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61 वर्ष पुराने ऐतिहासिक दुर्गापूजा महोत्सव पर लगा कोरोना का ग्रहण 16-36-56
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सुल्तानपुर। 61 वर्ष से चले आ रहे दुर्गापूजा महोत्सव की परंपरा पर कोरोना का ग्रहण लग गया है। जिला प्रशासन ने अब तक दुर्गापूजा महोत्सव के लिए अनुमति नहीं प्रदान की है। पिछले वर्ष तक जिले में कुल 895 स्थानों पर दुर्गा प्रतिमाएं स्थापित होती रही हैं।
जिले में दुर्गापूजा महोत्सव का बड़ा महत्व है। पूरे जनपद में इस महोत्सव को उल्लास के साथ मनाया जाता है। शहर में ही करीब 200 पंडाल बनाए जाते हैं। ग्रामीण अंचलों को मिला लिया जाय तो यह संख्या 895 हो जाती है। इसमें देवी के अलग-अलग रूप की मूर्तियां स्थापित होती हैं।
कहीं सुपारी से निर्मित प्रतिमा तो कहीं रुद्राक्ष से निर्मित देवी प्रतिमा स्थापित की जाती हैं। ठठेरी बाजार में बड़ी दुर्गा की स्थापना की जाती है। बाटा गली में गुफा बनाकर देवी प्रतिमा स्थापित होती हैं। विवेकनगर, करौंदिया, लखनऊ नाका, शाहगंज चौराहा समेत अन्य प्रमुख मोहल्लों में देवी प्रतिमाएं आयोजित कर दुर्गापूजा महोत्सव मनाया जाता है।
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इस बार अभी तक दुर्गापूजा महोत्सव की कोई तैयारी होती दिख नहीं रही है। अब तक जिला प्रशासन ने दुर्गापूजा महोत्सव के लिए अनुमति नहीं दी है। ऐसे में लोग घर पर ही देवी दुर्गा का पूजा-पाठ कर सकेंगे।
बॉक्स
जिले में दुर्गापूजा का शुभारंभ 1959 में ठठेरी बाजार में भिखारीलाल सोनी व उनके सहयोगियों ने शुरू किया था। यहां से शुरू हुआ दुर्गापूजा का सिलसिला समय के साथ ही बढ़ता ही गया। दूसरी मूर्ति की स्थापना रुहट्ठा गली में बंगाली प्रसाद सोनी ने 1961 में कराई।
1970 में दो प्रतिमाएं और जुड़ीं। इसके अगले वर्ष कालीचरन ने श्री संतोषी माता और राजेंद्र प्रसाद (रज्जन सेठ) ने मां सरस्वती की प्रतिमा की स्थापना कराई। 1973 में श्री अष्टभुजी माता, श्री अंबे माता, श्री गायत्री माता, श्री अन्नपूर्णा माता की स्थापना के साथ ही दुर्गापूजा महोत्सव में तब्दील हो गया।
शहर के दुर्गापूजा महोत्सव से प्रेरित होकर जिले केे सभी तहसीलों व कस्बाई क्षेत्रों में भी प्रतिमाओं की स्थापना की जाने लगी है। जिले का दुर्गापूजा महोत्सव भव्यता के लिहाज से पूरे देश में प श्चिम बंगाल के बाद दूसरे स्थान पर माना जाता है।
दुर्गापूजा महोत्सव से जुड़े व्यवसायियों पर आर्थिक मार पड़ेगी। पूजा प्रतिबंधित होने से टेंट हाउस व्यवसायी, साउंड, लाइट का काम करने वाले लोगों का रोजगार छिनेगा। इसके साथ ही विसर्जन यात्रा में बैंड व डीजे बजाने वाले लोगों को भी आर्थिक नुकसान होगा। दुर्गापूजा महोत्सव में आस-पड़ोस के जनपद से लोग मेला देखने पहुंचते हैं। इसकी वजह से स्थानीय व्यवसायियों को लाभ होता है। मेलार्थियों के नहीं आने से उन्हें भी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ेगा।
दुर्गापूजा महोत्सव पर ब्रेक लगने की आशंका के बीच शहर में कलाकार छोटी प्रतिमाएं बनाने में जुट गए हैं। ये प्रतिमाएं घरों में आसानी से स्थापित की जा सकती हैं। बस स्टेशन के पीछे स्थित पार्क में दुर्गा प्रतिमाओं के बनाने का काम मूर्तिकार कर रहे हैं। मूर्तिकारों ने बताया कि बड़ी प्रतिमाओं के ऑर्डर इस बार नहीं मिले हैं। घरों में स्थापित करने के लिए कई लोगों ने प्रतिमा बनाने के ऑर्डर दिए हैं।
