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राजनीतिक दलों के लिए सबक बने ब्लॉक प्रमुख के नतीजे
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सीतापुर। जिले में हुआ ब्लॉक प्रमुख का चुनाव कई मायनों में दिलचस्प रहा। नतीजों से भाजपा गदगद है। होना भी जरूरी है। जिले की एक तिहाई से अधिक ब्लॉक प्रमुख की सीटों पर भगवा परचम फहरा है, लेकिन पंचायत चुनाव को 2022 का सेमीफाइनल मानकर चल रही भाजपा के लिए चुनावी नतीजों से सबक लेने की जरूरत भी है। ब्लॉक प्रमुख की तीन सीटों पर कब्जा जमाने में कामयाब रही मुख्य विपक्षी पार्टी सपा को यह चुनाव ‘आक्सीजन’ जरूर दे गया है।
19 ब्लॉक वाले सीतापुर जिले में सत्तारूढ़ भाजपा के प्रत्याशी गोंदलामऊ, मिश्रिख, महोली, ऐलिया, हरगांव, लहरपुर, बिसवां, खैराबाद, रामपुर मथुरा, बेहटा, रेउसा में निर्विरोध निर्वाचित हुए। इन ब्लॉकों पर प्रत्याशियों को निर्विरोध जिताने के पीछे पार्टी के जिम्मेदारों की कुशल रणनीति अहम मानी जा रही है। निर्विरोध चुनाव इसी का परिणाम है, जिससे भाजपा की झोली में ये सीटें गई हैं।
वहीं, शनिवार को जिले के आठ ब्लॉक प्रमुख की सीटों पर चुनाव हुआ, जिसमें मछरेहटा, पिसावां, परसेंडी और सकरन में भाजपा के प्रत्याशी जीते। जबकि पहला, महमूदाबाद, सिधौली में सपा और कसमंडा में निर्दलीय प्रत्याशी का ब्लॉक प्रमुखी पर कब्जा रहा। इस तरह से जिले में भाजपा 15 ब्लॉकों पर काबिज हुई, तीन पर सपा और एक निर्दलीय।
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निर्विरोध निर्वाचित हुए प्रत्याशियों को छोड़कर अगर बात चुनावी नतीजों की, की जाए तो 15 सीटों पर भगवा परचम फहराने के बाद भी भाजपा को सबक और सीख लेने की जरूरत है। 15 सीट यानी की एक तिहाई से अधिक सीटों पर काबिज होने से पार्टी के जिम्मेदार गदगद हैं। अति उत्साह में भी हैं, लेकिन अति उत्साह की जगह चिंतन, मंथन करने का भी वक्त है।
...तो नतीजे कुछ और ही होते
चंद महीनों बाद ही यूपी में विधानसभा के चुनाव हैं। ऐसे में पंचायत चुनाव को 2022 का सेेमीफाइनल मानकर चल रही भारतीय जनता पार्टी के लिए ये वक्त बेहद अहम है। वजह, जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव हो या फिर ब्लॉक प्रमुखी के। ये चुनाव सीधे जनता से नहीं होते हैं, पर विधानसभा चुनाव में जनता ही भाग्य विधाता होती है।
वही राजतिलक करती है। जिस तरह से आठ ब्लॉकों पर हुए चुनाव में बीडीसी ने चार जगहों पर भाजपा, तीन जगहों पर सपा, एक जगह निर्दलीय को जिताया है, उससे सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि अगर सभी सीटों पर चुनाव होते और कांटे की टक्कर दे रही सपा के सभी नेता एकजुट होकर प्रत्याशियों को जिताने में ताकत लगाते तो यकीनन आज नतीजे कुछ और ही होते।
चुनावी घटनाक्रम ने बदली सियासी तस्वीर
सपा के एकजुट होने की बात खुद शनिवार को चुनावी नतीजों के बाद सपा एमएलसी आनंद भदौरिया ने ट्विट कर कही है। अगर ऐसा होता तो भाजपा को धीरे से जोर का झटका भी लगना तय था। सियासी जानकारों की माने तो अगर पिसावां में एक मत से सपा प्रत्याशी, सपा के जिलाध्यक्ष छत्रपाल यादव के सगे भाई भाजपा प्रत्याशी से न हारता तो यह सीट भी सपा के खाते में जा सकती थी।
इसी तरह से खैराबाद में दूसरे प्रत्याशी का नामांकन ही नहीं हो सका। सपा के पूर्व विधायक राधेश्याम जायसवाल ने इसको लेकर हंगामा भी किया। धरना प्रदर्शन भी किया, लेकिन प्रत्याशी का नामांकन नहीं करा सके। ऐसे में भाजपा के अजय विश्वकर्मा ब्लॉक प्रमुख की कुर्सी पर काबिज हो गए। दूसरे प्रत्याशी का पर्चा दाखिल होता तो यहां भी राह बहुत आसान नहीं थी।
रामपुर मथुरा की बात की जाए तो वहां भी सपा का प्रत्याशी पर्चा दाखिल नहीं कर सका। भाजपा प्रत्याशी ब्लॉक प्रमुख की सीट पर काबिज हो गए। अगर यहां भी चुनाव होता तो कांटे की टक्कर में भाजपा के खाते से एक सीट कम होने के आसार बहुत नजर आ रहे थे।
हार और जीत का मंथन जरूरी
