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यादगार हुई पखावज-सारंगी की जुगलबंदी
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वाराणसी। महाराज बनारस विद्या मंदिर न्यास व ध्रुपद समिति के तत्वावधान में तुलसीघाट पर चल रहे 45वें ध्रुपद मेले का सोमवार को समापन हो गया। अंतिम निशा में गायन, वादन की प्रस्तुति से कलाकारों ने आयोजन को यादगार बना दिया। समारोह में देश-विदेश से आए कलाकारों को संकट मोचन मंदिर के महंत प्रो. विश्वंभर नाथ मिश्र और राजपरिवार के अनंत नारायण सिंह ने पुरस्कृत किया।
ध्रुपद मेले के अंतिम दिन की शुरूआत आस्ट्रिया के पखावज वादक हेलमुट बाईबर ने पखावज बजाकर किया। इसमें उन्होंने चौताल में अलग-अलग लय में सारंगी बजाई। इसमें ध्रुव सहाय ने संगत की। इसके बाद जगत नारायण पाठक ने गायन में चौताल में निबद्ध रचना से शुरूआत की। इसके बाद राग पुरिया धनाश्री में निबद्ध चतुरंग ध प म ग रे से सुनाया। पखावज पर निशांत और सारंगी पर विनायक सहायक ने संगत किया। इसी कड़ी में मास्को से आए इवान मुरालोव ने सुरबहार वादन की प्रस्तुति की। इसमें राग कौहास में आलाप के साथ चौताल में निबद्ध रचना और सूलताल में निबद्ध रचना से समापन किया। इसके बाद जयपुर से मधु भट्ट तैलंग ने गायन, भाजन सोपोरी ने संतूर बजाया। कार्यक्रम का संचालन संस्थापक सदस्य पद्मश्री पं. राजेश्वर आचार्य ने किया।
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ध्रुपद मेले के अंतिम दिन की शुरूआत आस्ट्रिया के पखावज वादक हेलमुट बाईबर ने पखावज बजाकर किया। इसमें उन्होंने चौताल में अलग-अलग लय में सारंगी बजाई। इसमें ध्रुव सहाय ने संगत की। इसके बाद जगत नारायण पाठक ने गायन में चौताल में निबद्ध रचना से शुरूआत की। इसके बाद राग पुरिया धनाश्री में निबद्ध चतुरंग ध प म ग रे से सुनाया। पखावज पर निशांत और सारंगी पर विनायक सहायक ने संगत किया। इसी कड़ी में मास्को से आए इवान मुरालोव ने सुरबहार वादन की प्रस्तुति की। इसमें राग कौहास में आलाप के साथ चौताल में निबद्ध रचना और सूलताल में निबद्ध रचना से समापन किया। इसके बाद जयपुर से मधु भट्ट तैलंग ने गायन, भाजन सोपोरी ने संतूर बजाया। कार्यक्रम का संचालन संस्थापक सदस्य पद्मश्री पं. राजेश्वर आचार्य ने किया।
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