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सफलता चाहिए तो शार्ट कट नहीं, मेहनत का रास्ता चुनें
Updated Mon, 18 Dec 2017 02:33 AM IST
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वाराणसी/पड़ाव। कामयाबी का कोई शार्ट कट नहीं होता। सफलता में सुविधाएं कम, मेहनत ज्यादा कारगर साबित होती है। मेहनत और लगन के दम पर ही राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई जा सकती है। यह कहना है, पद्मश्री से सम्मानित ओलंपियन अंजू बाबी जार्ज का। रविवार को जयपुरिया स्कूल पड़ाव के वार्षिकोत्सव में आईं अंजू ने अपनी सफलता का श्रेय माता-पिता और कोच को दिया।
‘अमर उजाला’ से बातचीत में अंतराष्ट्रीय एथलीट अंजू ने कहा कि जब वह स्कूल में पढ़ती थीं तब उनका ध्यान पढ़ाई से कहीं अधिक खेलकूद में रहता था। शिक्षकों ने इसकी रिपोर्ट उनके माता-पिता को दी तो उन्होंने उनकी खेल के प्रति रुचि को और प्रोत्साहित किया। वर्ष 1984 में जब वह लीज एलपी स्कूल कोट्टयम में कक्षा दो में पढ़ती थीं तब स्कूल के खेलों में पहली बार भाग लिया और पहला पुरस्कार जीता। इसके बाद तो खेल को उन्होंने अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया। वर्ष 1988 में छठवीं कक्षा में पढ़ाई के दौरान उन्होंने राज्य स्तरीय लंबी कूद प्रतियोगिता में अपना पहला राज्यस्तरीय मेडल जीता। उसके बाद लंबी कूद में ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कामयाबी हासिल करने की ठानी। वर्ष 1991 में जब वह नौवीं कक्षा में थीं तब राष्ट्रीय खेलों की लंबी कूद स्पर्धा में शामिल हुईं और स्वर्ण पदक हासिल किया। इसके बाद कोच केपी थामस के निर्देशन में उन्होंने कड़ी मेहनत की और वर्ष 1996 में दिल्ली जूनियर एशियन चैंपियनशिप में पहली बार प्रतिभाग करने का मौका मिला। वर्ष 2002 में उन्होंने राष्ट्रीय स्तर का अपना पहला पुरस्कार कांस्य पदक के रूप में हासिल किया। इसी साल जब बुसान एशियन खेलों में स्वर्ण पदक मिला तो आत्मविश्वास काफी बढ़ गया और फिर इसके बाद तो सफर तक ओलंपिक तक पहुंच गया।
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‘अमर उजाला’ से बातचीत में अंतराष्ट्रीय एथलीट अंजू ने कहा कि जब वह स्कूल में पढ़ती थीं तब उनका ध्यान पढ़ाई से कहीं अधिक खेलकूद में रहता था। शिक्षकों ने इसकी रिपोर्ट उनके माता-पिता को दी तो उन्होंने उनकी खेल के प्रति रुचि को और प्रोत्साहित किया। वर्ष 1984 में जब वह लीज एलपी स्कूल कोट्टयम में कक्षा दो में पढ़ती थीं तब स्कूल के खेलों में पहली बार भाग लिया और पहला पुरस्कार जीता। इसके बाद तो खेल को उन्होंने अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया। वर्ष 1988 में छठवीं कक्षा में पढ़ाई के दौरान उन्होंने राज्य स्तरीय लंबी कूद प्रतियोगिता में अपना पहला राज्यस्तरीय मेडल जीता। उसके बाद लंबी कूद में ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कामयाबी हासिल करने की ठानी। वर्ष 1991 में जब वह नौवीं कक्षा में थीं तब राष्ट्रीय खेलों की लंबी कूद स्पर्धा में शामिल हुईं और स्वर्ण पदक हासिल किया। इसके बाद कोच केपी थामस के निर्देशन में उन्होंने कड़ी मेहनत की और वर्ष 1996 में दिल्ली जूनियर एशियन चैंपियनशिप में पहली बार प्रतिभाग करने का मौका मिला। वर्ष 2002 में उन्होंने राष्ट्रीय स्तर का अपना पहला पुरस्कार कांस्य पदक के रूप में हासिल किया। इसी साल जब बुसान एशियन खेलों में स्वर्ण पदक मिला तो आत्मविश्वास काफी बढ़ गया और फिर इसके बाद तो सफर तक ओलंपिक तक पहुंच गया।
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