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स्पष्टवादिता के लिए जाने जाते थे पंडित मायापति
Updated Wed, 31 Jan 2018 02:32 AM IST
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वाराणसी। काशी की गौरवशाली विद्वत परंपरा और राजनीतिक पृष्ठभूमि से जुड़े कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पंडित मायापति त्रिपाठी अपनी स्पष्टवादिता के लिए जाने जाते थे। हर मसले पर खरी बात और नजरिया बिल्कुल स्पष्ट। झुकना स्वभाव में नहीं था और सहमति न होने पर शासन-सत्ता के विरोध से भी कभी हिचके नहीं। अपने पिता पूर्व मुख्यमंत्री पंडित कमलापति त्रिपाठी की राजनीतिक विरासत के बावजूद उन्होंने अपना कॅरियर एक बीमा अधिकारी के रूप में शुरू किया। 1960 के बाद राजनीति में सक्रिय हुए। अखिल भारतीय किसान मजदूर वाहिनी नामक स्वतंत्र संगठन बनाया और इस संगठन के जरिए किसानों-मजदूरों की आवाज उठाते रहे। 1984 में लोकसभा चुनाव भी लड़े। राजनीति के साथ ही कुश्ती और क्रिकेट से उनका खास लगाव था।
‘औरंगाबाद हाउस’ के करीबियों के मुताबिक पंडित मायापति त्रिपाठी शुरू से ही जुझारू प्रवृत्ति के रहे। राजनीतिक जगत के प्रतिष्ठित घराने औरंगाबाद हाउस से जुड़े होने के बावजूद उन्होंने 1956-57 में हिंदुस्तान जनरल इंश्योरेंस कंपनी में बीमा अधिकारी के रूप में अपने कॅरियर की शुरुआत की। 1975 में नेशनल इंश्योरेंस कंपनी के पहले डिवीजनल मैनेजर बने। फिर कांग्रेस का काम करते हुए उन्होंने किसान, मजदूर वर्ग को संगठित कर अखिल भारतीय किसान मजदूर वाहिनी नामक स्वतंत्र संगठन बनाया। उस समय वाहिनी में कार्यकर्ताओं की बड़ी तादाद थी। संगठन के जरिए किसानों, मजदूरों के मसले पर उन्होंने मजबूती से आवाज उठाई। कई बार ऐसे मौके आए जब वह सरकार के खिलाफ किसान-मजदूरों के साथ दृढ़ता से खड़े रहे। हालांकि उनकी राजनीतिक सक्रियता का केंद्र वाराणसी की जगह लखनऊ रहा। वहां अपने पिता पंडित कमलापति त्रिपाठी को आवंटित सरकारी आवास में रहते थे। 1990 में पंडित कमलापति के निधन के बाद आवास खाली कर वह वाराणसी चले आए। यहां पैतृक आवास औरंगाबाद में रहने लगे और राजनीतिक सक्रियता से भी अपने को विरत कर लिया। उनके बेटे अंबरीष त्रिपाठी ने बताया कि पिताजी का खेल से भी काफी लगाव था। कुश्ती, बैडमिंटन और कुश्ती के आयोजनों में वह अक्सर जाया करते थे। खिलाडि़यों को प्रोत्साहित करते थे। वह उत्तर प्रदेश क्रिकेट कमेटी से भी जुड़े रहे। पौत्र पूर्व विधायक ललितेश पति त्रिपाठी ने कहा कि उनका पूरा जीवन किसानों, मजदूरों के हितों के प्रति समर्पित था।
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‘औरंगाबाद हाउस’ के करीबियों के मुताबिक पंडित मायापति त्रिपाठी शुरू से ही जुझारू प्रवृत्ति के रहे। राजनीतिक जगत के प्रतिष्ठित घराने औरंगाबाद हाउस से जुड़े होने के बावजूद उन्होंने 1956-57 में हिंदुस्तान जनरल इंश्योरेंस कंपनी में बीमा अधिकारी के रूप में अपने कॅरियर की शुरुआत की। 1975 में नेशनल इंश्योरेंस कंपनी के पहले डिवीजनल मैनेजर बने। फिर कांग्रेस का काम करते हुए उन्होंने किसान, मजदूर वर्ग को संगठित कर अखिल भारतीय किसान मजदूर वाहिनी नामक स्वतंत्र संगठन बनाया। उस समय वाहिनी में कार्यकर्ताओं की बड़ी तादाद थी। संगठन के जरिए किसानों, मजदूरों के मसले पर उन्होंने मजबूती से आवाज उठाई। कई बार ऐसे मौके आए जब वह सरकार के खिलाफ किसान-मजदूरों के साथ दृढ़ता से खड़े रहे। हालांकि उनकी राजनीतिक सक्रियता का केंद्र वाराणसी की जगह लखनऊ रहा। वहां अपने पिता पंडित कमलापति त्रिपाठी को आवंटित सरकारी आवास में रहते थे। 1990 में पंडित कमलापति के निधन के बाद आवास खाली कर वह वाराणसी चले आए। यहां पैतृक आवास औरंगाबाद में रहने लगे और राजनीतिक सक्रियता से भी अपने को विरत कर लिया। उनके बेटे अंबरीष त्रिपाठी ने बताया कि पिताजी का खेल से भी काफी लगाव था। कुश्ती, बैडमिंटन और कुश्ती के आयोजनों में वह अक्सर जाया करते थे। खिलाडि़यों को प्रोत्साहित करते थे। वह उत्तर प्रदेश क्रिकेट कमेटी से भी जुड़े रहे। पौत्र पूर्व विधायक ललितेश पति त्रिपाठी ने कहा कि उनका पूरा जीवन किसानों, मजदूरों के हितों के प्रति समर्पित था।
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