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आम आदमी की खुशहाली हो विकास का पैमाना ः प्रणब मुखर्जी

Sun, 30 Nov 2014 05:30 AM IST
Varanasi
Varanasi Updated Sun, 30 Nov 2014 05:30 AM IST
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वाराणसी। अगले दो दशक में देश की विकास दर आठ से नौ फीसदी तक हो जाएगी और हमारी अर्थव्यवस्था डेढ़ गुना बड़ी हो जाएगी। लेकिन क्या इसे ही देश की खुशहाली का पैमाना माना जाएगा। ये बातें राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में इंडियन सोशियोलॉजिकल सोसाइटी के 40वें कांफ्रेंस के उद्घाटन समारोह में शनिवार को कहीं। ‘विकास, विविधता और लोकतंत्र’ पर अपने 13 मिनट के भाषण में उन्होंने कहा कि भूटान जैसे देश विकास को खुशहाली और संतोष से जोड़ रहे हैं। हमें भी ऐसा ही करना होगा। जब तक समाज के अंतिम व्यक्ति के जीवन में खुशहाली नहीं आती, तब तक विकास बेमानी है। कोशिश उस व्यक्ति तक भोजन पहुंचाने की होनी चाहिए जो भूखा सो रहा है।
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उन्होंने कहा कि हमारा लोकतंत्र लगातार मजबूत हो रहा है। जनता पांच साल पर सिर्फ वोट ही नहीं डालती बल्कि समीक्षा भी करती है। इसका प्रमाण अन्ना हजारे का आंदोलन है, जिसके चलते सरकार को लोकपाल विधेयक बनाने के लिए पांच मंत्रियों की समिति बनानी पड़ी। शिक्षा और जीवन स्तर समान होने के बावजूद इंग्लैंड में लोकतंत्र पूरी तरह लागू होने में सात सौ साल लग गए। रीति-रिवाज, धार्मिक और आर्थिक विषमताओं के चलते हमारे लोकतंत्र के भविष्य पर सवाल उठाए जाते रहे हैं लेकिन देश 127 करोड़ लोग मिलकर इसे संचालित करते हैं। उन्होंने कहा कि लोकसभा में देश की 543 सीटों पर अलग-अलग जाति और समुदाय के लोग चुनकर आते हैं लेकिन संसद में अपने 43 साल के कार्यकाल में मैंने कभी इसको बाधक नहीं पाया। विविधता हमारी सभ्यता की धड़कन है और सबको साथ लेकर चलने पर ही विकास संभव है।
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