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जिले में दुर्गापूजा महोत्सव का बड़ा महत्व है। पूरे जनपद में इस महोत्सव को उल्लास के साथ मनाया जाता है। शहर में ही करीब 200 पंडाल बनाए जाते हैं। ग्रामीण अंचलों को मिला लिया जाय तो यह संख्या 895 हो जाती है। इसमें देवी के अलग-अलग रूप की मूर्तियां स्थापित होती हैं।
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कहीं सुपारी से निर्मित प्रतिमा तो कहीं रुद्राक्ष से निर्मित देवी प्रतिमा स्थापित की जाती हैं। ठठेरी बाजार में बड़ी दुर्गा की स्थापना की जाती है। बाटा गली में गुफा बनाकर देवी प्रतिमा स्थापित होती हैं। विवेकनगर, करौंदिया, लखनऊ नाका, शाहगंज चौराहा समेत अन्य प्रमुख मोहल्लों में देवी प्रतिमाएं आयोजित कर दुर्गापूजा महोत्सव मनाया जाता है।
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इस बार अभी तक दुर्गापूजा महोत्सव की कोई तैयारी होती दिख नहीं रही है। अब तक जिला प्रशासन ने दुर्गापूजा महोत्सव के लिए अनुमति नहीं दी है। ऐसे में लोग घर पर ही देवी दुर्गा का पूजा-पाठ कर सकेंगे।
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जिले में दुर्गापूजा का शुभारंभ 1959 में ठठेरी बाजार में भिखारीलाल सोनी व उनके सहयोगियों ने शुरू किया था। यहां से शुरू हुआ दुर्गापूजा का सिलसिला समय के साथ ही बढ़ता ही गया। दूसरी मूर्ति की स्थापना रुहट्ठा गली में बंगाली प्रसाद सोनी ने 1961 में कराई।
1970 में दो प्रतिमाएं और जुड़ीं। इसके अगले वर्ष कालीचरन ने श्री संतोषी माता और राजेंद्र प्रसाद (रज्जन सेठ) ने मां सरस्वती की प्रतिमा की स्थापना कराई। 1973 में श्री अष्टभुजी माता, श्री अंबे माता, श्री गायत्री माता, श्री अन्नपूर्णा माता की स्थापना के साथ ही दुर्गापूजा महोत्सव में तब्दील हो गया।
शहर के दुर्गापूजा महोत्सव से प्रेरित होकर जिले केे सभी तहसीलों व कस्बाई क्षेत्रों में भी प्रतिमाओं की स्थापना की जाने लगी है। जिले का दुर्गापूजा महोत्सव भव्यता के लिहाज से पूरे देश में प श्चिम बंगाल के बाद दूसरे स्थान पर माना जाता है।
दुर्गापूजा महोत्सव से जुड़े व्यवसायियों पर आर्थिक मार पड़ेगी। पूजा प्रतिबंधित होने से टेंट हाउस व्यवसायी, साउंड, लाइट का काम करने वाले लोगों का रोजगार छिनेगा। इसके साथ ही विसर्जन यात्रा में बैंड व डीजे बजाने वाले लोगों को भी आर्थिक नुकसान होगा। दुर्गापूजा महोत्सव में आस-पड़ोस के जनपद से लोग मेला देखने पहुंचते हैं। इसकी वजह से स्थानीय व्यवसायियों को लाभ होता है। मेलार्थियों के नहीं आने से उन्हें भी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ेगा।
दुर्गापूजा महोत्सव पर ब्रेक लगने की आशंका के बीच शहर में कलाकार छोटी प्रतिमाएं बनाने में जुट गए हैं। ये प्रतिमाएं घरों में आसानी से स्थापित की जा सकती हैं। बस स्टेशन के पीछे स्थित पार्क में दुर्गा प्रतिमाओं के बनाने का काम मूर्तिकार कर रहे हैं। मूर्तिकारों ने बताया कि बड़ी प्रतिमाओं के ऑर्डर इस बार नहीं मिले हैं। घरों में स्थापित करने के लिए कई लोगों ने प्रतिमा बनाने के ऑर्डर दिए हैं।