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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Sonebhadra News ›   Independence Day Names of cities and towns reminding us of slavery even in 2023

Independence Day 2023: आजादी के अमृत काल में भी गुलामी की याद दिला रहे नगर और कस्बों के नाम

Sat, 12 Aug 2023 04:29 PM IST
उत्पल कांत अमर उजाला नेटवर्क, सोनभद्र
अमर उजाला नेटवर्क, सोनभद्र Published by: उत्पल कांत Updated Sat, 12 Aug 2023 04:29 PM IST
सार

 1989 में मिर्जापुर के दक्षिणांचल को अलग कर सोनभद्र के रूप में नए जिले की स्थापना हुई थी। इसका मुख्यालय राबर्ट्सगंज को बनाया गया। अंग्रेज अधिकारी डब्ल्यू.बी. राबर्ट्स के नाम पर बसा यह कस्बा अब नगर का रूप ले चुका है। 

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Independence Day Names of cities and towns reminding us of slavery even in 2023
विंढमगंज रेलवे स्टेशन - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

देश की आजादी के 75 साल हो चुके हैं। पूरा देश आजादी के अमृत काल का जश्न मना रहा है। आजादी के लिए अपना बलिदान देने वाले शहीदों और वीर सेनानियों की गौरवगाथा को याद किया जा रहा है। अपनी सभ्यता, संस्कृति की गौरवशाली विरासत को फिर से स्थापित करने की कोशिश हो रही है। हर उस पहचान को मिटाने पर जोर है, जो हमें गुलामी की याद दिलाता हो, मगर यूपी का सोनांचल (सोनभद्र)  इससे अछूता है। यहां आज भी कई नगर और कस्बे हैं, जो यह अहसास कराते हैं कि अंग्रेजों ने वर्षों तक हम पर हुकूमत चलाई थी।

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1989 में मिर्जापुर के दक्षिणांचल को अलग कर सोनभद्र के रूप में नए जिले की स्थापना हुई थी। इसका मुख्यालय राबर्ट्सगंज को बनाया गया। अंग्रेज अधिकारी डब्ल्यू.बी. राबर्ट्स के नाम पर बसा यह कस्बा अब नगर का रूप ले चुका है। जिले का यह इकलौता नगर पालिका है।
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कागजों में नगर पालिका का नाम तो राबर्ट्सगंज से बदलकर सोनभद्र कर दिया गया, लेकिन तहसील, कोतवाली, महिला थाना, विद्युत खंड सहित कई अन्य सरकारी कार्यालयों, इकाइयों की पहचान अब भी राबर्ट्सगंज नाम से ही हैं। इसी नाम से लोकसभा और विधानसभा क्षेत्र भी है। कुछ साल पहले तक रेलवे स्टेशन का नाम भी राबर्ट्सगंज ही था। लंबी लड़ाई के बाद इसे सोनभद्र किया गया, मगर अन्य स्थलों के नाम यथावत हैं।
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पी. बिल्ढम के नाम पर है विंढमगंज

Independence Day Names of cities and towns reminding us of slavery even in 2023
राबर्ट्सगंज थाना - फोटो : अमर उजाला

कई सरकारी दस्तावेजों में भी सोनभद्र को अंग्रेज अधिकारी राबर्ट्स के नाम पर ही जाना-पहचाना जाता है। ऐसा ही एक अन्य कस्बा है विंढमगंज। झारखंड सीमा पर स्थित इस कस्बे का नामकरण भी मिर्जापुर के तत्कालीन कलेक्टर पी. बिल्ढम के नाम पर है। बुजुर्ग बताते हैं कि क्षेत्र के भ्रमण पर आए अंग्रेज अधिकारी बिल्ढम ने ही अपने नाम पर इस कस्बे को बसाया था। वैसे सरकारी अभिलेखाें में यह बुटबेढ़वा ग्राम पंचायत का हिस्सा है, लेकिन आम चलन में लोग इसे विंढमगंज के रूप में ही जानते हैं।

