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Sultanpur News: समितियों पर डीएपी खत्म, निजी दुकानों के गोदाम भरे
Sun, 10 Nov 2024 01:18 AM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, सुल्तानपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, सुल्तानपुर
Updated Sun, 10 Nov 2024 01:18 AM IST
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खाद नहीं मिलने पर नाराजगी व्यक्त करते किसान।
सुल्तानपुर। रबी की प्रमुख फसल गेहूं बोआई की शुरुआत में 114 समितियों से डीएपी खत्म हो गई है। किसानों के सामने निजी दुकानों पर मौजूद करीब 1800 मीट्रिक टन डीएपी खरीदने की मजबूरी बन गई है।
पांच समितियों पर शुक्रवार को बची डीएपी शनिवार को तकरीबन समाप्त हो गई। उर्वरक की नई रैक 15 नवंबर तक आने के बाद ही किसानों को समितियों से डीएपी मिल सकेगी।
जिले में डीएपी की किल्लत से किसान परेशान हैं। शनिवार को कुड़वार के रवनिया पश्चिम और अझुई में 200-200 बोरी डीएपी के वितरण की सूचना मिलते किसान सुबह से टूट पड़े। बड़ी संख्या में किसानों के पहुंचने से ही अव्यवस्था उत्पन्न हो गई। शाम तक डीएपी खत्म हो गई। सैकड़ों किसानों को निराश होकर लौटना पड़ा। समिति के रवनिया पश्चिम के सचिव काशी प्रसाद शुक्ल ने बताया 200 बोरी डीएपी आई थी। अझुई के सचिव विजय पाठक ने बताया कि किसानों की संख्या हजारों में रही। इसकी वजह से उर्वरक कम पड़ गई। सेमरी, कल्याणपुर, लंभुआ, दूबेपुर समेत शेष समितियों पर किसान डीएपी पहुंचने की सूचना सुबह से लगाते रहे। फिलहाल उन्हें समितियों पर 15 नवंबर के बाद डीएपी मिलने की संभावना बनी है।
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बायोमीट्रिक पर अंगुली के निशान नहीं मिलने से मिली निराशा
लंभुआ। रामपुर कुर्मियान के किसान बद्री प्रसाद वर्मा ने बताया कि आलू की बोआई के लिए डीएपी के लिए लंभुआ आया था, लेकिन डीएपी नहीं मिली। आलू बोआई पिछड़ रही है। भरखरी निवासी सुरेंद्र सिंह ने बताया कि गेहूं की बोआई के लिए डीएपी की जरूरत है। समितियों पर डीएपी नहीं मिल पा रही है। अब बोआई की चिंता है। रवनिया पश्चिम समिति पर सुबह आठ बजे पहुंचे नरही के किसान राम प्रसाद यादव ने बताया कि दोपहर के करीब नंबर आया तो मेरा फिंगर नहीं लगा। इसकी वजह से खाद नहीं मिली। किसान मनोज ने बताया कि इस बार खाद लेने में बड़ी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। लगता है कि बोआई पिछड़ जाएगी। पिपरी के अजय सिंह ने बताया कि डीएपी की वजह से सरसों, मटर, मसूड़ आदि की बोआई पिछड़ रही है। अब प्राइवेट दुकानों से खाद लेनी पड़ेगी।
अभी तक रबी में मिली 5500 मीट्रिक टन डीएपी
