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सात समंदर पार, सुरों का गुलदस्ता ‘सुर बहार’
Updated Tue, 05 Dec 2017 02:06 AM IST
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वाराणसी। वीणा अंग से निकले प्राचीन वाद्य ‘सुर बहार’ के तारों पर झंकृत लय आने वाले समय में सात समंदर पार तक गूंजने वाली है। बर्लिन यूनिवर्सिटी के अलावा कनाडा में पं. शिवनाथ मिश्र अपने पुत्र युवा कलाकार पं. देवव्रत मिश्र के साथ इस साज से संगीत प्रेमियों को परिचित कराएंगे। इस साज पर बनारस घराने की गायकी के माधुर्य को रागों, बंदिशों के जरिए जाहिर करेंगे। खास बात यह है कि ध्रुपद शैली के इस वाद्ययंत्र को अब उनकी तीसरी पीढ़ी ने थाम लिया है। कुछ विदेशी शिष्य भी बनारस आकर उनसे सुर बहार सीख रहे हैं।
रागों की अवतारणा से बादलों की उमड़-घुमड़ पैदा करने वाले पं. तानसेन के समय से ही ‘सुर बहार’ राजघरानों में लगने वाली महफिलों की पहली पसंद हुआ करता था। मधुर स्वरों वाले साज सितार की लोकप्रियता के बाद ध्रुपद शैली का यह वाद्ययंत्र हाशिये पर चला गया था। इस साज को बजाने वाले अब गिनती के रह गए हैं। बनारस में पं. शिवनाथ ने अपने पुत्र को सुर बहार में पारंगत किया था। इसके बाद अब उनके पौत्र कृष्णा इस साज पर रियाज कर रहे हैं।
सोमवार को सुर बहार पर एक साथ तीन पीढ़ी ने राग जय जयवंती की अवतारणा की तो लोग बरबस झूमने लगे। चौताल के बाद, सूलताल और फिर धम्मार ताल में उन्होंने गतकारी की। गहरी मीड के साथ मुर्कियों के प्रयोग सुरों के गांभीर्य को दर्शाते हैं। पं. शिवनाथ बताते हैं कि यह वो कठिन साज है, जिसे राज दरबारों में तब बजाया जाता था, जब साउंड सिस्टम का इस्तेमाल प्रचलन में नहीं था। अब इस साज को ध्रुपद के मंचों पर ही जगह मिलती है। उनका कहना है कि आने वाले दिनों में सुर बहार सुरों के गुलदस्ते के रूप में वापसी करेगा।
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रागों की अवतारणा से बादलों की उमड़-घुमड़ पैदा करने वाले पं. तानसेन के समय से ही ‘सुर बहार’ राजघरानों में लगने वाली महफिलों की पहली पसंद हुआ करता था। मधुर स्वरों वाले साज सितार की लोकप्रियता के बाद ध्रुपद शैली का यह वाद्ययंत्र हाशिये पर चला गया था। इस साज को बजाने वाले अब गिनती के रह गए हैं। बनारस में पं. शिवनाथ ने अपने पुत्र को सुर बहार में पारंगत किया था। इसके बाद अब उनके पौत्र कृष्णा इस साज पर रियाज कर रहे हैं।
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सोमवार को सुर बहार पर एक साथ तीन पीढ़ी ने राग जय जयवंती की अवतारणा की तो लोग बरबस झूमने लगे। चौताल के बाद, सूलताल और फिर धम्मार ताल में उन्होंने गतकारी की। गहरी मीड के साथ मुर्कियों के प्रयोग सुरों के गांभीर्य को दर्शाते हैं। पं. शिवनाथ बताते हैं कि यह वो कठिन साज है, जिसे राज दरबारों में तब बजाया जाता था, जब साउंड सिस्टम का इस्तेमाल प्रचलन में नहीं था। अब इस साज को ध्रुपद के मंचों पर ही जगह मिलती है। उनका कहना है कि आने वाले दिनों में सुर बहार सुरों के गुलदस्ते के रूप में वापसी करेगा।
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