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कछुआ सेंचुरी हटाने का प्रस्ताव ठंडे बस्ते में
Varanasi
Updated Mon, 19 May 2014 05:30 AM IST
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वाराणसी। तीर्थनगरी काशी के लिए खतरे की घंटी साबित हो रहा कछुआ सेंचुरी हटाने का प्रस्ताव ठंडे बस्ते में है। प्रदूषण मुक्ति के मसले पर गंगा को आक्सीजन देने में असफल साबित हुए इस सेंचुरी में जहां कछुओं के प्रजनन के लिए उचित माहौल नहीं मिल सका है, वहीं रेत के विस्तार से नदी की धारा में असंतुलन पैदा होने से घाटों में क्षरण की भी बात कही जा चुकी है। जिलाधिकारी के निर्देश पर गठित विशेषज्ञों की टीम ने सेंचुरी से होने वाले नुकसान को चिह्नित करते हुए रिपोर्ट गुजरे साल दिसंबर में ही दी थी लेकिन छह महीने बाद भी उस पर अमल नहीं हो सका। माना जा रहा है कि अगर यही हाल रहा तो आने वाली बारिश में जल दबाव से नए संकट का सामना कर पड़ सकता है।
अस्सी से राजघाट के बीच रेत के टीलों के नए उभार गंगा तट पर बसे प्राचीन शहर की ओर दबाव बढ़ा सकते हैं। बीएचयू आईआईटी, केंद्रीय जल आयोग के अलावा अन्य अभियंताओं की टीम की मदद से जिला प्रशासन ने कछुआ सेंचुरी से होने वाले खतरों को जानने की कोशिश की थी। उन कारणों को चिह्नित कराया गया था, जिनकी वजह से शहर की ओर गंगा का जल दबाव बढ़ रहा है और घाटों में क्षरण पैदा होने लगा है। इसे रोकने के लिए सेंचुरी के प्रतिबंधों को शिथिल करते हुए बालू की ड्रेजिंग कराने की योजना थी लेकिन अभी तक इस दिशा में कुछ भी होता नजर नहीं आ रहा है। सर्वेक्षण समिति से जुड़े नदी विशेषज्ञ प्रोफेसर यूके चौधरी का कहना है कि उन्होंने बालू खनन के लिए स्थान भी प्रशासन को सुझाया था। अब अगर जल्द इस दिशा में कदम नहीं उठाया गया तो समय हाथ से निकल जाएगा। मानसून सक्रिय होने के बाद न तो बालू का खनन हो सकेगा और न ही घाटों में कटान ही रुक पाएगी। गंगा एक्शन प्लान लागू होने के बाद 1978 में ही कछुआ सेंचुरी लागू किया गया था। वर्ष 2002 से बालू खनन पर पूर्णतया रोक लगा दी गई। तब से गंगा का पूर्वी किनारा रेत से लगातार पटता जा रहा है।
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अस्सी से राजघाट के बीच रेत के टीलों के नए उभार गंगा तट पर बसे प्राचीन शहर की ओर दबाव बढ़ा सकते हैं। बीएचयू आईआईटी, केंद्रीय जल आयोग के अलावा अन्य अभियंताओं की टीम की मदद से जिला प्रशासन ने कछुआ सेंचुरी से होने वाले खतरों को जानने की कोशिश की थी। उन कारणों को चिह्नित कराया गया था, जिनकी वजह से शहर की ओर गंगा का जल दबाव बढ़ रहा है और घाटों में क्षरण पैदा होने लगा है। इसे रोकने के लिए सेंचुरी के प्रतिबंधों को शिथिल करते हुए बालू की ड्रेजिंग कराने की योजना थी लेकिन अभी तक इस दिशा में कुछ भी होता नजर नहीं आ रहा है। सर्वेक्षण समिति से जुड़े नदी विशेषज्ञ प्रोफेसर यूके चौधरी का कहना है कि उन्होंने बालू खनन के लिए स्थान भी प्रशासन को सुझाया था। अब अगर जल्द इस दिशा में कदम नहीं उठाया गया तो समय हाथ से निकल जाएगा। मानसून सक्रिय होने के बाद न तो बालू का खनन हो सकेगा और न ही घाटों में कटान ही रुक पाएगी। गंगा एक्शन प्लान लागू होने के बाद 1978 में ही कछुआ सेंचुरी लागू किया गया था। वर्ष 2002 से बालू खनन पर पूर्णतया रोक लगा दी गई। तब से गंगा का पूर्वी किनारा रेत से लगातार पटता जा रहा है।
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