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आरक्षण ने बिगाड़े कई दिग्गजों के समीकरण
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सीतापुर। जिले में बुधवार को त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव की जारी आरक्षण सूची ने सभी का खेल बिगाड़ दिया है। गांव की सरकार बनाने को आतुर दावेदार व ग्राम पंचायत सदस्यों से लेकर जिला पंचायत सदस्य तक की सीट प्रभावित हुई है। अब दावेदार तेजी से गुणा-भाग में जुट गए हैं।
पिछले कई चुनावों से मनपसंद प्रधानी की सीट होने की वजह से इस बार भी लोगों को पूरी उम्मीद थी कि सीट उनके मन माफिक ही रहने वाली है, लेकिन इस बार शासन ने चुनाव में और अधिक पारदर्शिता लाने, मनमानी को रोकने के लिए 1995 से लेकर 2015 तक के पंचायत चुनाव की समीक्षा की।
इस आधार पर तय हुआ कि जो गांव कभी एससी या ओबीसी के लिए आरक्षित नहीं किए गए हैं, उन्हें जनसंख्या के आधार पर उस सीट के लिए आरक्षित किया जाएगा। शासन से पहले ही इसके संकेत मिलने से इस बार चुनाव लड़ने के लिए आतुर दिख रहे दावेदारों में बेचैनी साफ देखी जा रही थी, लेकिन मंगलवार को जारी हुई आरक्षण सूची ने ग्राम पंचायत के चुनावों की तस्वीर को साफ कर दिया है।
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ग्राम पंचायत सदस्य पद के साथ ही ग्राम पंचायत, क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायत सदस्य का वार्डवार आरक्षण तय कर दिया गया है। आरक्षण सूची को लेकर सबसे अधिक बेचैनी दावेदारों में देखी गई। सूची पर उनकी पैनी नजर रही। आरक्षण ने प्रधान से लेकर जिला पंचायत और ग्राम पंचायत सदस्य तक की सीटों को प्रभावित किया है। ऐसे में चुनाव लड़ने की मंशा लिए अधिकतर दावेदारों का खेल इस आरक्षण ने बिगाड़ दिया है। ऐसे में दावेदार अब नफा-नुकसान का अनुमान लगाने के लिए तेजी से जुट गए हैं। उनमें बेचैनी भी बढ़ी हुई है।
कई दावेदार सियासी फसल लहलहाने को आतुर
प्रधानी की जंग जीतने वाले जहां कई दिग्गज दावेदार चुनाव लड़ने से पहले धराशायी होते नजर आए। वहीं, कई ऐसे दावेदार थे जो छिपे हुए थे। मसलन, उन्होंने अपने पत्ते नहीं खोले थे। इस आरक्षण ने उन्हें ऐसी संजीवनी दी है। अब वह मैदान में आने के लिए उतावले हो गए हैं। समीकरण को साधकर ऐसे दावेदार अब अपनी सियासी फसल को लहलहाने को आतुर दिखने लगे हैं।
अब जगी आपत्ति से उम्मीद
पंचायत चुनाव के आरक्षण की सूची ने पूरे जिले की तस्वीर साफ कर दी है। ऐसे में अभी तक आरक्षण से उम्मीद लगाए जिन दावेदारों को मायूसी हाथ लगी है, उनकी आखिरी उम्मीद अब आपत्ति पर टिकी है।
चुनावी मैदान में उतरने का ख्वाब संजोए लोगों को आस है कि आपत्ति से शायद ही उनका कुछ भला हो, लेकिन जानकारों की माने तो आपत्ति से भी बहुत कुछ हासिल होने वाला नहीं है। वजह, इस बार शासन से लेकर प्रशासन ने इतनी पारदर्शिता से काम किया है, ऐसे में गुंजाइश कम ही दिख रही है। अब आपत्ति से अगर किसी को सीट मिल जाती है तो ये उसकी किस्मत ही कही जाएगी।
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पिछले कई चुनावों से मनपसंद प्रधानी की सीट होने की वजह से इस बार भी लोगों को पूरी उम्मीद थी कि सीट उनके मन माफिक ही रहने वाली है, लेकिन इस बार शासन ने चुनाव में और अधिक पारदर्शिता लाने, मनमानी को रोकने के लिए 1995 से लेकर 2015 तक के पंचायत चुनाव की समीक्षा की।
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इस आधार पर तय हुआ कि जो गांव कभी एससी या ओबीसी के लिए आरक्षित नहीं किए गए हैं, उन्हें जनसंख्या के आधार पर उस सीट के लिए आरक्षित किया जाएगा। शासन से पहले ही इसके संकेत मिलने से इस बार चुनाव लड़ने के लिए आतुर दिख रहे दावेदारों में बेचैनी साफ देखी जा रही थी, लेकिन मंगलवार को जारी हुई आरक्षण सूची ने ग्राम पंचायत के चुनावों की तस्वीर को साफ कर दिया है।
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ग्राम पंचायत सदस्य पद के साथ ही ग्राम पंचायत, क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायत सदस्य का वार्डवार आरक्षण तय कर दिया गया है। आरक्षण सूची को लेकर सबसे अधिक बेचैनी दावेदारों में देखी गई। सूची पर उनकी पैनी नजर रही। आरक्षण ने प्रधान से लेकर जिला पंचायत और ग्राम पंचायत सदस्य तक की सीटों को प्रभावित किया है। ऐसे में चुनाव लड़ने की मंशा लिए अधिकतर दावेदारों का खेल इस आरक्षण ने बिगाड़ दिया है। ऐसे में दावेदार अब नफा-नुकसान का अनुमान लगाने के लिए तेजी से जुट गए हैं। उनमें बेचैनी भी बढ़ी हुई है।
कई दावेदार सियासी फसल लहलहाने को आतुर
प्रधानी की जंग जीतने वाले जहां कई दिग्गज दावेदार चुनाव लड़ने से पहले धराशायी होते नजर आए। वहीं, कई ऐसे दावेदार थे जो छिपे हुए थे। मसलन, उन्होंने अपने पत्ते नहीं खोले थे। इस आरक्षण ने उन्हें ऐसी संजीवनी दी है। अब वह मैदान में आने के लिए उतावले हो गए हैं। समीकरण को साधकर ऐसे दावेदार अब अपनी सियासी फसल को लहलहाने को आतुर दिखने लगे हैं।
अब जगी आपत्ति से उम्मीद
पंचायत चुनाव के आरक्षण की सूची ने पूरे जिले की तस्वीर साफ कर दी है। ऐसे में अभी तक आरक्षण से उम्मीद लगाए जिन दावेदारों को मायूसी हाथ लगी है, उनकी आखिरी उम्मीद अब आपत्ति पर टिकी है।
चुनावी मैदान में उतरने का ख्वाब संजोए लोगों को आस है कि आपत्ति से शायद ही उनका कुछ भला हो, लेकिन जानकारों की माने तो आपत्ति से भी बहुत कुछ हासिल होने वाला नहीं है। वजह, इस बार शासन से लेकर प्रशासन ने इतनी पारदर्शिता से काम किया है, ऐसे में गुंजाइश कम ही दिख रही है। अब आपत्ति से अगर किसी को सीट मिल जाती है तो ये उसकी किस्मत ही कही जाएगी।