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अलौकिक शक्तियो से परिपूर्ण है झिगुरदह हनुमान मंदिर
Updated Tue, 06 Nov 2018 11:45 PM IST
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अनपरा। ऊर्जांचल की धरा कई धरोहरों की थाती संजोए है। उसी में से एक है उत्तर प्रदेश व मध्य प्रदेश की सीमा पर स्थित झिंगुरदा हनुमान मंदिर। सिद्धपीठ की मान्यता रखने वाला भारत का यह इकलौता ऐसा मंदिर है, जहां लड्डू माला-फूल चढ़ाने से पहले नारियल की बलि चढ़ाई जाती है। यहां मन्नत के लिए भी चुनरी में नारियल बांधने और मुराद पूरी होने पर इसे खोलकर भंडारा और शृंगार की परंपरा वर्षों से चली आ रही है।
भगवान विष्णु को विशेष रूप से अर्पित होने वाला कमल का फूल यहां चढ़ाने की परंपरा है। इसके लिए फूल यहां से महज दो से तीन किमी की दूरी पर प्राकृतिक सुषमा समेटे टिप्पा झरिया सरोवर से लाए जाते हैं। झरिया सरोवर में साल के बारहों महीने कमल खिला रहता है, कमल का फूल आकर्षण का केंद्र तो है ही, भक्त इसे किसी चमत्कार से कम नहीं मानते। मंदिर के पूजारी बताते हैं कि इस स्थल पर दो हजार साल पहले खुद ब खुद मूर्ति प्रकट हुई थी। बाद के दिनों में सिंगरौली राजघराने ने विधिवत पूजन-अर्चन शुरू कराया। 200 साल पूर्व सिंगरौली राजघराने की तरफ से यहां दक्षिण भारत की शैली में भव्य हनुमान मंदिर का निर्माण भी कराया गया। उनका दावा है कि छत्रपति शिवाजी के काल में समर्थ गुरु रामदास ने भी यहां आकर हनुमानजी की आराधना की थी। बताया कि उनका परिवार आठ पीढ़ी से यहां पुजारी की परंपरा निभा रहा है। तांत्रिकों की नजर में भी यह सिद्धपीठ काफी महत्वपूर्ण है। दीपावली पर लगने वाला पांच दिवसीय मेला सिर्फ उत्तर प्रदेश और प्रदेश के सीमावर्ती जिलों के लिए ही नहीं, बल्कि सूबे की राजधानी लखनऊ से लेकर देश की राजधानी दिल्ली तक के लिए श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र बना रहता है। ऊर्जांचल के संकट मोचन के नाम से प्रसिद्ध इस मंदिर से हर एक की मुरादें पूरी होती है। प्राकृतिक रूप से हरियाली से भरा आस-पास का इलाका सिर्फ श्रद्धालुओं के लिए ही नहीं, दूसरों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।
हनुमान जी को भाता है रोट व हलुवा
अनपरा। झिंगुरदह हनुमान मंदिर का इतिहास जितना पुराना है उतना ही प्रसिद्ध भी है। हनुमान मंदिर में दीपावली पर लगने वाले मेले में उत्तर प्रदेश,मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड से आने वाले श्रद्धालु मंदिर के पास निकलने वाले झरिया में नहाते है। नहाने के बाद गुड़ व घी से बना रोट व हलुवा पहले हनुमान जी को चढ़ाते है फिर सब लोग उसका आनंद लेते है। बताया जाता है कि दूषित मन से मंदिर में प्रवेश करने वाले लोगों को हनुमान जी भवरा का रूप लेकर दंड देते है। ऐसी कई वारदात हो चुकी है। जब मंदिर में कोई अप्रिय घटना घटती है तो अचानक से भवरों का एक झुंड निकलकर हमला बोल देता है।
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भगवान विष्णु को विशेष रूप से अर्पित होने वाला कमल का फूल यहां चढ़ाने की परंपरा है। इसके लिए फूल यहां से महज दो से तीन किमी की दूरी पर प्राकृतिक सुषमा समेटे टिप्पा झरिया सरोवर से लाए जाते हैं। झरिया सरोवर में साल के बारहों महीने कमल खिला रहता है, कमल का फूल आकर्षण का केंद्र तो है ही, भक्त इसे किसी चमत्कार से कम नहीं मानते। मंदिर के पूजारी बताते हैं कि इस स्थल पर दो हजार साल पहले खुद ब खुद मूर्ति प्रकट हुई थी। बाद के दिनों में सिंगरौली राजघराने ने विधिवत पूजन-अर्चन शुरू कराया। 200 साल पूर्व सिंगरौली राजघराने की तरफ से यहां दक्षिण भारत की शैली में भव्य हनुमान मंदिर का निर्माण भी कराया गया। उनका दावा है कि छत्रपति शिवाजी के काल में समर्थ गुरु रामदास ने भी यहां आकर हनुमानजी की आराधना की थी। बताया कि उनका परिवार आठ पीढ़ी से यहां पुजारी की परंपरा निभा रहा है। तांत्रिकों की नजर में भी यह सिद्धपीठ काफी महत्वपूर्ण है। दीपावली पर लगने वाला पांच दिवसीय मेला सिर्फ उत्तर प्रदेश और प्रदेश के सीमावर्ती जिलों के लिए ही नहीं, बल्कि सूबे की राजधानी लखनऊ से लेकर देश की राजधानी दिल्ली तक के लिए श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र बना रहता है। ऊर्जांचल के संकट मोचन के नाम से प्रसिद्ध इस मंदिर से हर एक की मुरादें पूरी होती है। प्राकृतिक रूप से हरियाली से भरा आस-पास का इलाका सिर्फ श्रद्धालुओं के लिए ही नहीं, दूसरों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।
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हनुमान जी को भाता है रोट व हलुवा
अनपरा। झिंगुरदह हनुमान मंदिर का इतिहास जितना पुराना है उतना ही प्रसिद्ध भी है। हनुमान मंदिर में दीपावली पर लगने वाले मेले में उत्तर प्रदेश,मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड से आने वाले श्रद्धालु मंदिर के पास निकलने वाले झरिया में नहाते है। नहाने के बाद गुड़ व घी से बना रोट व हलुवा पहले हनुमान जी को चढ़ाते है फिर सब लोग उसका आनंद लेते है। बताया जाता है कि दूषित मन से मंदिर में प्रवेश करने वाले लोगों को हनुमान जी भवरा का रूप लेकर दंड देते है। ऐसी कई वारदात हो चुकी है। जब मंदिर में कोई अप्रिय घटना घटती है तो अचानक से भवरों का एक झुंड निकलकर हमला बोल देता है।
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