इसी नाम से चोपन-गढ़वा रूट पर यहां रेलवे स्टेशन भी है। एक अन्य कस्बा म्योरपुर भी कैप्टन म्योर के नाम पर है। तापीय परियोजनाएं और कोयले की खदानें समेत प्रचूर खनिज संपदा इसी क्षेत्र में है। गाहे-बगाहे बाहर से आने वाले लोग जब इन कस्बों के नाम की चर्चा करते हैं तो आजादी पर इतराने वाले लोग भी गुलामी की पहचान के कारण झेंप जाते हैं।

1854 में बसा था राबर्ट्सगंज

विंध्य संस्कृति शोध समिति उत्तर प्रदेश ट्रस्ट के निदेशक एवं इतिहासकार दीपक कुमार केसरवानी मिर्जापुर गजेटियर का उल्लेख करते हुए बताते हैं कि वर्ष 1846 के पूर्व मिर्जापुर का कुसाचा तहसील शाहगंज में संचालित था। बरसात में यह क्षेत्र बेलन नदी के उफनाने से जलमग्न हो जाता था। तब नदी पर पुल भी नहीं था। लिहाजा मिर्जापुर से उसका संपर्क कट जाता था। राजस्व वसूली और प्रशासनिक कार्यों में दिक्कत होती थी। अदालगंज के मुखिया भूरा लाल ने मिर्जापुर के कलेक्टर को पत्र लिखकर स्थानीय समस्याओं से अवगत कराते हुए तहसील को अन्यत्र स्थानांतरित करने का सुझाव दिया।

कलेक्टर ने उस पत्र पर कार्रवाई करते हुए मिर्जापुर के डिप्टी कलेक्टर डब्ल्यू बी रॉबर्ट को नई तहसील की स्थापना के लिए भूमि सर्वे के लिए भेजा। सर्वे के बाद उन्होंने ऐसी भूमि का चयन किया जो कछुए की आकार का था और बरसात का पानी चारों तरफ से निकल जाता। यहीं पर मेन चौक के पास रॉबर्ट्सगंज कस्बे की स्थापना हुई। बाद में शाहगंज में स्थित कुसाचा तहसील को यहां स्थानांतरित किया और 1854 में इसका का नाम डब्ल्यू बी रॉबर्ट के नाम पर रॉबर्ट्सगंज हो गया।

प्रवास करने आए और अपने नाम पर बसा दिया कस्बा

वर्ष 1901 में पी बिल्ढम मिर्जापुर के कलेक्टर बनकर आए। दुद्धी क्षेत्र के स्थानीय समस्याओं के निदान, आदिवासियों को शोषण से मुक्ति दिलाने के लिए 1903 में आए और यहीं पर दुद्धी क्षेत्र की गतिविधियों का अध्ययन किया। यहां की गरीबी, लाचारी, बेबसी, आदिवासियों की दशा देखकर उन्हें निशुल्क राशन, मिट्टी का तेल, कपड़ा आदि का वितरण कराया और संचालित पाठशाला का निरीक्षण किया। वर्ष 1905 में दोबारा इस क्षेत्र में आए और सड़कों आदि का निर्माण करने का वादा किया। मूड़ी सेमर के पास जहां उन्होंने प्रवास किया, वहीं अपने नाम पर बिल्ढमगंज बसा दिया, जो बाद में विंढमगंज हो गया।

लेफ्टिनेंट गर्वनर थे डब्ल्यू म्योर

वर्ष 1870-71 में संयुक्त प्रांत आगरा-अवध के लेफ्टिनेंट गवर्नर मिस्टर डब्ल्यू म्योर दुद्धी के प्रशासनिक व्यवस्था में सुधार एवं भूमि समस्याओं के निदान के लिए आए। कुछ दिन रह कर यहां के लोगों से संवाद स्थापित कर यहां की स्थानीय समस्याओं को जाना। जहां पर वह रुके, उस स्थान पर एक गांव बसाया जो उनके नाम पर म्योरपुर के रूप में कस्बा और अब ब्लाक, थाना समेत प्रमुख क्षेत्र बन गया है।

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