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गंगा की तरह प्रदूषित न हो जाएं सोनभद्र की नदियां
sonebhadra news
Updated Sun, 04 Nov 2018 12:27 AM IST
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वायु प्रदूषण का हाल
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सोनभद्र। जिले की लाइफलाइन कहे जाने वाली सोन और रेणुका नदी में प्रतिबंध के बावजूद गिराए जा रहे औद्योगिक अवशिष्ट (केमिकल, बॉक्साइट एवं बिजली परियोजनाओं से निकलने वाली राख) से जलीय तत्वों का संतुलन बिगड़ता जा रहा है। इसके चलते सल्फ्यूरिक अम्ल, हाइड्रोक्लोरिक अम्ल, नाइट्रिक अम्ल आदि की बढ़ती मात्रा जहां पानी का अम्लीय-क्षारीय गुण बदल रही है। वहीं डीओ वैल्यू (ऑक्सीजन में गिरावट) में कमी दिखने लगी है। पर्यावरण और रसायन विशेषज्ञों का दावा है कि जलीय जंतुओं के जीवन के साथ पौधों, जानवर और इंसान पर इसका असर भी दिखने लगा है।
जिले में सोन और रेणुका (रिहंद) दो ऐसी प्रमुख नदियां हैं, जिस पर काफी हद तक विकास की नींव टिकी हुई है। रेणुका नदी पर रिहंद और ओबरा डैम स्थापित हैं। वहीं सोन नदी पर सीमा से सटे सीधी में बाणसागर डैम निर्मित है। जिले से बहने वाले हिस्से का जिले के विकास और राजस्व दोनों दृष्टि से अहम योगदान है। पर्यावरण की दृष्टि से भी दोनों नदियों को जिले की धुरी माना जाता है लेकिन इनमें लगातार गिराए जा रहे औद्योगिक अवशिष्ट से इनका पर्यावरणीय स्वरूप तेजी से बिगड़ता जा रहा है। रेणुका से जुड़े रिहंद डैम में यूपी-एमपी की सीमा के पास कोल परियोजनाओं से निकलने वाला गंदा पानी तो जा ही रहा है। खडिय़ा और बेलवादह में जब-तब कोयले के राख की बड़ी मात्रा बांध में पहुंचने की बात सामने आती रहती है।
इसी तरह लभरीगाढ़ में एक फैक्ट्री से निकले वाले खतरनाक केमिकल का बहाव भी रिहंद की तरफ ही बना हुआ है। रेणुकूट में डोंगिया नाला को भी केमिकल का बड़ा वाहक माना जाता है। रिहंद डैम से आगे बढने पर रिहंद में बॉक्साइट की मात्रा मिलने की बात कही जाती है। ओबरा में तो परियोजना से निकलने वाली राख का करीब-करीब पूरा हिस्सा ही रेणुका नदी और इसके जरिए सोन में पट रहा है। कहने को ओबरा में ऐश वाटर ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित है लेकिन यहां राखी पुल के पास तो राख नदी में मिल ही रही है, ऐश डैम से जुड़े नाले के जरिए भी राख का बड़ा हिस्सा नदी में पहुंच रहा है। इसी से जुड़ी बिजुल नदी है, जिस पर भी इसका असर दिखने लगा है। वहीं सोन के जरिए रेणुका और बिजुल का पानी तथा इनके जरिए प्रवाहित हो रहा औद्योगिक अवशिष्ट की मात्रा पटना के पास गंगा नदी में भी पहुंच रही है। मौजूदा समय में गंगा नदी का प्रदूषण बड़ा मुद्दा बना हुआ है लेकिन उसकी प्रमुख सहायक नदी सोन को लेकर बड़े स्तर अभी तक चिंता के स्वर नहीं उठ पाए हैं। नियमित वाटर सैंपलिंग में भी प्रदूषित हिस्से को अलग रखा गया है। ऐसे में जल्द ही जिले की भी नदियां गंगा की तरह प्रदूषित नजर आएं तो बड़ी बात नहीं होगी।
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जिले में सोन और रेणुका (रिहंद) दो ऐसी प्रमुख नदियां हैं, जिस पर काफी हद तक विकास की नींव टिकी हुई है। रेणुका नदी पर रिहंद और ओबरा डैम स्थापित हैं। वहीं सोन नदी पर सीमा से सटे सीधी में बाणसागर डैम निर्मित है। जिले से बहने वाले हिस्से का जिले के विकास और राजस्व दोनों दृष्टि से अहम योगदान है। पर्यावरण की दृष्टि से भी दोनों नदियों को जिले की धुरी माना जाता है लेकिन इनमें लगातार गिराए जा रहे औद्योगिक अवशिष्ट से इनका पर्यावरणीय स्वरूप तेजी से बिगड़ता जा रहा है। रेणुका से जुड़े रिहंद डैम में यूपी-एमपी की सीमा के पास कोल परियोजनाओं से निकलने वाला गंदा पानी तो जा ही रहा है। खडिय़ा और बेलवादह में जब-तब कोयले के राख की बड़ी मात्रा बांध में पहुंचने की बात सामने आती रहती है।
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इसी तरह लभरीगाढ़ में एक फैक्ट्री से निकले वाले खतरनाक केमिकल का बहाव भी रिहंद की तरफ ही बना हुआ है। रेणुकूट में डोंगिया नाला को भी केमिकल का बड़ा वाहक माना जाता है। रिहंद डैम से आगे बढने पर रिहंद में बॉक्साइट की मात्रा मिलने की बात कही जाती है। ओबरा में तो परियोजना से निकलने वाली राख का करीब-करीब पूरा हिस्सा ही रेणुका नदी और इसके जरिए सोन में पट रहा है। कहने को ओबरा में ऐश वाटर ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित है लेकिन यहां राखी पुल के पास तो राख नदी में मिल ही रही है, ऐश डैम से जुड़े नाले के जरिए भी राख का बड़ा हिस्सा नदी में पहुंच रहा है। इसी से जुड़ी बिजुल नदी है, जिस पर भी इसका असर दिखने लगा है। वहीं सोन के जरिए रेणुका और बिजुल का पानी तथा इनके जरिए प्रवाहित हो रहा औद्योगिक अवशिष्ट की मात्रा पटना के पास गंगा नदी में भी पहुंच रही है। मौजूदा समय में गंगा नदी का प्रदूषण बड़ा मुद्दा बना हुआ है लेकिन उसकी प्रमुख सहायक नदी सोन को लेकर बड़े स्तर अभी तक चिंता के स्वर नहीं उठ पाए हैं। नियमित वाटर सैंपलिंग में भी प्रदूषित हिस्से को अलग रखा गया है। ऐसे में जल्द ही जिले की भी नदियां गंगा की तरह प्रदूषित नजर आएं तो बड़ी बात नहीं होगी।
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