ब्लॉक प्रमुुख चुनाव के इस पूरे घटनाक्रम का लब्बोलुआब यही है कि भाजपा को जीत की वजहों की समीक्षा करने की जरूरत है, तभी 2022 में यूपी फतह का पार्टी का मिशन जिले से साकार हो सकेगा। सपा के लिए नतीजे ‘आक्सीजन’ देने का काम तो कर गए हैं, लेकिन अब जरूरत ‘इम्युनिटी’ बरकरार रखने की। सिर्फ बरकरार ही नहीं इसे बढ़ाने की भी जरूरत है। तमाम मुश्किलों, कठिनाइयों और कार्रवाई का दंश झेलने के बाद भी तीन सीट पाना भी आसान नहीं था।
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19 ब्लॉक वाले सीतापुर जिले में सत्तारूढ़ भाजपा के प्रत्याशी गोंदलामऊ, मिश्रिख, महोली, ऐलिया, हरगांव, लहरपुर, बिसवां, खैराबाद, रामपुर मथुरा, बेहटा, रेउसा में निर्विरोध निर्वाचित हुए। इन ब्लॉकों पर प्रत्याशियों को निर्विरोध जिताने के पीछे पार्टी के जिम्मेदारों की कुशल रणनीति अहम मानी जा रही है। निर्विरोध चुनाव इसी का परिणाम है, जिससे भाजपा की झोली में ये सीटें गई हैं।
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वहीं, शनिवार को जिले के आठ ब्लॉक प्रमुख की सीटों पर चुनाव हुआ, जिसमें मछरेहटा, पिसावां, परसेंडी और सकरन में भाजपा के प्रत्याशी जीते। जबकि पहला, महमूदाबाद, सिधौली में सपा और कसमंडा में निर्दलीय प्रत्याशी का ब्लॉक प्रमुखी पर कब्जा रहा। इस तरह से जिले में भाजपा 15 ब्लॉकों पर काबिज हुई, तीन पर सपा और एक निर्दलीय।
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निर्विरोध निर्वाचित हुए प्रत्याशियों को छोड़कर अगर बात चुनावी नतीजों की, की जाए तो 15 सीटों पर भगवा परचम फहराने के बाद भी भाजपा को सबक और सीख लेने की जरूरत है। 15 सीट यानी की एक तिहाई से अधिक सीटों पर काबिज होने से पार्टी के जिम्मेदार गदगद हैं। अति उत्साह में भी हैं, लेकिन अति उत्साह की जगह चिंतन, मंथन करने का भी वक्त है।
...तो नतीजे कुछ और ही होते
चंद महीनों बाद ही यूपी में विधानसभा के चुनाव हैं। ऐसे में पंचायत चुनाव को 2022 का सेेमीफाइनल मानकर चल रही भारतीय जनता पार्टी के लिए ये वक्त बेहद अहम है। वजह, जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव हो या फिर ब्लॉक प्रमुखी के। ये चुनाव सीधे जनता से नहीं होते हैं, पर विधानसभा चुनाव में जनता ही भाग्य विधाता होती है।
वही राजतिलक करती है। जिस तरह से आठ ब्लॉकों पर हुए चुनाव में बीडीसी ने चार जगहों पर भाजपा, तीन जगहों पर सपा, एक जगह निर्दलीय को जिताया है, उससे सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि अगर सभी सीटों पर चुनाव होते और कांटे की टक्कर दे रही सपा के सभी नेता एकजुट होकर प्रत्याशियों को जिताने में ताकत लगाते तो यकीनन आज नतीजे कुछ और ही होते।
चुनावी घटनाक्रम ने बदली सियासी तस्वीर
सपा के एकजुट होने की बात खुद शनिवार को चुनावी नतीजों के बाद सपा एमएलसी आनंद भदौरिया ने ट्विट कर कही है। अगर ऐसा होता तो भाजपा को धीरे से जोर का झटका भी लगना तय था। सियासी जानकारों की माने तो अगर पिसावां में एक मत से सपा प्रत्याशी, सपा के जिलाध्यक्ष छत्रपाल यादव के सगे भाई भाजपा प्रत्याशी से न हारता तो यह सीट भी सपा के खाते में जा सकती थी।
इसी तरह से खैराबाद में दूसरे प्रत्याशी का नामांकन ही नहीं हो सका। सपा के पूर्व विधायक राधेश्याम जायसवाल ने इसको लेकर हंगामा भी किया। धरना प्रदर्शन भी किया, लेकिन प्रत्याशी का नामांकन नहीं करा सके। ऐसे में भाजपा के अजय विश्वकर्मा ब्लॉक प्रमुख की कुर्सी पर काबिज हो गए। दूसरे प्रत्याशी का पर्चा दाखिल होता तो यहां भी राह बहुत आसान नहीं थी।
रामपुर मथुरा की बात की जाए तो वहां भी सपा का प्रत्याशी पर्चा दाखिल नहीं कर सका। भाजपा प्रत्याशी ब्लॉक प्रमुख की सीट पर काबिज हो गए। अगर यहां भी चुनाव होता तो कांटे की टक्कर में भाजपा के खाते से एक सीट कम होने के आसार बहुत नजर आ रहे थे।
हार और जीत का मंथन जरूरी
ब्लॉक प्रमुुख चुनाव के इस पूरे घटनाक्रम का लब्बोलुआब यही है कि भाजपा को जीत की वजहों की समीक्षा करने की जरूरत है, तभी 2022 में यूपी फतह का पार्टी का मिशन जिले से साकार हो सकेगा। सपा के लिए नतीजे ‘आक्सीजन’ देने का काम तो कर गए हैं, लेकिन अब जरूरत ‘इम्युनिटी’ बरकरार रखने की। सिर्फ बरकरार ही नहीं इसे बढ़ाने की भी जरूरत है। तमाम मुश्किलों, कठिनाइयों और कार्रवाई का दंश झेलने के बाद भी तीन सीट पाना भी आसान नहीं था।