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स्मार्ट फोन ने बढ़ा दी पुस्तकों से दूरी
Updated Tue, 24 Apr 2018 12:36 AM IST
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ज्ञानपुर। व्यक्तित्व के समुचित विकास और ज्ञानार्जन के लिए पुस्तकों से दोस्ती करनी पड़ेगी। पुस्तकों से जितना गहरा लगाव होगा, ज्ञान की गहराई भी उतनी ही अधिक होगी। पुस्तकें ज्ञान देने के साथ ऊर्जा का भी स्रोत होती हैं। ये कहना है बुद्धिजीवियों का। सोमवार को विश्व पुस्तक दिवस पर अमर उजाला के साथ बातचीत में उन्होंने खुलकर अपने विचार रखे।
जिले के साहित्यकार और राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक डॉ. राजकुमार पाठक ने कहा कि स्मार्ट फोन और सोशल मीडिया ने युवा पीढ़ी को पुस्तकों से दूर कर दिया है। इंटरनेट के जमाने में कोई पुस्तकालय जाने की जहमत नहीं उठाना चाहता। पठन-पाठन की घटती प्रवृत्ति वैचारिक गिरावट का कारण बनती जा रही है। लिखने-पढ़ने का चलन कम होने से भविष्य में कई तरह की समस्याएं आएंगी। पत्र लेखन को हिंदी साहित्य में एक विधा के रूप में माना गया है लेकिन, अब यह पुराने जमाने की बात हो गई है। हाईटेक युग में भले ही ई-लाइब्रेरी का चलन बढ़ जाए, लेकिन किताबों से जुड़े रहना हर काल में जरूरी रहेगा, क्योंकि ये ज्ञान का स्थायी स्रोत हैं।
केएन पीजी कॉलेज के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. कमाल अहमद सिद्दीकी कहते हैं कि पुस्तकों और पुस्तकालयों की कोई कमी नहीं है। कमी है तो पढ़ने-पढ़ाने की प्रवृत्ति की। इंटरनेट या अन्य तकनीकी साधनों से हासिल सतही ज्ञान खतरनाक हो सकता है। गहरा ज्ञान चाहिए तो पुस्तकों से जुड़ाव बनाना पड़ेगा। दर्शन हो या विज्ञान, किताबों के अलावा पूर्ण ज्ञान कहीं नहीं मिल सकता। पुस्तकें व्यक्तित्व के पूर्ण विकास की आधारशिला हैं।
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जिले के साहित्यकार और राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक डॉ. राजकुमार पाठक ने कहा कि स्मार्ट फोन और सोशल मीडिया ने युवा पीढ़ी को पुस्तकों से दूर कर दिया है। इंटरनेट के जमाने में कोई पुस्तकालय जाने की जहमत नहीं उठाना चाहता। पठन-पाठन की घटती प्रवृत्ति वैचारिक गिरावट का कारण बनती जा रही है। लिखने-पढ़ने का चलन कम होने से भविष्य में कई तरह की समस्याएं आएंगी। पत्र लेखन को हिंदी साहित्य में एक विधा के रूप में माना गया है लेकिन, अब यह पुराने जमाने की बात हो गई है। हाईटेक युग में भले ही ई-लाइब्रेरी का चलन बढ़ जाए, लेकिन किताबों से जुड़े रहना हर काल में जरूरी रहेगा, क्योंकि ये ज्ञान का स्थायी स्रोत हैं।
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केएन पीजी कॉलेज के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. कमाल अहमद सिद्दीकी कहते हैं कि पुस्तकों और पुस्तकालयों की कोई कमी नहीं है। कमी है तो पढ़ने-पढ़ाने की प्रवृत्ति की। इंटरनेट या अन्य तकनीकी साधनों से हासिल सतही ज्ञान खतरनाक हो सकता है। गहरा ज्ञान चाहिए तो पुस्तकों से जुड़ाव बनाना पड़ेगा। दर्शन हो या विज्ञान, किताबों के अलावा पूर्ण ज्ञान कहीं नहीं मिल सकता। पुस्तकें व्यक्तित्व के पूर्ण विकास की आधारशिला हैं।
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