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Sitapur News: कैप्टन मनोज पांडेय का साहस देख कांप उठे थे पाकिस्तानी

Sat, 25 Jul 2026 11:50 PM IST
लखनऊ ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, सीतापुर
संवाद न्यूज एजेंसी, सीतापुर Updated Sat, 25 Jul 2026 11:50 PM IST
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The Pakistanis trembled at the sight of Captain Manoj Pandey's courage
सीतापुर। कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय सेना के वीर जवानों ने अदम्य साहस और शौर्य का परिचय देते हुए पाकिस्तानी सेना को करारी शिकस्त दी थी। कमलापुर के रूढ़ा गांव निवासी कैप्टन मनोज पांडेय भी इनमें से एक थे। उन्होंने अपने असाधारण पराक्रम और नेतृत्व से दुश्मन को धूल चटा दी थी। मरणोपरांत उन्हें देश के सर्वोच्च सैन्य सम्मान परमवीर चक्र से नवाजा गया था। उनके साहस को देखकर दुश्मन कांप उठे थे।
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कैप्टन मनोज पांडेय का जन्म 25 जून 1975 को रूढ़ा गांव में हुआ था। कुछ समय बाद उनका परिवार लखनऊ आ गया। वहां उन्होंने सैनिक स्कूल में शिक्षा प्राप्त की। बचपन से ही उनमें देशसेवा की भावना कूट-कूटकर भरी थी। सेना में भर्ती होने के अपने दृढ़ संकल्प को पूरा करने के लिए उन्होंने कड़ा परिश्रम किया। नियमित व्यायाम किया और राष्ट्रीय रक्षा अकादमी में प्रवेश प्राप्त किया।
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एनडीए के साक्षात्कार में जब मनोज से सेना में आने का कारण पूछा गया, तो उन्होंने स्पष्ट कहा था कि वह परमवीर चक्र जीतना चाहते हैं।



घात लगाकर हमला करने में हासिल थी महारत
प्रशिक्षण के बाद वर्ष 1997 में मनोज पांडेय 11 गोरखा राइफल्स रेजिमेंट की पहली बटालियन में अधिकारी बने। उनकी पहली तैनाती जम्मू कश्मीर में हुई। इसके बाद उन्होंने सियाचिन में भी अपनी सेवाएं दीं। उन्होंने कम समय में ही पहाड़ी युद्ध और दुश्मन पर घात लगाकर हमला करने में महारत हासिल कर ली थी। जब कारगिल में पाकिस्तानी घुसपैठ की सूचना मिली, तो उनकी बटालियन को तत्काल वहां भेजा गया। कैप्टन मनोज पांडेय ने आगे बढ़कर अपनी बटालियन का नेतृत्व किया और दुश्मन के सैनिकों को पीछे धकेलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
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खुखरी से मारे थे चार पाकिस्तानी सैनिक
कारगिल युद्ध भारत के लिए एक अत्यंत चुनौतीपूर्ण समय था। जब सभी सैनिकों की छुट्टियां रद्द कर दी गई थीं। 24 वर्षीय कैप्टन मनोज पांडेय को ऑपरेशन विजय के तहत जौबार टॉप पर कब्जा करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। भीषण ठंड और युद्ध की थकान के बावजूद कैप्टन पांडेय के हौसले बुलंद थे। उन्होंने अपनी डायरी में लिखा था कि अगर मौत मेरा शौर्य साबित होने से पहले मुझ पर हमला करती है, तो मैं अपनी मौत को ही मार डालूंगा। तीन जुलाई 1999 को उन्होंने खालूबार चोटी को दुश्मन के चंगुल से मुक्त कराया। अपनी खुखरी से चार पाकिस्तानी सैनिकों को मार गिराया। इस वीरतापूर्ण कार्रवाई के दौरान कैप्टन मनोज पांडेय ने सर्वोच्च बलिदान दिया। उनका जीवन और बलिदान आज भी भारतीय सेना के जवानों के लिए प्रेरणास्रोत है।
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