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Unnao News: मरीजों की जान से खेल रहे अस्पताल
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उन्नाव। अजगैन मेडिकल सेंटर में प्रसव के लिए भर्ती महिला की मौत के बाद परिजनों ने लापरवाही का आरोप लगाया था। यह पहला मामला नहीं है जिसमें परिजनों ने अस्पताल प्रशासन की लापरवाही से मरीज की मौत होने के आरोप लगाए हैं। इसके बावजूद स्वास्थ्य विभाग ऐसे अस्पतालों पर कार्रवाई करने से कतरा रहा है।
स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के मुताबिक जनपद में 173 निजी अस्पतालों का संचालन किया जाता है। इन अस्पतालों में मरीजों को बेहतर चिकित्सकीय सुविधाएं देने के लिए डॉक्टर व प्रशिक्षित स्टाफ होने का दावा किया जाता है जबकि अधिकांश निजी अस्पतालों में न तो एमबीबीएस डॉक्टर हैं और न तो प्रशिक्षित स्टाफ। विभागीय जानकारों के मुताबिक लाइसेंस के लिए नर्सिंगहोम या निजी अस्पताल को स्टेट या नेशनल मेडिकल काउंसिल से पंजीकृत चिकित्सक, प्रशिक्षित नर्सिंग स्टाफ, फार्मासिस्ट, लैब टेक्नीशियन और इमरजेंसी मेडिसिन की व्यवस्था अनिवार्य है। इसके साथ ही आवश्यक चिकित्सकीय उपकरण, बायोमेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट, फायर सेफ्टी और आपातकालीन सेवाएं सुनिश्चित करना भी जरूरी है जबकि जनपद के अधिकांश निजी अस्पतालों में अधिकांश मानक पूरे नहीं हैं।
कई संचालक लाइसेंस के लिए किसी एमबीबीएस डॉक्टर के नाम पर पंजीकरण करा लेते हैं जबकि वास्तव में वह डॉक्टर मौके पर मौजूद ही नहीं होता। ऐसे में जब मरीज की हालत गंभीर होती है तो अप्रशिक्षित स्टाफ उसे संभाल नहीं पाता और मौत हो जाती है।
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19 दिन में दो मरीजों की मौत
माखी थानाक्षेत्र के बिरसिंहपुर गांव निवासी सविता देवी को परिजनों ने उपचार के लिए आसीवन के शाश्वत अस्पताल में भर्ती कराया था। पांच अगस्त को उनकी मौत हो गई थी। परिजनों ने डॉक्टरों पर गलत इंजेक्शन और खराब खून चढ़ाने के आरोप लगाए थे। इसके बाद अस्पताल को सील कर संचालक के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी। वहीं 20 जुलाई को अकरमपुर स्थित होप अस्पताल में महिला की मौत हो गई। इसके बाद परिजनों ने गलत इलाज के चलते मौत होने के आरोप लगाकर न्यायालय की शरण ली थी। न्यायालय के आदेश पर अस्पताल संचालक, पैथोलॉजी के डॉक्टर व कर्मी समेत चार लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी।
वर्जन...
अस्पतालों को लाइसेंस जारी करने से पहले सभी मानकों की जांच की जाती है। मानक पूरे होने के बाद ही अस्पताल का लाइसेंस जारी किया जाता है। मानक विहीन अस्पतालों के खिलाफ समय-समय पर अभियान चलाया जाता है। बगैर मानक संचालित अस्पतालों पर जल्द कार्रवाई की जाएगी। -डॉ. नरेंद्र सिंह, एसीएमओ
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स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के मुताबिक जनपद में 173 निजी अस्पतालों का संचालन किया जाता है। इन अस्पतालों में मरीजों को बेहतर चिकित्सकीय सुविधाएं देने के लिए डॉक्टर व प्रशिक्षित स्टाफ होने का दावा किया जाता है जबकि अधिकांश निजी अस्पतालों में न तो एमबीबीएस डॉक्टर हैं और न तो प्रशिक्षित स्टाफ। विभागीय जानकारों के मुताबिक लाइसेंस के लिए नर्सिंगहोम या निजी अस्पताल को स्टेट या नेशनल मेडिकल काउंसिल से पंजीकृत चिकित्सक, प्रशिक्षित नर्सिंग स्टाफ, फार्मासिस्ट, लैब टेक्नीशियन और इमरजेंसी मेडिसिन की व्यवस्था अनिवार्य है। इसके साथ ही आवश्यक चिकित्सकीय उपकरण, बायोमेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट, फायर सेफ्टी और आपातकालीन सेवाएं सुनिश्चित करना भी जरूरी है जबकि जनपद के अधिकांश निजी अस्पतालों में अधिकांश मानक पूरे नहीं हैं।
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कई संचालक लाइसेंस के लिए किसी एमबीबीएस डॉक्टर के नाम पर पंजीकरण करा लेते हैं जबकि वास्तव में वह डॉक्टर मौके पर मौजूद ही नहीं होता। ऐसे में जब मरीज की हालत गंभीर होती है तो अप्रशिक्षित स्टाफ उसे संभाल नहीं पाता और मौत हो जाती है।
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19 दिन में दो मरीजों की मौत
माखी थानाक्षेत्र के बिरसिंहपुर गांव निवासी सविता देवी को परिजनों ने उपचार के लिए आसीवन के शाश्वत अस्पताल में भर्ती कराया था। पांच अगस्त को उनकी मौत हो गई थी। परिजनों ने डॉक्टरों पर गलत इंजेक्शन और खराब खून चढ़ाने के आरोप लगाए थे। इसके बाद अस्पताल को सील कर संचालक के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी। वहीं 20 जुलाई को अकरमपुर स्थित होप अस्पताल में महिला की मौत हो गई। इसके बाद परिजनों ने गलत इलाज के चलते मौत होने के आरोप लगाकर न्यायालय की शरण ली थी। न्यायालय के आदेश पर अस्पताल संचालक, पैथोलॉजी के डॉक्टर व कर्मी समेत चार लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी।
वर्जन...
अस्पतालों को लाइसेंस जारी करने से पहले सभी मानकों की जांच की जाती है। मानक पूरे होने के बाद ही अस्पताल का लाइसेंस जारी किया जाता है। मानक विहीन अस्पतालों के खिलाफ समय-समय पर अभियान चलाया जाता है। बगैर मानक संचालित अस्पतालों पर जल्द कार्रवाई की जाएगी। -डॉ. नरेंद्र सिंह, एसीएमओ