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Sultanpur News: 166 वर्षों बाद भी गुमनाम है चांदा की धरती
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सुल्तानपुर। देश के प्रथम स्वाधीनता आंदोलन में अनगिनत शहीदों के खून से लाल हुई चांदा की धरती 166 वर्षों बाद भी गुमनाम है। कई दलों के जनप्रतिनिधि यहां से चुनकर दिल्ली और लखनऊ पहुंचे लेकिन जंग-ए-आजादी के जांबाजों की शहादत उन्हें याद नहीं आई। शहीदों की स्मृति में यहां कोई छोटा सा स्मारक भी नहीं बनाया जा सका। यही हाल हसनपुर कोट का रहा। आजादी की लड़ाई का केंद्र रहा यह भवन आज भी उपेक्षित है।
लखनऊ-वाराणसी राजमार्ग पर स्थित ‘चांदा’ सुल्तानपुर जिले की लंभुआ तहसील का परगना है। पहले का गांव आज कस्बे में तब्दील हो चुका है। वैसे तो जिले के गभड़िया व कादूनाला भी प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाइयों के साक्षी बने लेकिन जिले का प्रवेश द्वार होने के कारण चांदा इनमें अग्रणी रहा। आजादी के दीवानों ने लखनऊ की ओर बढ़ रहे फिरंगियों को सबसे पहले यहीं रोका था।
1857 ई. में अवध सरकार की ओर से सुल्तानपुर में मेंहदी हसन नाजिम नियुक्त था। बगावत का बिगुल बजा तो जिले के लगभग सभी तालुकेदार मेंहदी हसन के नेतृत्व में एकजुट हो गए। तालुकेदारों की फौज में अंग्रेजी पल्टन के विद्रोही सैनिक व किसान भी शामिल थे। युद्ध के संचालन के लिए मेंहदी हसन ने सुल्तानपुर से लगभग दस किलोमीटर पश्चिम स्थित रियासत हसनपुर को अपना केंद्र बनाया।
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मेंहदी हसन की गतिविधियों की खबर पाकर कर्नल राउटन ने भारी फौज-फाटे के साथ सुल्तानपुर कूच किया। चांदा से चार किलोमीटर पहले कोइरीपुर नाले के किनारे अंग्रेजों ने डेरा डाल दिया। उधर, मेंहदी हसन ने पांच हजार घुड़सवारों के साथ भदैंया नाले पर किलेबंदी कर ली। दोनों सेनाओं के बीच चांदा में भीषण युद्ध हुआ।
देशभक्त सैनिकों के पास मात्र पांच बंदूकें थीं जबकि अंग्रेज दूर तक मार करने वाली तोप व बंदूकों से लैस थे। लिहाजा युद्ध की बाजी अंग्रेजों के हाथ लगी। लड़ाई में कालाकांकर के राजकुमार वीरगति को प्राप्त हुए। अमेठी, हसनपुर, मेवपुर धवरुआ समेत कई तालुकदारों ने युद्ध में हिस्सा लिया था। घमासान युद्ध व मुख्य मोर्चे पर मिली पराजय के बाद भी क्रांतिकारियों के हौसले पस्त नहीं हुए।
वे सब ब्रिटिश कंपनियों की टुकड़ियों पर बराबर हमले बोलते रहे और अंग्रेजी फौज को बढ़ने में अवरोध उत्पन्न करते रहे। उस समय मेंहदी हसन चांदा से चार मील दक्षिण वारी (प्रतापगढ़) गांव में ठहरा हुआ था। वारी उसके लिए सुरक्षित नहीं था।
इसलिए वह जल्द ही हसनपुर मुख्यालय चला आया। हसनपुर के राजा हसन अली व अन्य तालुकदारों ने उसकी भरपूर मदद की। पूरी तैयारी करने के बाद इन शक्तियों ने पुन: चांदा को केंद्र मानकर अंग्रेजों से लोहा लेने का प्रण किया। तब तक लगभग 20 हजार सैनिक युद्ध के लिए तैयार किए जा चुके थे। उसी बीच आजादी के दीवानों को खबर लगी कि जनरल फ्रैंक सुल्तानपुर की ओर चल पड़ा है तो वे भी चांदा की ओर चल पड़े। इस युद्ध में मेंहदी हसन के सहयोग के लिए लखनऊ से बंदे हसन भी आठ हजार सैनिकों के साथ चांदा पहुंच गया। दोनों सेनाओं में भीषण युद्ध हुआ। अंग्रेजों की विकराल तोपों के सामने मेंहदी हसन के सैनिक टिक नहीं पाए। मेंहदी हसन को पुन: वारी भागना पड़ा। चांदा पर अंग्रेजों का आधिपत्य हो गया।
