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संसाधन के अभाव से जूझ रहा जिला अस्पताल
Updated Tue, 18 Jul 2017 09:47 PM IST
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संसाधन के अभाव से जूझ रहा जिला अस्पताल
प्रतिदिन 10 से 15 मरीज होते लखनऊ रेफर
अमर उजाला ब्यूरो
सीतापुर। जिले में स्वास्थ्य विभाग की ही सेहत सुधरने का नाम नहीं ले रही है। हालत यह है कि जिला अस्पताल ही संसाधनों के अभाव से जूझ रहा है। जिसकी वजह से प्रतिदिन 10 से 15 मरीज मेडिकल कॉलेज व ट्रॉमा सेंटर लखनऊ रेफर होते हैं। जिम्मेदारों का कहना है कि अगर यहां पर पर्याप्त संसाधन उपलब्ध हो तो उन्हें मरीजों को लखनऊ न रेफर करना पड़े। 45 लाख की आबादी वाले इस जिले की सेहत को दुरुस्त रखने के लिए जिला अस्पताल, महिला अस्पताल, 20 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र व 61 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र मौजूद हैं। प्राथमिक व सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र इलाज के मामले में फिसड्डी साबित हो रहे हैं। यही वजह है कि जिला अस्पताल पर मरीजों का बोझ बढ़ रहा है। प्रतिदिन 80 से 90 मरीज जिला अस्पताल में भर्ती किए जाते हैं। इनमें 10 से 15 मरीज प्रतिदिन लखनऊ मेडिकल कॉलेज या फिर ट्रॉमा सेंटर रेफर किए जाते हैं। जिला अस्पताल के डॉक्टरों की मानें तो रेफर किए जाने वाले मरीजों का इलाज यहां संभव नहीं होता है, जिसकी वजह से उनकी जान बचाने के लिए उन्हें मेडिकल कॉलेज या फिर ट्रॉमा सेंटर रेफर किया जाता है। मरीजों को रेफर करते समय रेफर करने का कारण उसकी फाइल में दर्ज किया जाता है।
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ऐसी हालत में होते रेफर
जिले की सड़कों पर अक्सर हादसे होते रहते हैं। इनमें सबसे अधिक संख्या हेड इंजरी वाले मरीजों की होती है। जिला अस्पताल में सिटी स्कैन की मशीन नहीं है। जिसकी वजह से मरीज का इलाज यहां संभव नहीं है। वहीं जिन मरीजों पर पैरालिसिस अटैक होता है उन मरीजों के इलाज के लिए भी पर्याप्त संसाधन यहां मौजूद नहीं है। किसी के नाजुक अंगों सिर, पेट, सीना आदि पर गोली लगने का इलाज भी यहां संभव नहीं है। ठीक इसी तरह से जो मरीज जहरीला पदार्थ खा लेते हैं, किसी को हार्ट अटैक पड़ जाए और कोई 100 प्रतिशत तक आग से झुलसा हो। ऐसे मरीजों का इलाज भी जिला अस्पताल में नहीं हो सकता है। ऐसे मरीजों को लखनऊ रेफर करना, डॉक्टरों की मजबूरी है।
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ये हैं खामियां
जिला अस्पताल में सिटी स्कैन की मशीन नहीं है। यहां पर डॉयलसिस की व्यवस्था नहीं है। न्यूरो सर्जन मौजूद नहीं है। ऐसी ही तमाम खामियां हैं, जिनकी वजह से जिला अस्पताल अधूरा है। संसाधनों के अभाव की वजह से ही मरीजों को लखनऊ रेफर किया जाता है। डॉक्टरों का कहना है कि जो संसाधन कम हैं, उनका इंतजाम हो जाए, तो मरीजों को लखनऊ न रेफर करना पड़े।
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213 बेड का अस्पताल
जिला अस्पताल 213 बेड का है। इसके बावजूद अस्पताल प्रशासन ने 250 बेड डाल रखे हैं। मरीजों की संख्या इस कदर बढ़ रही है, कि बेड कम पड़ जाते हैं। मरीजों का इलाज फर्श पर बिस्तर कराना पड़ता है।
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गंभीर रोगी ही किए जाते हैं रेफर
जिला अस्पताल में जो संसाधन हैं, उनसे इलाज किया जाता है। यदि कोई मरीज बेहद गंभीर है, उसका इलाज यहां संभव नहीं है। ऐसी दशा में मरीज की जान बचाने के लिए मरीज को लखनऊ रेफर किया जाता है।
