{"_id":"668af5b2e234daf5850c1717","slug":"guilty-of-fraud-gets-seven-years-imprisonment-after-30-years-sitapur-news-c-102-1-slko1037-115932-2024-07-08","type":"story","status":"publish","title_hn":"Sitapur News: जालसाजी के दोषी को 30 साल बाद सात वर्ष की सजा","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Sitapur News: जालसाजी के दोषी को 30 साल बाद सात वर्ष की सजा
Mon, 08 Jul 2024 01:38 AM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, सीतापुर
संवाद न्यूज एजेंसी, सीतापुर
Updated Mon, 08 Jul 2024 01:38 AM IST
विज्ञापन
सीतापुर। शहर कोतवाली क्षेत्र स्थित डाकघर में एक व्यक्ति कूटरचित दस्तावेज तैयार कर इंदिरा विकास पत्रों का भुगतान लेने पहुंचा था। इस मामले में 30 वर्षाें के बाद अपर सिविल जज सीनियर डिवीजन आशालिका पांडेय ने अभियुक्त को दोषसिद्ध करार दिया। कोर्ट ने उसे सात वर्ष के कारावास की सजा सुनाई। साथ ही 14 हजार का अर्थदंड भी लगाया है।
सहायक अभियोजन अधिकारी ने बताया कि वर्ष 1994 में कानपुर जिले के सिविल लाइंस थाना क्षेत्र निवासी राकेश सिंह सीतापुर शहर स्थित डाकघर में छह इंदिरा विकास पत्र लेकर पहुंचा। उसने पोस्टमाटर से इन इंदिरा विकास पत्रों के भुगतान का अनुरोध किया।
पोस्टमास्टर को इंदिरा विकास पत्रों के जाली होने का शक हुआ तो जांच कराई। जांच में पता चला कि ये सभी विकास पत्र कार्यालय से जारी ही नहीं किए गए थे। इंदिरा विकास पत्रों पर फर्जी मोहरें भी लगाई गईं थीं। इसके बाद पोस्टमास्टर ने पुलिस को सूचना दी।
विज्ञापन
पुलिस ने राकेश सिंह पर धोखाधड़ी की धाराओं में मुकदमा दर्ज किया। न्यायालय में 29 मार्च 1995 को यह वाद दायर हुआ। करीब 30 वर्षाें तक चली सुनवाई के बाद कोर्ट ने राकेश सिंह को दोषी ठहराया। कोर्ट ने इस मामले में उसे सात साल की सजा सुनाई। साथ ही 14 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया। इस दौरान अभियुक्त जमानत पर बाहर था।
विज्ञापन
सहायक अभियोजन अधिकारी ने बताया कि वर्ष 1994 में कानपुर जिले के सिविल लाइंस थाना क्षेत्र निवासी राकेश सिंह सीतापुर शहर स्थित डाकघर में छह इंदिरा विकास पत्र लेकर पहुंचा। उसने पोस्टमाटर से इन इंदिरा विकास पत्रों के भुगतान का अनुरोध किया।
विज्ञापन
पोस्टमास्टर को इंदिरा विकास पत्रों के जाली होने का शक हुआ तो जांच कराई। जांच में पता चला कि ये सभी विकास पत्र कार्यालय से जारी ही नहीं किए गए थे। इंदिरा विकास पत्रों पर फर्जी मोहरें भी लगाई गईं थीं। इसके बाद पोस्टमास्टर ने पुलिस को सूचना दी।
विज्ञापन
पुलिस ने राकेश सिंह पर धोखाधड़ी की धाराओं में मुकदमा दर्ज किया। न्यायालय में 29 मार्च 1995 को यह वाद दायर हुआ। करीब 30 वर्षाें तक चली सुनवाई के बाद कोर्ट ने राकेश सिंह को दोषी ठहराया। कोर्ट ने इस मामले में उसे सात साल की सजा सुनाई। साथ ही 14 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया। इस दौरान अभियुक्त जमानत पर बाहर था।