डीएपी की चल रही कमी को देखते हुए प्रशासन ने डीएपी के वितरण को अपने हाथों में ले लिया है। डीएपी के पहुंचते ही प्रशासन व पुलिस की देखरेख में वितरण कराया जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक यूक्रेन व रुस के चल युद्ध की वजह पिछले वर्ष से शुरू हुई डीएपी की दिक्कत इस बार किसानों पर ज्यादा पड़ गई है। जिले में पहले से मौजूद करीब 1800 मीट्रिक टन डीएपी का स्टॉक अक्तूबर में खाली हो जाने से ज्यादा संकट बढ़ गया है। इस मौसम में 15,500 मीट्रिक टन के लक्ष्य के सापेक्ष नवंबर तक 5500 मीट्रिक टन मिली डीएपी खत्म हो गई है।
रबी में बोई जाने वाली फसलों का अनुमानित रकबा
फसल- रकबा
गेहूं- 1,23,001 हेक्टेयर
जौ- 14,31 हेक्टेयर
मक्का- 47 हेक्टेयर
चना- 5373 हेक्टेयर
मटर- 8137 हेक्टेयर
मसूर- 5504 हेक्टेयर
तोरिया- 2769 हेक्टेयर
सरसों- 3443 हेक्टेयर
अलसी- 51 हेक्टेयर
एनपीके का प्रयोग करके भूमि की बचाएं उर्वरा शक्ति
डीएपी की कमी को देखते हुए कृषि विभाग एनपीके का प्रयोग करने की सलाह दे रहा है। कृषि विभाग का कहना है कि एनपीके में नाइट्रोजन, पोटैशियम व फास्फोरस की मात्रा होती है, जबकि डीएपी में सिर्फ नाइट्रोजन व फास्फोरस पाया जाता है। फास्फोरस अधिक होने से वह जमीन में एक फसल में नहीं खप पाता है। इसकी वजह से जमीन की उर्वरा शक्ति कम हो रही है। विभाग की ओर से जमीन की उर्वरा शक्ति बनाए रखने के लिए जैविक रसायनों व नैनो डीएपी के प्रयोग की भी सलाह दी जा रही है।
पहले से लोगों के स्टाक करने से हुई कमी
जिला कृषि अधिकारी सदानंद ने कहा कि अभी गेहूं की बोआई शुरू हो रही है। लोग पहले से खरीद कर बोआई का प्रबंध करने में लगे हैं। इसकी वजह से डीएपी की कुछ कमी आई है। 2600 मीट्रिक टन की रैक 15 नवंबर तक आ जाएगी। इसके बाद दिक्कत खत्म हो जाएगी। किसान निजी दुकानों पर उपलब्ध डीएपी ले सकते हैं। निजी दुकानों की डीएपी की गुणवत्ता भी अच्छी है।
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पांच समितियों पर शुक्रवार को बची डीएपी शनिवार को तकरीबन समाप्त हो गई। उर्वरक की नई रैक 15 नवंबर तक आने के बाद ही किसानों को समितियों से डीएपी मिल सकेगी।
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जिले में डीएपी की किल्लत से किसान परेशान हैं। शनिवार को कुड़वार के रवनिया पश्चिम और अझुई में 200-200 बोरी डीएपी के वितरण की सूचना मिलते किसान सुबह से टूट पड़े। बड़ी संख्या में किसानों के पहुंचने से ही अव्यवस्था उत्पन्न हो गई। शाम तक डीएपी खत्म हो गई। सैकड़ों किसानों को निराश होकर लौटना पड़ा। समिति के रवनिया पश्चिम के सचिव काशी प्रसाद शुक्ल ने बताया 200 बोरी डीएपी आई थी। अझुई के सचिव विजय पाठक ने बताया कि किसानों की संख्या हजारों में रही। इसकी वजह से उर्वरक कम पड़ गई। सेमरी, कल्याणपुर, लंभुआ, दूबेपुर समेत शेष समितियों पर किसान डीएपी पहुंचने की सूचना सुबह से लगाते रहे। फिलहाल उन्हें समितियों पर 15 नवंबर के बाद डीएपी मिलने की संभावना बनी है।
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बायोमीट्रिक पर अंगुली के निशान नहीं मिलने से मिली निराशा