- डॉ. एके गौतम, सीएमएस
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प्रतिदिन 10 से 15 मरीज होते लखनऊ रेफर
अमर उजाला ब्यूरो
सीतापुर। जिले में स्वास्थ्य विभाग की ही सेहत सुधरने का नाम नहीं ले रही है। हालत यह है कि जिला अस्पताल ही संसाधनों के अभाव से जूझ रहा है। जिसकी वजह से प्रतिदिन 10 से 15 मरीज मेडिकल कॉलेज व ट्रॉमा सेंटर लखनऊ रेफर होते हैं। जिम्मेदारों का कहना है कि अगर यहां पर पर्याप्त संसाधन उपलब्ध हो तो उन्हें मरीजों को लखनऊ न रेफर करना पड़े। 45 लाख की आबादी वाले इस जिले की सेहत को दुरुस्त रखने के लिए जिला अस्पताल, महिला अस्पताल, 20 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र व 61 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र मौजूद हैं। प्राथमिक व सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र इलाज के मामले में फिसड्डी साबित हो रहे हैं। यही वजह है कि जिला अस्पताल पर मरीजों का बोझ बढ़ रहा है। प्रतिदिन 80 से 90 मरीज जिला अस्पताल में भर्ती किए जाते हैं। इनमें 10 से 15 मरीज प्रतिदिन लखनऊ मेडिकल कॉलेज या फिर ट्रॉमा सेंटर रेफर किए जाते हैं। जिला अस्पताल के डॉक्टरों की मानें तो रेफर किए जाने वाले मरीजों का इलाज यहां संभव नहीं होता है, जिसकी वजह से उनकी जान बचाने के लिए उन्हें मेडिकल कॉलेज या फिर ट्रॉमा सेंटर रेफर किया जाता है। मरीजों को रेफर करते समय रेफर करने का कारण उसकी फाइल में दर्ज किया जाता है।
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ऐसी हालत में होते रेफर
जिले की सड़कों पर अक्सर हादसे होते रहते हैं। इनमें सबसे अधिक संख्या हेड इंजरी वाले मरीजों की होती है। जिला अस्पताल में सिटी स्कैन की मशीन नहीं है। जिसकी वजह से मरीज का इलाज यहां संभव नहीं है। वहीं जिन मरीजों पर पैरालिसिस अटैक होता है उन मरीजों के इलाज के लिए भी पर्याप्त संसाधन यहां मौजूद नहीं है। किसी के नाजुक अंगों सिर, पेट, सीना आदि पर गोली लगने का इलाज भी यहां संभव नहीं है। ठीक इसी तरह से जो मरीज जहरीला पदार्थ खा लेते हैं, किसी को हार्ट अटैक पड़ जाए और कोई 100 प्रतिशत तक आग से झुलसा हो। ऐसे मरीजों का इलाज भी जिला अस्पताल में नहीं हो सकता है। ऐसे मरीजों को लखनऊ रेफर करना, डॉक्टरों की मजबूरी है।
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ये हैं खामियां
जिला अस्पताल में सिटी स्कैन की मशीन नहीं है। यहां पर डॉयलसिस की व्यवस्था नहीं है। न्यूरो सर्जन मौजूद नहीं है। ऐसी ही तमाम खामियां हैं, जिनकी वजह से जिला अस्पताल अधूरा है। संसाधनों के अभाव की वजह से ही मरीजों को लखनऊ रेफर किया जाता है। डॉक्टरों का कहना है कि जो संसाधन कम हैं, उनका इंतजाम हो जाए, तो मरीजों को लखनऊ न रेफर करना पड़े।
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213 बेड का अस्पताल
जिला अस्पताल 213 बेड का है। इसके बावजूद अस्पताल प्रशासन ने 250 बेड डाल रखे हैं। मरीजों की संख्या इस कदर बढ़ रही है, कि बेड कम पड़ जाते हैं। मरीजों का इलाज फर्श पर बिस्तर कराना पड़ता है।
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गंभीर रोगी ही किए जाते हैं रेफर
जिला अस्पताल में जो संसाधन हैं, उनसे इलाज किया जाता है। यदि कोई मरीज बेहद गंभीर है, उसका इलाज यहां संभव नहीं है। ऐसी दशा में मरीज की जान बचाने के लिए मरीज को लखनऊ रेफर किया जाता है।
- डॉ. एके गौतम, सीएमएस