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आयुर्वेद बन चुका है सबकी आवश्यकता : वैद्य देवेंद्र त्रिगुण
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वाराणसी। बनारस विद्या एवं आयुर्वेद चिकित्सा की प्राचीन काल से ही राजधानी रही है। बीएचयू को वर्तमान समय में आयुर्वेद की प्रैक्टिस पर जोर देना चाहिए साथ ही सभी सरकारी चिकित्सा संस्थानों में शुद्ध आयुर्वेद की चिकित्सा विधि को बढ़ावा देने की आवश्यकता है क्योंकि आयुर्वेद सबकी आवश्यकता बन चुकी है। उक्त विचार पद्मभूषण वैद्य देवेंद्र त्रिगुणा ने व्यक्त किए। वह गुरुवार को बीएचयू के आयुर्वेद संकाय में आयोजित वर्ल्ड कांग्रेस ऑफ आयुर्वेदा को बतौर मुख्य अतिथि संबोधित कर रहे थे।
आदेश विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. जीपीआई सिंह ने कहा कि आने वाला समय आयुर्वेद का है। डॉ. अशोक ने महामना अभियान फार ग्लोबल कायाकल्प की संकल्पना के बारे में बताया तथा इसे लागू करने पर जोर दिया। संकाय प्रमुख यामिनी भूषण त्रिपाठी ने बताया कि आयुर्वेद का विकास तभी हो सकता है जब जड़ भी हमारी हो और शाखाएं भी हमारी। कुलपति प्रो. राकेश भटनागर ने बताया कि कोई ऐसी औषधि नहीं है जिसका दुष्प्रभाव न हो परंतु अधिकतम आयुर्वेदिक दवाइयां प्राकृतिक उत्पाद होने के कारण या तो दुष्प्रभावरहित हैं या बहुत कम दुष्प्रभाव है।
कार्यक्रम का शुभारंभ प्रो. सीएस पांडेय के मंगलाचरण से हुआ। 31 साल बाद हो रहे कार्यक्रम में 1100 देश एवं विदेश के प्रतिभागियों ने पंजीकरण कराया। इसमें 30 प्रतिभागी अमेरिका, जर्मनी, रूस, स्विटजरलैंड, नेपाल एवं श्रीलंका से आए हैं। संचालन डॉ. आशुतोश पाठक एवं डॉ. शोभा भट्ट ने किया। अतिथियों का स्वागत निदेशक प्रो. एके अस्थाना ने किया। इस दौरान प्रो. वीपी सिंह, वैद्य सुशील कुमार दुबे, डॉ. नम्रता जोशी, डॉ. नरसिंह मूर्ति, डॉ. अनुराग पांडेय, डॉ. सुदामा सिंह यादव, डॉ. पीएस व्याडगी, डॉ. जसमीत, डॉ. अजय पांडेय, डॉ. एके द्विवेदी आदि रहे।
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आदेश विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. जीपीआई सिंह ने कहा कि आने वाला समय आयुर्वेद का है। डॉ. अशोक ने महामना अभियान फार ग्लोबल कायाकल्प की संकल्पना के बारे में बताया तथा इसे लागू करने पर जोर दिया। संकाय प्रमुख यामिनी भूषण त्रिपाठी ने बताया कि आयुर्वेद का विकास तभी हो सकता है जब जड़ भी हमारी हो और शाखाएं भी हमारी। कुलपति प्रो. राकेश भटनागर ने बताया कि कोई ऐसी औषधि नहीं है जिसका दुष्प्रभाव न हो परंतु अधिकतम आयुर्वेदिक दवाइयां प्राकृतिक उत्पाद होने के कारण या तो दुष्प्रभावरहित हैं या बहुत कम दुष्प्रभाव है।
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कार्यक्रम का शुभारंभ प्रो. सीएस पांडेय के मंगलाचरण से हुआ। 31 साल बाद हो रहे कार्यक्रम में 1100 देश एवं विदेश के प्रतिभागियों ने पंजीकरण कराया। इसमें 30 प्रतिभागी अमेरिका, जर्मनी, रूस, स्विटजरलैंड, नेपाल एवं श्रीलंका से आए हैं। संचालन डॉ. आशुतोश पाठक एवं डॉ. शोभा भट्ट ने किया। अतिथियों का स्वागत निदेशक प्रो. एके अस्थाना ने किया। इस दौरान प्रो. वीपी सिंह, वैद्य सुशील कुमार दुबे, डॉ. नम्रता जोशी, डॉ. नरसिंह मूर्ति, डॉ. अनुराग पांडेय, डॉ. सुदामा सिंह यादव, डॉ. पीएस व्याडगी, डॉ. जसमीत, डॉ. अजय पांडेय, डॉ. एके द्विवेदी आदि रहे।
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