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कनहर परियोजना में फिर बजट ने अटकाया रोड़ा
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पिछले साढ़े चार दशक से निर्माणाधीन कनहर सिंचाई परियोजना में बजट ने फिर रोड़ा अटका दिया है। करीब तीन सौ करोड़ का बजट स्वीकृत न होने से परियोजना का काम बंद करने की नौबत आ गई है। हाल यह है कि कर्मचारियों का वेतन-मानदेय भी कार्यदायी संस्था भुगतान नहीं कर पा रही। परियोजना से जुड़े अधिकारी लगातार लखनऊ में डेरा डालकर बजट स्वीकृत कराने की कोशिश में जुटे हैं लेकिन अब तक सफलता नहीं मिल पाई है। इसके पीछे जलशक्ति मंत्रालय में मची खींचतान को भी असर बताया जा रहा है।
यूपी, झारखंड और छत्तीसगढ़ की सीमा पर बन रहे कनहर सिंचाई परियोजना का काम सत्तर के दशक में शुरू हुआ था। धीमी कार्य गति के चलते साढ़े चार दशक में परियोजना की लागत करीब सौ गुना तक बढ़ चुकी है। परियोजना से तीनों राज्यों के सैकड़ों गांव लाभान्वित होने हैं। जैसे-तैसे काम कराते हुए अब बांध बांधने की प्रक्रिया चल रही है। इस साल के अंत तक इसे मूर्त रूप दिया जाना है लेकिन बजट के अभाव से काम प्रभावित हो रहा है। परियोजना के लिए कार्यदायी संस्था ने महंगाई के आधार पर संशोधित प्रस्ताव प्रेषित करते हुए तीन सौ करोड़ रुपये की मांग की थी। वित्तीय वर्ष के तीन माह बीतने के बाद भी धनराशि न मिलने से परियोजना के लिए सामग्री आपूर्ति, काम कर रहे मजदूर, कर्मचारियों का भुगतान नहीं हो पा रहा।
पिछले दिनों कर्मचारियों ने संस्था कार्यालय पर पहुंचकर हंगामा भी मचाया था। कार्य बहिष्कार कर मुकदमा दर्ज कराने की भी चेतावनी दी थी। बाद में अफसरों ने उन्हें शीघ्र भुगतान का आश्वासन देकर शांत कराया था। भुगतान पाने के लिए परियोजना से जुड़े अधिकारी लगातार लखनऊ में डेरा डाले हुए हैं लेकिन अब तक उन्हें सफलता नहीं मिल पाई है। सूत्रों की मानें तो जलशक्ति मंत्रालय में अफसरों के बीच खींचतान से मामला अटका हुआ है। पिछले दिनों मुख्य अभियंता ने निरीक्षण के दौरान आश्वासन दिया था कि शीघ्र बजट मिल जाएगा, मगर अब तक स्थिति जस की तस है।
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भुगतान के लिए लगातार प्रयास किया जा रहा है। संबंधित अधिकारियों से लगातार संपर्क मेें हैं, मगर अब तक सिंचाई विभाग को ही धन जारी नहीं हो पाया है। समय से कंपनी को भुगतान नहीं हुआ तो परियोजना का कार्य पूर्ण रूप से बंद हो जाएगा। - संजीव कुमार, जीएम, संस्था एचईएस
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यूपी, झारखंड और छत्तीसगढ़ की सीमा पर बन रहे कनहर सिंचाई परियोजना का काम सत्तर के दशक में शुरू हुआ था। धीमी कार्य गति के चलते साढ़े चार दशक में परियोजना की लागत करीब सौ गुना तक बढ़ चुकी है। परियोजना से तीनों राज्यों के सैकड़ों गांव लाभान्वित होने हैं। जैसे-तैसे काम कराते हुए अब बांध बांधने की प्रक्रिया चल रही है। इस साल के अंत तक इसे मूर्त रूप दिया जाना है लेकिन बजट के अभाव से काम प्रभावित हो रहा है। परियोजना के लिए कार्यदायी संस्था ने महंगाई के आधार पर संशोधित प्रस्ताव प्रेषित करते हुए तीन सौ करोड़ रुपये की मांग की थी। वित्तीय वर्ष के तीन माह बीतने के बाद भी धनराशि न मिलने से परियोजना के लिए सामग्री आपूर्ति, काम कर रहे मजदूर, कर्मचारियों का भुगतान नहीं हो पा रहा।
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पिछले दिनों कर्मचारियों ने संस्था कार्यालय पर पहुंचकर हंगामा भी मचाया था। कार्य बहिष्कार कर मुकदमा दर्ज कराने की भी चेतावनी दी थी। बाद में अफसरों ने उन्हें शीघ्र भुगतान का आश्वासन देकर शांत कराया था। भुगतान पाने के लिए परियोजना से जुड़े अधिकारी लगातार लखनऊ में डेरा डाले हुए हैं लेकिन अब तक उन्हें सफलता नहीं मिल पाई है। सूत्रों की मानें तो जलशक्ति मंत्रालय में अफसरों के बीच खींचतान से मामला अटका हुआ है। पिछले दिनों मुख्य अभियंता ने निरीक्षण के दौरान आश्वासन दिया था कि शीघ्र बजट मिल जाएगा, मगर अब तक स्थिति जस की तस है।
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भुगतान के लिए लगातार प्रयास किया जा रहा है। संबंधित अधिकारियों से लगातार संपर्क मेें हैं, मगर अब तक सिंचाई विभाग को ही धन जारी नहीं हो पाया है। समय से कंपनी को भुगतान नहीं हुआ तो परियोजना का कार्य पूर्ण रूप से बंद हो जाएगा। - संजीव कुमार, जीएम, संस्था एचईएस