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टिकट न मिला तो डगमगाई आस्था, बदल लिया रास्ता

Thu, 10 Feb 2022 12:09 AM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Thu, 10 Feb 2022 12:09 AM IST
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If you don't get a ticket, your faith falters, changed the way
सीतापुर। जिस तरह इन दिनों मौसम का मिजाज बदल रहा है, उसी तर्ज पर जिले की राजनीति में भी बदलाव हो रहे हैं। अब इस बदलाव की बयार में किसी को फायदा तो किसी को नुकसान होना लाजिमी है। पर सियासी भगदड़ ने एक बार फिर से इस बात पर मुहर लगाई कि यहां कुछ भी स्थायी नहीं होता। कब, क्या हो जाए... कहना मुश्किल है।
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हम बात कर रहे हैं जिले के दलबदलू और बागी हुए नेताओं की। टिकट मिलने की आस लगाए नेताओं की उम्मीदें धुंधली हुईं तो उनकी पार्टी के प्रति आस्था बदल गई। आननफानन फैसला लिया और रास्ता बदल लिया। सबसे पहले बात करते हैं नगर विधायक राकेश राठौर की। 2017 में भाजपा के टिकट से जीते विधायक को पार्टी की नीतियां रास नहीं आ रही थी।
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इसी वजह से वह मुखालफत करने लगे थे। करीब साढ़े चार साल तक पार्टी में रहे लेकिन होते भी न के बराबर। इसके बाद चुनावी बिगुल बजने से कुछ माह पहले ही भाजपा छोड़कर सपा का दामन थाम लिया। राजनीतिक जानकारों की माने तो नगर विधायक गए थे, इसी उम्मीद से कि टिकट मिलेगा, लेकिन ऐसा हो नहीं सका। पार्टी ने पूर्व प्रत्याशी को मैदान में उतार दिया।
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पूर्व मंत्री रामहेत भारती बसपा सरकार में विधायक बने। इसके बाद भाजपा का दामन थाम लिया था, लेकिन यहां पर राजनीतिक ग्राफ बढ़ता न देख चुनाव से पहले भाजपा छोड़कर वह साइकिल पर सवार हो गए और आखिरकार उन्हें हरगांव विधानसभा क्षेत्र से टिकट मिल गया। ऐसे में सपा के हरगांव से पूर्व विधायक रहे रमेश राही टिकट की दौड़ से बाहर गए। लिहाजा, उन्होंने पार्टी से त्याग पत्र देते हुए अपने भाई विधायक हरगांव सुरेश राही के साथ आ गए।
बिसवां विधानसभा क्षेत्र की बात करें तो पूर्व विधायक निर्मल वर्मा सपा छोड़कर भाजपा में आए। पार्टी से उन्हें टिकट मिला। मौजूदा विधायक महेंद्र यादव का टिकट काट दिया गया। सिधौली विधानसभा सीट की बात करें तो 2017 में मोदी लहर में बसपा के टिकट से जीतने वाले विधायक हरगोविंद भार्गव ने पार्टी छोड़कर कई माह पहले सपा का दामन थाम लिया।
2017 में सपा के टिकट से चुनाव लड़ने वाले पूर्व विधायक मनीष रावत को हार का सामना करना पड़ा था। वह इस बार भी पार्टी से टिकट के लिए दावेदारी कर रहे थे, लेकिन ऐन वक्त तक मामला फंसा रहा। आखिर में सपा ने दल बदलकर आए हरगोविंद भार्गव को चुनावी मैदान में उतार दिया, फिर क्या उसी दिन मनीष रावत ने कार्यकर्ताओं के साथ बैठक की, उसमें रोये भी। इसके बाद भाजपा का दामन थाम लिया और फिर पार्टी ने उन्हें सिधौली से चुनावी मैदान में उतार दिया। दलबदल का यह पूरा खेल हाल ही में हुुआ, जो काफी दिलचस्प है।
मैदान में उतरने से पहले ही हुए आउट
हाल के दिनों में राजनीति में हुए बदलाव और दलबदलुओं के पाला बदलने से जिले की सियासत भी काफी दिलचस्प रही। कड़ाके की ठंड में भी सियासी तापमान बढ़ता रहा, लेकिन इस बदलाव से कई नेताओं को तो सियासी पिच पर बैटिंग करने की जिम्मेदारी मिली, लेकिन कई ऐसे भी रहे, जो मैदान में उतरने से पहले ही आउट हो गए। अब उन्हें कब मौका मिलेगा, यह तो वक्त तय करेगा।

बगावत के रास्ते पर चल पड़े अपने
पार्टी के लिए मेहनत करने वाले नेेताओं को जब मौका नहीं मिला तो उनकी भी निष्ठा डोल गई। पार्टी से बगावत करते हुए निर्दल प्रत्याशी के रूप में चुनावी मैदान में उतर गए। इसमें सदर विधानसभा सीट से निर्दल प्रत्याशी भाजपा नेता साकेत मिश्रा, बिसवां विधानसभा क्षेत्र से निर्दल प्रत्याशी के रूप में सलिल सेठ बगावत पर उतर आए। नामांकन पत्र दाखिल करने के बाद अब चुनावी मैदान में ताल ठोंक रहे हैं। इस बगावत का कितना फायदा और नुकसान उन्हें मिलता है यह तो 10 मार्च के नतीजे बताएंगे।
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