लंभुआ। रामपुर कुर्मियान के किसान बद्री प्रसाद वर्मा ने बताया कि आलू की बोआई के लिए डीएपी के लिए लंभुआ आया था, लेकिन डीएपी नहीं मिली। आलू बोआई पिछड़ रही है। भरखरी निवासी सुरेंद्र सिंह ने बताया कि गेहूं की बोआई के लिए डीएपी की जरूरत है। समितियों पर डीएपी नहीं मिल पा रही है। अब बोआई की चिंता है। रवनिया पश्चिम समिति पर सुबह आठ बजे पहुंचे नरही के किसान राम प्रसाद यादव ने बताया कि दोपहर के करीब नंबर आया तो मेरा फिंगर नहीं लगा। इसकी वजह से खाद नहीं मिली। किसान मनोज ने बताया कि इस बार खाद लेने में बड़ी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। लगता है कि बोआई पिछड़ जाएगी। पिपरी के अजय सिंह ने बताया कि डीएपी की वजह से सरसों, मटर, मसूड़ आदि की बोआई पिछड़ रही है। अब प्राइवेट दुकानों से खाद लेनी पड़ेगी।
अभी तक रबी में मिली 5500 मीट्रिक टन डीएपी
डीएपी की चल रही कमी को देखते हुए प्रशासन ने डीएपी के वितरण को अपने हाथों में ले लिया है। डीएपी के पहुंचते ही प्रशासन व पुलिस की देखरेख में वितरण कराया जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक यूक्रेन व रुस के चल युद्ध की वजह पिछले वर्ष से शुरू हुई डीएपी की दिक्कत इस बार किसानों पर ज्यादा पड़ गई है। जिले में पहले से मौजूद करीब 1800 मीट्रिक टन डीएपी का स्टॉक अक्तूबर में खाली हो जाने से ज्यादा संकट बढ़ गया है। इस मौसम में 15,500 मीट्रिक टन के लक्ष्य के सापेक्ष नवंबर तक 5500 मीट्रिक टन मिली डीएपी खत्म हो गई है।
रबी में बोई जाने वाली फसलों का अनुमानित रकबा
फसल- रकबा
गेहूं- 1,23,001 हेक्टेयर
जौ- 14,31 हेक्टेयर
मक्का- 47 हेक्टेयर
चना- 5373 हेक्टेयर
मटर- 8137 हेक्टेयर
मसूर- 5504 हेक्टेयर
तोरिया- 2769 हेक्टेयर
सरसों- 3443 हेक्टेयर
अलसी- 51 हेक्टेयर
एनपीके का प्रयोग करके भूमि की बचाएं उर्वरा शक्ति
डीएपी की कमी को देखते हुए कृषि विभाग एनपीके का प्रयोग करने की सलाह दे रहा है। कृषि विभाग का कहना है कि एनपीके में नाइट्रोजन, पोटैशियम व फास्फोरस की मात्रा होती है, जबकि डीएपी में सिर्फ नाइट्रोजन व फास्फोरस पाया जाता है। फास्फोरस अधिक होने से वह जमीन में एक फसल में नहीं खप पाता है। इसकी वजह से जमीन की उर्वरा शक्ति कम हो रही है। विभाग की ओर से जमीन की उर्वरा शक्ति बनाए रखने के लिए जैविक रसायनों व नैनो डीएपी के प्रयोग की भी सलाह दी जा रही है।
पहले से लोगों के स्टाक करने से हुई कमी
जिला कृषि अधिकारी सदानंद ने कहा कि अभी गेहूं की बोआई शुरू हो रही है। लोग पहले से खरीद कर बोआई का प्रबंध करने में लगे हैं। इसकी वजह से डीएपी की कुछ कमी आई है। 2600 मीट्रिक टन की रैक 15 नवंबर तक आ जाएगी। इसके बाद दिक्कत खत्म हो जाएगी। किसान निजी दुकानों पर उपलब्ध डीएपी ले सकते हैं। निजी दुकानों की डीएपी की गुणवत्ता भी अच्छी है।