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राजस्थान की तर्ज पर देना था पानी, सारी कोशिशें बेमानी

Sun, 10 Jul 2022 10:33 PM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Sun, 10 Jul 2022 10:33 PM IST
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Water was to be given on the lines of Rajasthan, all efforts were in vain
म्योरपुर। पानी के संकट से जूझते ग्रामीण इलाकों में राजस्थान की तर्ज पर शुद्ध पेयजल मुहैया कराने की कोशिश फेल हो गई है। लाखों रुपये खर्च कर गांवों में बनाए गए टांकों में संग्रहित जल में कीड़े पड़ गए हैं। ग्रामीणों ने इस पानी का अब तक एक भी दिन उपयोग नहीं किया। टांकों के जरिए पानी मुहैया कराने के नाम पर अधिकारियों-कर्मचारियों के भ्रमण और प्रशिक्षण पर भी मोटी राशि खर्च की गई थी, लेकिन जिम्मेदारों की उदासीनता से सारी कोशिशों पर पानी फिर गया। पर्यावरण प्रदूषण और दूषित पेयजल की समस्या से जूझते सोनांचल के ग्रामीण इलाकों में शुद्ध पेयजल की उपलब्धता के लिए राजस्थान मॉडल को लागू करने की योजना बनाई गई थी। इसके तहत पानी के संकट से जूझने वाले गांवों में राजस्थान की तर्ज पर टांकों का निर्माण कराया गया। ढक्कनबंद टांकों में बरसात का पानी संग्रहित किया जाने लगा। माना जा रहा था कि इस तरह से एकत्रित पानी के कारण लोगों को शुद्ध पानी उपलब्ध होगा। आसपास का भूजल का स्तर भी नियंत्रित होगा। इस योजना को मूर्त रूप देने के लिए करीब दो वर्ष पहले तत्कालीन सीडीओ अजय कुमार द्विवेदी के नेतृत्व में अधिकारियों-कर्मचारियों की टीम राजस्थान भी गई। वहां कई दिनों तक रूककर टीम ने टांकों के माध्यम से पानी की उपलब्धता का जायजा लिया। टांको में रखे पानी का टीडीएस भी मापा गया, जो काफी शुद्ध मिला। टीम ने लौटकर उसी मॉडल को जिले में लागू कराया। म्योरपुर ब्लाक के आरंगपानी, बेलहत्थी, कुलडोमरी, जरहा, सिंदूर, रनटोला, म्योरपुर आदि गांवों में कई टांके का निर्माण हुआ। एक टांके के निर्माण पर करीब दो लाख रुपये तक खर्च किए गए। भारी भरकम राशि खर्च करने के बाद भी योजना का कोई लाभ यहां के लोगों को नहीं मिला है। डीएमएफ के मद से लाखों रुपये खर्च कर गांवों में बने यह टांके बस शोपीस बनकर रह गए हैं। उनकी उपयोगिता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। गंभीरपुर ग्राम पंचायत में हीरामती पत्नी सुरेश के घर पर टांका 1.88 लाख की लागत से बना है, लेकिन हीरामती के मुताबिक टांके के पानी में कीड़े पड़ गए हैं। इसकी वजह से वह पानी पीने योग्य नहीं है। उन्होंने बताया कि उन लोगों ने इसका पानी कभी नहीं पिया है। कई गांवों में यह टांके पूरे भी नहीं कराए गए।
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