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बुराई पर हुई अच्छाई की जीत, मारा गया हिरणकश्यप0
Updated Sun, 29 Apr 2018 02:36 AM IST
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वाराणसी। प्रह्लाद घाट पर चल रही नृसिंह लीला का प्रमुख मंचन शनिवार को भक्तिपूर्ण माहौल में संपन्न हुआ। बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक भगवान विष्णु नृसिंह रूप धारण कर अपने भक्त प्रह्लाद की रक्षा करने के लिए खम्भा फाड़ कर प्रगट हुए और आतताई दैत्य हिरणकश्यपु का वध कर सृष्टि की रक्षा करते हैं। वहीं नृसिंह लीला देख रहे श्रद्धालुओं ने हिरणकश्यप वध और नृसिंह अवतार देख खुद को पुण्य का भागीदार बनाय्रा।
शनिवार को लीला के मंचन में जब हिरणकश्यप अपने पुत्र प्रह्वाद को तरह- तरह की यातनाएं देकर हार जाता है तो क्रोधित होकर अपनी बहन होलिका से कहता है कि वह अपनी गोद में प्रह्लाद को लेकर प्रज्ज्वलित अग्नि में चली जाए। क्योंकि होलिका को वरदान था कि वह अग्नि में नहीं जलेगी। जब होलिका ने प्रह्लाद को लेकर अग्नि में प्रवेश किया तो प्रह्लाद का बाल भी बांका नहीं हुआ, पर होलिका जलकर राख हो गई। इसके बाद हिरणकश्यप और क्रोधित हो जाता है। अपने पुत्र को मारने के लिए लोहे के एक खम्भे को गर्म कर प्रह्लाद को उसे गले लगाने के लिए कहता है। एक बार फिर भगवान विष्णु भक्त प्रह्लाद को उबारने आए। खम्भे से भगवान विष्णु नृसिंह के रूप में प्रकट हुए और महल के प्रवेश द्वार की चौखट पर अपने लंबे तेज़ नाखूनों से हिरणकश्पु का वध कर प्रह्लाद के साथ ही पूरे सृष्टि को दैत्य हिरणकश्यपु की प्रताड़ना से मुक्ति दिलाते हैं। इस प्रकार हिरणकश्यपु अनेक वरदानों के बावजूद अपने दुष्कर्मों के कारण भयानक अंत को प्राप्त हुआ।
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शनिवार को लीला के मंचन में जब हिरणकश्यप अपने पुत्र प्रह्वाद को तरह- तरह की यातनाएं देकर हार जाता है तो क्रोधित होकर अपनी बहन होलिका से कहता है कि वह अपनी गोद में प्रह्लाद को लेकर प्रज्ज्वलित अग्नि में चली जाए। क्योंकि होलिका को वरदान था कि वह अग्नि में नहीं जलेगी। जब होलिका ने प्रह्लाद को लेकर अग्नि में प्रवेश किया तो प्रह्लाद का बाल भी बांका नहीं हुआ, पर होलिका जलकर राख हो गई। इसके बाद हिरणकश्यप और क्रोधित हो जाता है। अपने पुत्र को मारने के लिए लोहे के एक खम्भे को गर्म कर प्रह्लाद को उसे गले लगाने के लिए कहता है। एक बार फिर भगवान विष्णु भक्त प्रह्लाद को उबारने आए। खम्भे से भगवान विष्णु नृसिंह के रूप में प्रकट हुए और महल के प्रवेश द्वार की चौखट पर अपने लंबे तेज़ नाखूनों से हिरणकश्पु का वध कर प्रह्लाद के साथ ही पूरे सृष्टि को दैत्य हिरणकश्यपु की प्रताड़ना से मुक्ति दिलाते हैं। इस प्रकार हिरणकश्यपु अनेक वरदानों के बावजूद अपने दुष्कर्मों के कारण भयानक अंत को प्राप्त हुआ।
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