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खत्म हुई रवानी, रह गया घुटने-घुटने पानी
Varanasi
Updated Sun, 30 Mar 2014 05:31 AM IST
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वाराणसी। वरुणा नदी पर सरैयां स्थित पुराना पुल का गेट टूटने के बाद वरुणा की रवानी खत्म हो गई है। आमतौर पर वरुणा का जलस्तर 14.5 मीटर रखा जाता है लेकिन शनिवार को बीच धारा में बच्चे तक घुटने भर पानी में खेलते नजर आए। रामेश्वर तक वरुणा के पेटे में केवल सीवर और नाले का पानी, खतरनाक केमिकलयुक्त गंदा सिल्ट ही बचा है।
वरुणा के सूखने की भी आशंका हो गई हैं क्यों आने वाले दिनों में तापमान बढ़ना है और गेट बनने में कम से कम दस लगने की संभावना जताई जा रही है। उधर, शनिवार को लखीमपुर से बैराज यांत्रिक खंड के छह सदस्यीय विशेषज्ञ दल भी वाराणसी पहुंच गया और गेट की मरम्मत शुरू कर दी। बताते चलें ज्ञानपुर पंप कैनाल से तीन दिन पूर्व छोड़े गए पानी के कारण 58 साल पुराने पुल का गेट शुक्रवार को अधिक दबाव के चलते टूट गया था। इससे वरुणा का पानी गंगा में समा गया। शुक्रवार को लखीमपुर से आए विशेषज्ञ दल ने गेट नंबर तीन की मरम्मत का काम शुरू कर दिया है। बैराज यांत्रिक विभाग के अधिशाषी अभियंता महेंद्र सिंह का कहना है कि अधिकतम दस दिन में गेट नंबर तीन बनाने का लक्ष्य रखा गया है। दो और छह नंबर गेट की भी मरम्मत कराई जाएगी। फिर ज्ञानपुर से पानी छोड़ा जाएगा।
दो साल से नहीं मिला धन
पुल के सभी सात गेट बदलने के लिए करीब दो साल पहले 4.12 करोड़ की योजना बनाकर भेजी गई थी लेकिन शासन ने अभी तक धन स्वीकृत नहीं किया। इसके पहले गेट नंबर चार भी टूटा था। हर बार केवल मरम्मत होती है लेकिन गेट नहीं बदला जाता है। उस समय मरम्मत में खर्च किए गए साढ़े चार लाख अभी तक नहीं मिले हैं।
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पुल बन जाता तो बच जाते परेशानी से
लकड़ी का अस्थायी पुल बहने से दर्जन भर गांवों के निवासी परेशान
संवाददाता
वाराणसी। ‘पुल बन गइल रहत तऽ एतना फजीहत नाहीं होत।’ वरुणा नदी का फाटक टूटने के बाद सरायमोहना से शहर आने का एकमात्र जरिया लकड़ी की पुलिया टूटने का दर्द बयां करते हुए महेंद्र साहनी ने कही।
सरायमोहाना सहित वरुणापार के दर्जनों गांवों के हजार से अधिक निवासी हर रोज शहर आते हैं। बारिश के दिनों में उनको नाव का सहारा लेना पड़ता है। पानी कम होने पर लकड़ी का अस्थायी पुल बना लिया जाता है। पुरानापुल का फाटक टूटने के बाद शुक्रवार को यह बह गया। शनिवार को लोगों को आने-जाने के लिए नावों की मदद लेनी पड़ी। पार उतरने के लिए काफी देर से प्रतीक्षा कर रहे गांव के ओमप्रकाश का कहना है कि स्थायी पुल नहीं होने का दर्द आज समझ में आया। सरकार तेजी से काम करती तो यह दिन नहीं देखना पड़ता।
बताते चलें वर्ष 2007 में पुल बनाने का काम शुरू हुआ था। उसके बाद कृष्णमूर्ति फाउंडेशन ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दी, जिस पर स्टे हो गया। सपा की सरकार दोबारा आने पर पुल निर्माण की बाधाओं को दूर करने के लिए फाउंडेशन, ग्रामीणों और सेतु निगम के अधिकारियों ने आपसी बातचीत कई। तय हुआ कि पुल की चौड़ाई महज नौ फुट होगी। इस पर ट्रक-बस नहीं आएंगे। केवल छोटे वाहन, ट्रैक्टर ही चलेंगे। दिसंबर माह में पुल बनना शुरू हुआ लेकिन बजट के चक्कर में काम बीच में रुक गया। ग्राम प्रधान सोनिया देवी का कहना है कि चींटी की रफ्तार से काम हो रहा है। लोक निर्माण विभाग के मुख्य अभियंता आरकेबी राकेश का कहना है कि बजट जारी हो गया है। जल्द ही पुल बन जाएगा।
