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Sonebhadra News: जातियों की सीमा लांघी, मध्य प्रदेश का ओबीसी बना उत्तर प्रदेश का एससी
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सोनभद्र। सीमावर्ती जिले में जाति प्रमाण पत्र को लेकर गड़बड़ियों की फेहरिश्त लंबी है। पड़ोसी राज्यों और जिलों में आरक्षण की अलग-अलग व्यवस्था को अपने माफिक बनाने के लिए जालसाज कूटरचित दस्तावेजों का सहारा ले रहे हैं।
एमपी के मूल निवासी बैसवार जाति के सैकड़ों लोग यूपी में बसकर अनुसूचित जाति के आरक्षण का लाभ ले रहे हैं। चंदौली के खरवार सोनभद्र में आकर जनजाति में शामिल हो गए हैं। प्रमाणपत्र जारी करने के दौरान पुराने रिकॉर्ड और मूल निवास की पड़ताल न करने का लाभ उन्हें मिल रहा है, जबकि स्थानीय निवासी आरक्षण से वंचित रह जा रहे हैं।
सोनभद्र की सीमा मप्र के सिंगरौली जिले से लगती है। सीमावर्ती क्षेत्र में दोनों तरफ बैसवार जाति की बड़ी आबादी है। यूपी में बैसवार जाति अनुसूचित जाति वर्ग में सूचीबद्ध है, जबकि मप्र में उन्हें अन्य पिछड़ा वर्ग में रखा गया है।
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महज कुछ दूरी के फासले पर अलग-अलग आरक्षण की व्यवस्था का जालसाज लाभ उठा रहे हैं। इसके लिए वह सुनियोजित तरीके से यूपी की सीमा में आकर बसते हैं और फिर कुछ वर्षों बाद यहां के निवासी होने का दावा करते हुए जाति व निवास प्रमाण पत्र हासिल कर लेते हैं।
प्रमाण पत्र जारी करने से पहले अभ्यर्थी के पूर्वजों की स्थिति का भी पता लगाना होता है, लेकिन समय सीमा की बाध्यता और अन्य दुश्वारियों से बचने के लिए कोई कर्मी गहरी छानबीन की जहमत नहीं उठाता।
प्रमाणपत्रों में जालसाजी सिर्फ पुलिस भर्ती परीक्षा में चार अभ्यर्थियों तक ही सीमित नहीं है, कई अन्य नौकरियों व शिक्षण संस्थानों में भी आरक्षण का लाभ पाने के लिए कूटरचित दस्तावेज सहारा बने हैं। कुछ माह पहले ही शिक्षा विभाग में भी ऐसे ही मामले को लेकर उठापटक मची थी, मगर राजनीतिक हस्तक्षेप से मामला ठंडे बस्ते में चला गया।
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एमपी के मूल निवासी बैसवार जाति के सैकड़ों लोग यूपी में बसकर अनुसूचित जाति के आरक्षण का लाभ ले रहे हैं। चंदौली के खरवार सोनभद्र में आकर जनजाति में शामिल हो गए हैं। प्रमाणपत्र जारी करने के दौरान पुराने रिकॉर्ड और मूल निवास की पड़ताल न करने का लाभ उन्हें मिल रहा है, जबकि स्थानीय निवासी आरक्षण से वंचित रह जा रहे हैं।
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सोनभद्र की सीमा मप्र के सिंगरौली जिले से लगती है। सीमावर्ती क्षेत्र में दोनों तरफ बैसवार जाति की बड़ी आबादी है। यूपी में बैसवार जाति अनुसूचित जाति वर्ग में सूचीबद्ध है, जबकि मप्र में उन्हें अन्य पिछड़ा वर्ग में रखा गया है।
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महज कुछ दूरी के फासले पर अलग-अलग आरक्षण की व्यवस्था का जालसाज लाभ उठा रहे हैं। इसके लिए वह सुनियोजित तरीके से यूपी की सीमा में आकर बसते हैं और फिर कुछ वर्षों बाद यहां के निवासी होने का दावा करते हुए जाति व निवास प्रमाण पत्र हासिल कर लेते हैं।
प्रमाण पत्र जारी करने से पहले अभ्यर्थी के पूर्वजों की स्थिति का भी पता लगाना होता है, लेकिन समय सीमा की बाध्यता और अन्य दुश्वारियों से बचने के लिए कोई कर्मी गहरी छानबीन की जहमत नहीं उठाता।
प्रमाणपत्रों में जालसाजी सिर्फ पुलिस भर्ती परीक्षा में चार अभ्यर्थियों तक ही सीमित नहीं है, कई अन्य नौकरियों व शिक्षण संस्थानों में भी आरक्षण का लाभ पाने के लिए कूटरचित दस्तावेज सहारा बने हैं। कुछ माह पहले ही शिक्षा विभाग में भी ऐसे ही मामले को लेकर उठापटक मची थी, मगर राजनीतिक हस्तक्षेप से मामला ठंडे बस्ते में चला गया।