Varanasi: 104 वर्षीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सीताराम शास्त्री का निधन, कुछ दिन पहले जाहिर की थी अंतिम इच्छा
देश की आजादी के आंदोलन में सहभागिता निभाने वाले वाराणसी के जंसा के डीह गंजारी गांव निवासी 104 वर्षीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सीताराम शास्त्री का निधन हो गया। उन्होंने अमर उजाला से बातचीत में अपनी अंतिम इच्छा जाहिर की थी।
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देश की आजादी के आंदोलन में सहभागिता निभाने वाले जंसा के डीह गंजारी गांव निवासी 104 वर्षीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सीताराम शास्त्री का रविवार की भोर में निधन हो गया। निधन की सूचना मिलते ही समूचे क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई। राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार हरिश्चंद्र घाट पर हुआ। मुखाग्नि उनके पुत्र वीरेंद्र नारायण ने दी।
हरिश्चंद्र घाट पर अंतिम संस्कार के पूर्व पुलिस के सशस्त्र जवानों ने अंतिम सलामी दी। आजादी की लड़ाई में बढ़चढ़कर हिस्सा लेने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सीताराम शास्त्री शांत एवं मिलनसार स्वभाव के व्यक्ति थे। आजादी के बाद सामाजिक एवं धार्मिक कार्यक्रमों में उनकी सक्रियता निरंतर रही है।
वह जगतपुर इंटर काॅलेज में प्रवक्ता पद से सेवानिवृत्त हुए थे। निधन की सूचना मिलते ही उनके आवास पर श्रद्धांजलि व्यक्त करने वालों का तांता लगा रहा। अंतिम यात्रा उनके गंजारी स्थित आवास से प्रारंभ हुई। इसमें तहसीलदार सुलेखा वर्मा, एसीपी अंजनी कुमार राय, थाना प्रभारी जंसा राकेश पाल, चौकी प्रभारी गौरव मिश्रा समेत क्षेत्रवासी शामिल हुए।
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भारत में ही दोबारा जन्म लेने की थी अंतिम ख्वाहिश
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सीताराम शास्त्री की अंतिम ख्वाहिश थी कि वह दोबारा जन्म लेकर देश से भ्रष्टाचार का खात्मा करें। उन्होंने अमर उजाला से बातचीत में अपनी अंतिम इच्छा जाहिर की थी। उनका कहना था कि यह जन्म तो मां भारती को स्वतंत्रता दिलाकर सफल हो गया। तब ऐसा जुनून था कि जान भी चली जाती तो कोई गम नहीं था। अब तो यह जीवन जी चुका हूं।
उन्होंने अपनी इच्छा व्यक्त करते हुए कहा था अब वे जीवन के अंतिम पड़ाव पर मां भारती से यही प्रार्थना करते हैं कि अगला जन्म भी भारत भूमि में ही मिले। कहा था कि वह पुनर्जन्म में विश्वास करते हैं और अगले जन्म में भारत भूमि में जन्म लेकर भ्रष्टाचार के खात्मे के लिए संघर्ष करेंगे। सीताराम शास्त्री स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के साथ शिक्षक भी थे। इसलिए वे बार-बार शिक्षकों से राष्ट्र निर्माता की भूमिका निभाने का आह्वान करते थे। उनकी इच्छा थी कि स्वतंत्र भारत का हर एक बच्चा शिक्षित होना चाहिए। उन्होंने अमर उजाला के सामाजिक मुद्दे उठाने और विभिन्न पक्षों को लेकर चलाए जा रहे अभियानों की खूब सराहना की थी।