2012 12:00 PM IST
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वाराणसी। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा है कि सरकार का गंगा के प्रति रुख ठीक नहीं है। उसे न तो गंगा की चिंता है और न ही साधु संतों की। कहा कि गंगा प्रेमी मुहिम से डिगेंगे नहीं। अब या तो अभियान में सफलता मिलेगी या फिर मां गंगा के लिए बलिदान दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि सरकार को न तो गंगा के किनारे रहने वाले करोड़ों लोगों के स्वास्थ्य की चिंता है और न ही गंगा की अविरलता एवं निर्मलता की। केंद्र, शासन और प्रशासन तीनों इस मसले पर कोई ठोस निर्णय नहीं ले रहे।
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मंगलवार को तपस्थल पर पत्रकारों से बातचीत में अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि जिला प्रशासन का एक ही काम रह गया है कि जल त्याग कर तपस्या कर रहे संतों को अस्पताल में ले जाकर पटक देना और फिर उनकी सुध न लेना। 1986 में राजीव गांधी ने गंगा की निर्मलता और अविरलता की बात की थी। सरकार ने नेशनल रिवर गंगा बेसिन अथारिटी बनाई लेकिन उसके बजट की बंदरबांट हो रही है। 15 हजार करोड़ रुपया खर्च हो गए लेकिन गंगा मैली की मैली ही हैं। गंगा किनारे बसी करोड़ों की आबादी दूषित पानी पीने को मजबूर है। अब जब संत गंगा की अविरलता और निर्मलता के लिए तपस्या कर रहे हैं तो यह भी सरकार को खटक रहा है। प्रशासन संतों की तपस्या भंग करने में लगा है। कभी उन्हें अस्पताल पहुंचा रहा है तो कभी फोर्स फीडिंग करा रहा है। कहा कि संत अब किसी भी कीमत पर पीछे नहीं हटेंगे।


तपस्या की परिभाषा तय करे सरकार
वाराणसी। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का कहना है कि प्रशासन गंगा तपस्या को आत्महत्या के प्रयास की श्रेणी में मान रहा है और संतों पर धारा 309 के तहत मामला दर्ज करने की धमकी भी दे रहा है। कहा कि सरकार पहले संसद में तपस्या की परिभाषा तय करे। सनातन धर्म में तपस्या का अपना महत्व है। इसमें व्यक्ति तपस्या करते हुए अपने प्राण दे देता है। जबकि प्रशासन इसे आत्महत्या करार दे रहा।

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