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वरुणा के सूखने की भी आशंका हो गई हैं क्यों आने वाले दिनों में तापमान बढ़ना है और गेट बनने में कम से कम दस लगने की संभावना जताई जा रही है। उधर, शनिवार को लखीमपुर से बैराज यांत्रिक खंड के छह सदस्यीय विशेषज्ञ दल भी वाराणसी पहुंच गया और गेट की मरम्मत शुरू कर दी। बताते चलें ज्ञानपुर पंप कैनाल से तीन दिन पूर्व छोड़े गए पानी के कारण 58 साल पुराने पुल का गेट शुक्रवार को अधिक दबाव के चलते टूट गया था। इससे वरुणा का पानी गंगा में समा गया। शुक्रवार को लखीमपुर से आए विशेषज्ञ दल ने गेट नंबर तीन की मरम्मत का काम शुरू कर दिया है। बैराज यांत्रिक विभाग के अधिशाषी अभियंता महेंद्र सिंह का कहना है कि अधिकतम दस दिन में गेट नंबर तीन बनाने का लक्ष्य रखा गया है। दो और छह नंबर गेट की भी मरम्मत कराई जाएगी। फिर ज्ञानपुर से पानी छोड़ा जाएगा।
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दो साल से नहीं मिला धन
पुल के सभी सात गेट बदलने के लिए करीब दो साल पहले 4.12 करोड़ की योजना बनाकर भेजी गई थी लेकिन शासन ने अभी तक धन स्वीकृत नहीं किया। इसके पहले गेट नंबर चार भी टूटा था। हर बार केवल मरम्मत होती है लेकिन गेट नहीं बदला जाता है। उस समय मरम्मत में खर्च किए गए साढ़े चार लाख अभी तक नहीं मिले हैं।
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पुल बन जाता तो बच जाते परेशानी से
लकड़ी का अस्थायी पुल बहने से दर्जन भर गांवों के निवासी परेशान
संवाददाता
वाराणसी। ‘पुल बन गइल रहत तऽ एतना फजीहत नाहीं होत।’ वरुणा नदी का फाटक टूटने के बाद सरायमोहना से शहर आने का एकमात्र जरिया लकड़ी की पुलिया टूटने का दर्द बयां करते हुए महेंद्र साहनी ने कही।
सरायमोहाना सहित वरुणापार के दर्जनों गांवों के हजार से अधिक निवासी हर रोज शहर आते हैं। बारिश के दिनों में उनको नाव का सहारा लेना पड़ता है। पानी कम होने पर लकड़ी का अस्थायी पुल बना लिया जाता है। पुरानापुल का फाटक टूटने के बाद शुक्रवार को यह बह गया। शनिवार को लोगों को आने-जाने के लिए नावों की मदद लेनी पड़ी। पार उतरने के लिए काफी देर से प्रतीक्षा कर रहे गांव के ओमप्रकाश का कहना है कि स्थायी पुल नहीं होने का दर्द आज समझ में आया। सरकार तेजी से काम करती तो यह दिन नहीं देखना पड़ता।
बताते चलें वर्ष 2007 में पुल बनाने का काम शुरू हुआ था। उसके बाद कृष्णमूर्ति फाउंडेशन ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दी, जिस पर स्टे हो गया। सपा की सरकार दोबारा आने पर पुल निर्माण की बाधाओं को दूर करने के लिए फाउंडेशन, ग्रामीणों और सेतु निगम के अधिकारियों ने आपसी बातचीत कई। तय हुआ कि पुल की चौड़ाई महज नौ फुट होगी। इस पर ट्रक-बस नहीं आएंगे। केवल छोटे वाहन, ट्रैक्टर ही चलेंगे। दिसंबर माह में पुल बनना शुरू हुआ लेकिन बजट के चक्कर में काम बीच में रुक गया। ग्राम प्रधान सोनिया देवी का कहना है कि चींटी की रफ्तार से काम हो रहा है। लोक निर्माण विभाग के मुख्य अभियंता आरकेबी राकेश का कहना है कि बजट जारी हो गया है। जल्द ही पुल बन जाएगा।