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वेंटीलेटर न होने से एक माह में 12 बच्चों ने दम तोड़ा
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सीतापुर। जिला महिला चिकित्सालय के सघन चिकित्सा शिशु इकाई में वेंटीलेटर न होने से इसका खामियाजा नवजातों को भुगतना पड़ रहा है। इसकी तस्दीक सरकारी आंकड़े कर रहे हैं। पिछले महीने 12 नवजातों की बर्थ एक्सफिक्सिया से मौत हो गई थी। कई बच्चों को सांस लेने में तकलीफ थी। अगर बच्चों को समय पर वेंटीलेटर मिल जाता तो शायद उनकी जान बच जाती। अस्पताल में वेंटीलेटर की सुविधा न मिलने से नवजातों की जान पर बन आ रही है।
जिला महिला चिकित्सालय में नवजात बच्चों के लिए अलग से एक यूनिट बनी हुई है। अगर जन्म लेने के बाद बच्चों में कोई दिक्कत आती है तो शिशु को चिकित्सा सघन इकाई (एसएनसीयू) वार्ड में भर्ती किया जाता है। यहां पर बच्चों के लिए 12 वॉर्मर लगे है। यहां पर जन्म के 28 दिन तक के बच्चे एडमिट किए जाते है।
बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. जितेंद्र कुमार का कहना है कि नवजात में जन्म लेने के बाद बर्थ एक्सफिक्सिया की बीमारी अधिकतर बच्चों में आ जाती है। इस बीमारी में बच्चे रोते नहीं है। उनको सांस लेने में तकलीफ पैदा होती है। कई बच्चों में हल्की बीमारी होती है तो उनकी इलाज के बाद सांस की समस्या दूर हो जाती है। कई बच्चे ऐसे होते है जो एकदम से सांस नहीं ले पाते है। ऐसे में उनको वेंटीलेटर के जरिए ही सांस दिलाई जा सकती है।
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यहां पर वेंटीलेटर न होने से ऐसे बच्चों का इलाज करना मुश्किल हो जाता है। पिछले माह 12 नवजात की मौत हुई थी, जिसमें आठ बच्चे ऐसे थे, जिनको बर्थ एक्सफिक्सिया की बीमारी थी। अगर इन बच्चों को तत्काल वेंटीलेटर का लाभ मिल गया होता तो शायद इनकी मौत न होती। यह समस्या नवजात के लिए घातक साबित हो रही है।
केवल रेफर ही है विकल्प
जिला महिला चिकित्सालय में वेंटीलेटर की सुविधा न होने पर चिकित्सकों के पास रेफर के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है। चिकित्सकों का कहना है कि जैसे ही बच्चे को रेफर किया जाता है तो उनके परिजन घबरा जाते हैं।
कहने लगते है लखनऊ में कैसे इलाज होगा, तमाम दिक्कतें आएंगी। ऐसे में वह जाने से इनकार कर देते हैं। अगर वह समय से लखनऊ पहुंच जाए तो बच्चे ठीक हो सकते हैं। कई बार यह भी दिक्कत होती है कि बच्चे देर से लखनऊ पहुंचते हैं। इससे वह रास्ते में ही दम तोड़ देते है।
समय से पहले पैदा होने वाले बच्चों को होती जरूरत
वेटीलेंटर की जरूरत समय से पहले पैदा होने वाले बच्चों के लिए होती है। बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. जितेंद्र कुमार का कहना है कि अगर बच्चे समय से पहले पैदा होते हैं तो उनको वजन 1.5 किलो तक होता है।
वह बच जाते हैं। अगर छह से सात माह के बीच बच्चे पैदा होते है, उनका वजन करीब एक किलो होता है, उस समय उनके फेफड़े पूरी तरह नहीं बने होते हैं। ऐसे में सांस नहीं ले सकते। वेंटीलेटर के जरिये ही उनको बचाया जा सकता है। जब यह सुविधा नहीं है तो प्री मैच्चोर बच्चे मौत के मुंह में समा जाते है।
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जिला महिला चिकित्सालय में नवजात बच्चों के लिए अलग से एक यूनिट बनी हुई है। अगर जन्म लेने के बाद बच्चों में कोई दिक्कत आती है तो शिशु को चिकित्सा सघन इकाई (एसएनसीयू) वार्ड में भर्ती किया जाता है। यहां पर बच्चों के लिए 12 वॉर्मर लगे है। यहां पर जन्म के 28 दिन तक के बच्चे एडमिट किए जाते है।
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बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. जितेंद्र कुमार का कहना है कि नवजात में जन्म लेने के बाद बर्थ एक्सफिक्सिया की बीमारी अधिकतर बच्चों में आ जाती है। इस बीमारी में बच्चे रोते नहीं है। उनको सांस लेने में तकलीफ पैदा होती है। कई बच्चों में हल्की बीमारी होती है तो उनकी इलाज के बाद सांस की समस्या दूर हो जाती है। कई बच्चे ऐसे होते है जो एकदम से सांस नहीं ले पाते है। ऐसे में उनको वेंटीलेटर के जरिए ही सांस दिलाई जा सकती है।
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यहां पर वेंटीलेटर न होने से ऐसे बच्चों का इलाज करना मुश्किल हो जाता है। पिछले माह 12 नवजात की मौत हुई थी, जिसमें आठ बच्चे ऐसे थे, जिनको बर्थ एक्सफिक्सिया की बीमारी थी। अगर इन बच्चों को तत्काल वेंटीलेटर का लाभ मिल गया होता तो शायद इनकी मौत न होती। यह समस्या नवजात के लिए घातक साबित हो रही है।
केवल रेफर ही है विकल्प
जिला महिला चिकित्सालय में वेंटीलेटर की सुविधा न होने पर चिकित्सकों के पास रेफर के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है। चिकित्सकों का कहना है कि जैसे ही बच्चे को रेफर किया जाता है तो उनके परिजन घबरा जाते हैं।
कहने लगते है लखनऊ में कैसे इलाज होगा, तमाम दिक्कतें आएंगी। ऐसे में वह जाने से इनकार कर देते हैं। अगर वह समय से लखनऊ पहुंच जाए तो बच्चे ठीक हो सकते हैं। कई बार यह भी दिक्कत होती है कि बच्चे देर से लखनऊ पहुंचते हैं। इससे वह रास्ते में ही दम तोड़ देते है।
समय से पहले पैदा होने वाले बच्चों को होती जरूरत
वेटीलेंटर की जरूरत समय से पहले पैदा होने वाले बच्चों के लिए होती है। बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. जितेंद्र कुमार का कहना है कि अगर बच्चे समय से पहले पैदा होते हैं तो उनको वजन 1.5 किलो तक होता है।
वह बच जाते हैं। अगर छह से सात माह के बीच बच्चे पैदा होते है, उनका वजन करीब एक किलो होता है, उस समय उनके फेफड़े पूरी तरह नहीं बने होते हैं। ऐसे में सांस नहीं ले सकते। वेंटीलेटर के जरिये ही उनको बचाया जा सकता है। जब यह सुविधा नहीं है तो प्री मैच्चोर बच्चे मौत के मुंह में समा जाते है।