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लखनऊ-वाराणसी राजमार्ग पर स्थित ‘चांदा’ सुल्तानपुर जिले की लंभुआ तहसील का परगना है। पहले का गांव आज कस्बे में तब्दील हो चुका है। वैसे तो जिले के गभड़िया व कादूनाला भी प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाइयों के साक्षी बने लेकिन जिले का प्रवेश द्वार होने के कारण चांदा इनमें अग्रणी रहा। आजादी के दीवानों ने लखनऊ की ओर बढ़ रहे फिरंगियों को सबसे पहले यहीं रोका था।
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1857 ई. में अवध सरकार की ओर से सुल्तानपुर में मेंहदी हसन नाजिम नियुक्त था। बगावत का बिगुल बजा तो जिले के लगभग सभी तालुकेदार मेंहदी हसन के नेतृत्व में एकजुट हो गए। तालुकेदारों की फौज में अंग्रेजी पल्टन के विद्रोही सैनिक व किसान भी शामिल थे। युद्ध के संचालन के लिए मेंहदी हसन ने सुल्तानपुर से लगभग दस किलोमीटर पश्चिम स्थित रियासत हसनपुर को अपना केंद्र बनाया।
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मेंहदी हसन की गतिविधियों की खबर पाकर कर्नल राउटन ने भारी फौज-फाटे के साथ सुल्तानपुर कूच किया। चांदा से चार किलोमीटर पहले कोइरीपुर नाले के किनारे अंग्रेजों ने डेरा डाल दिया। उधर, मेंहदी हसन ने पांच हजार घुड़सवारों के साथ भदैंया नाले पर किलेबंदी कर ली। दोनों सेनाओं के बीच चांदा में भीषण युद्ध हुआ।
देशभक्त सैनिकों के पास मात्र पांच बंदूकें थीं जबकि अंग्रेज दूर तक मार करने वाली तोप व बंदूकों से लैस थे। लिहाजा युद्ध की बाजी अंग्रेजों के हाथ लगी। लड़ाई में कालाकांकर के राजकुमार वीरगति को प्राप्त हुए। अमेठी, हसनपुर, मेवपुर धवरुआ समेत कई तालुकदारों ने युद्ध में हिस्सा लिया था। घमासान युद्ध व मुख्य मोर्चे पर मिली पराजय के बाद भी क्रांतिकारियों के हौसले पस्त नहीं हुए।
वे सब ब्रिटिश कंपनियों की टुकड़ियों पर बराबर हमले बोलते रहे और अंग्रेजी फौज को बढ़ने में अवरोध उत्पन्न करते रहे। उस समय मेंहदी हसन चांदा से चार मील दक्षिण वारी (प्रतापगढ़) गांव में ठहरा हुआ था। वारी उसके लिए सुरक्षित नहीं था।
इसलिए वह जल्द ही हसनपुर मुख्यालय चला आया। हसनपुर के राजा हसन अली व अन्य तालुकदारों ने उसकी भरपूर मदद की। पूरी तैयारी करने के बाद इन शक्तियों ने पुन: चांदा को केंद्र मानकर अंग्रेजों से लोहा लेने का प्रण किया। तब तक लगभग 20 हजार सैनिक युद्ध के लिए तैयार किए जा चुके थे। उसी बीच आजादी के दीवानों को खबर लगी कि जनरल फ्रैंक सुल्तानपुर की ओर चल पड़ा है तो वे भी चांदा की ओर चल पड़े। इस युद्ध में मेंहदी हसन के सहयोग के लिए लखनऊ से बंदे हसन भी आठ हजार सैनिकों के साथ चांदा पहुंच गया। दोनों सेनाओं में भीषण युद्ध हुआ। अंग्रेजों की विकराल तोपों के सामने मेंहदी हसन के सैनिक टिक नहीं पाए। मेंहदी हसन को पुन: वारी भागना पड़ा। चांदा पर अंग्रेजों का आधिपत्य हो गया।