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नदी सूखी, जलापूर्ति ठप
अमर उजाला ब्यूरो, सोनभद्र
Updated Sun, 17 Jan 2016 11:30 PM IST
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क्षेत्र में सिंचाई की समस्या तो थी ही अब नदियों का जल सूखने से पेय जल का भी संकट गहराने लगा है। यह समस्या ऐतिहासिक पांडु नदी के सूखने से उत्पन्न हुई है। जिससे 14 से भी अधिक गांव के लोग प्रभावित हो रहे हैं। इन्होने इस समस्या से निजात के लिए प्रशासन से गुहार लगाई है।
कोन क्षेत्र में एक वरदान के रूप में महाभारत काल से पांडु नदी जो ग्राम पंचायत कुड़वा के टोला पांडु चट्टान से निकल कर पिपरखाड़, कचनरवा, किशुनपुरवा, गिधिया, चेरवाडीह, रोरवा, मिटीहिनियां, बिजौरा, बगिया, कोन, घघिया, खेतकटवा, लोहबे, रगरम, बरवाखाड़, बहुआरा, मिश्री, डोमा, राजी होते हुए झारखंड के कई गांव की प्यास बुझाते हुए सोन नदी में जाकर मिल जाती है। यह नदी करीब 90 किमी की दूरी तय करती थी।
इससे कई गांव के जमीन सिंचित होते थे और ग्रामीणों की प्यास बुझती थी। एक कथा के अनुसार महाभारत काल में अज्ञावातवास के समय पांडव जब घूमते घूमते यहां पहुंचे तो द्रौपदी को प्यास लगी। अर्जुन ने धरती में वाण चलाकर पानी निकाला और द्रौपदी की प्यास बुझाई थी। तब से लेकर अब तक इस क्षेत्र के लोगों को इस नदी से लाभ मिलता रहा है। कांग्रेस के पूर्व जिलाध्यक्ष गोपाल प्रसाद गुप्ता के प्रयास से पूर्व प्रधान मंत्री स्व. इंदिरा गांधी ने चार अप्रैल 1980 को कोन जल निगम का शिलान्यास किया था ।
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उस समय 14 गांव को पेयजल आपूर्ति हो रही थी। उसके बाद सिर्फ सात गांव को आपूर्ति होने लगी, लेकिन पाण्डु नदी सूखने से अब वो भी आपूर्ति बंद हो गयी। इससे कोन क्षेत्र में पेयजल के लिए हाहाकार मच गया। पूर्व में सपा सांसद पकौड़ी लाल कोल पांडु चट्टान गए थे और वहां पर्यटन स्थल बनाने का वादा किया था। लेकिन विधान सभा चुनाव हुई और सरकार बसपा की आ गई और पांडु नदी पर 23 चेकडैम बनाने की घोषणा कर दी।
इसका शिलान्यास करने आये तत्कालीन प्रमुख सचिव अतुल कुमार से ग्रामीणों ने चेकडैम बनाने का विरोध किया था। ग्रामीणों का कहना था कि चेकडैम बनने से सिल्ट जम जाएगी और नदी की धारा बंद हो जाएगी। लेकिन चेकडैम का निर्माण शुरू हो गया।
कुछ ही दिन चेकडेम निर्माण नहीं चल सका और मनरेगा घोटाले की भेंट चढ़ गयी और जैसे तैसे ठीकेदार उक्त अधूरे चेकडेम का मलबा नदी में ही छोड़ चले गए। इसमें कार्य करने वाले मजदूरों की मजदूरी अब भी बकाया है। मजदूरों ने कई बार डीएम, सांसद, विधायक से गुहार लगाई लेकिन मजदूरी अब तक नही मिली। ग्रामीणों ने उच्चाधिकारियों से नदी सफाई व कोन जल निगम में बोर कराकर तत्काल पेयजल आपूर्ति की मांग की है।
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कोन क्षेत्र में एक वरदान के रूप में महाभारत काल से पांडु नदी जो ग्राम पंचायत कुड़वा के टोला पांडु चट्टान से निकल कर पिपरखाड़, कचनरवा, किशुनपुरवा, गिधिया, चेरवाडीह, रोरवा, मिटीहिनियां, बिजौरा, बगिया, कोन, घघिया, खेतकटवा, लोहबे, रगरम, बरवाखाड़, बहुआरा, मिश्री, डोमा, राजी होते हुए झारखंड के कई गांव की प्यास बुझाते हुए सोन नदी में जाकर मिल जाती है। यह नदी करीब 90 किमी की दूरी तय करती थी।
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इससे कई गांव के जमीन सिंचित होते थे और ग्रामीणों की प्यास बुझती थी। एक कथा के अनुसार महाभारत काल में अज्ञावातवास के समय पांडव जब घूमते घूमते यहां पहुंचे तो द्रौपदी को प्यास लगी। अर्जुन ने धरती में वाण चलाकर पानी निकाला और द्रौपदी की प्यास बुझाई थी। तब से लेकर अब तक इस क्षेत्र के लोगों को इस नदी से लाभ मिलता रहा है। कांग्रेस के पूर्व जिलाध्यक्ष गोपाल प्रसाद गुप्ता के प्रयास से पूर्व प्रधान मंत्री स्व. इंदिरा गांधी ने चार अप्रैल 1980 को कोन जल निगम का शिलान्यास किया था ।
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उस समय 14 गांव को पेयजल आपूर्ति हो रही थी। उसके बाद सिर्फ सात गांव को आपूर्ति होने लगी, लेकिन पाण्डु नदी सूखने से अब वो भी आपूर्ति बंद हो गयी। इससे कोन क्षेत्र में पेयजल के लिए हाहाकार मच गया। पूर्व में सपा सांसद पकौड़ी लाल कोल पांडु चट्टान गए थे और वहां पर्यटन स्थल बनाने का वादा किया था। लेकिन विधान सभा चुनाव हुई और सरकार बसपा की आ गई और पांडु नदी पर 23 चेकडैम बनाने की घोषणा कर दी।
इसका शिलान्यास करने आये तत्कालीन प्रमुख सचिव अतुल कुमार से ग्रामीणों ने चेकडैम बनाने का विरोध किया था। ग्रामीणों का कहना था कि चेकडैम बनने से सिल्ट जम जाएगी और नदी की धारा बंद हो जाएगी। लेकिन चेकडैम का निर्माण शुरू हो गया।
कुछ ही दिन चेकडेम निर्माण नहीं चल सका और मनरेगा घोटाले की भेंट चढ़ गयी और जैसे तैसे ठीकेदार उक्त अधूरे चेकडेम का मलबा नदी में ही छोड़ चले गए। इसमें कार्य करने वाले मजदूरों की मजदूरी अब भी बकाया है। मजदूरों ने कई बार डीएम, सांसद, विधायक से गुहार लगाई लेकिन मजदूरी अब तक नही मिली। ग्रामीणों ने उच्चाधिकारियों से नदी सफाई व कोन जल निगम में बोर कराकर तत्काल पेयजल आपूर्ति की मांग की है।