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बर्ड सेंचुरी के लिए अनुकूल है जिले का वातावरण
अमर उजाला ब्यूरो/सिद्धार्थनगर
Updated Wed, 13 Jan 2016 11:42 PM IST
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करीब दो साल बाद मझौली सागर में फिर से लेसर एड्ज्यूटेंट (प्रवासी पक्षी) देखे गए हैं। इनकी संख्या करीब 15 गिनती की गई है। छोटे एरिया में लेसर एड्ज्यूमेंट की इस मौजूदगी को पक्षी विशेषज्ञों ने अच्छे संकेत माने हैं। उनका दावा है कि जिले का वातावरण पक्षी विहार के लिए बेहद अनुकूल है। सरकार ध्यान दे और थोड़ी सुविधाएं विकसित की जाएं तो यहां पक्षी विहार बनाने की पूरी संभावनाएं हैं।
वन विभाग के निमंत्रण पर पहुंचे पक्षी विशेषज्ञों ने दो दिन तक जिले के प्राकृतिक वातावरण के अध्ययन के बाद इसकी रिपोर्ट तैयार कर ली है। जल्द ही वह रिपोर्ट वन विभाग को सौंपेंगे, जिसके बाद विभाग उसे शासन तक पहुंचाएंगा। भगवान बुद्ध की क्रीड़ास्थली कपिलवस्तु हिमालय की तराई में स्थित है।
मैदानी क्षेत्र का अंतिम और पर्वतीय क्षेत्र की शुरुआत यहीं से होती है। लिहाजा प्रचूर प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर इस क्षेत्र में दोनों तरह का वातावरण मौजूद है। सर्दी में जब पहाड़ों पर बर्फ जमनी तेज होती है तो उस क्षेत्र में पाए जाने वाले पक्षी मैदानी इलाकों का रूख कर लेते हैं।
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हजारों किमी की दूरी तय कर आने वाले पक्षियों के लिए कपिलवस्तु का मझौली सागर प्रमुख शरणस्थली रही है। यही कारण भी रहा है कि यहां पक्षी विहार बनाने की जरूरत अरसे से महसूस की जाती रही है। इन संभावनाओं को अब ताजा सर्वेक्षण से बल मिले हैं। वन विभाग के विशेष आमंत्रण पर पहुंची पक्षी विशेषज्ञों की दो सदस्यीय टीम ने क्षेत्र में दो दिनों तक रहकर पक्षियों की गणना की है।
इस दौरान स्थानीय पक्षियों के अलावा लेसर एड्ज्यूमेंट भी गिने गए हैं।
सारस की तरह दिखने वाले लंबी चोंच वाले यह पक्षी पिछले दो वर्षों से इस क्षेत्र में नजर नहीं आ रहे थे। कम वर्षा के कारण बजहां ताल सूखा हुआ है। मझौली सागर में कम पानी होने के बावजूद इनकी फिर से उपस्थिति से जाहिर हो रहा है कि यहां का वातावरण पक्षियों के लिए बेहद अनुकूल है। उनके रहने, खाने, स्वछंद विचरण करने, विकास करने की पूरी संभावना है। इसे आधार बनाकर पक्षी विशेषज्ञों ने रिपोर्ट बनाई है, जिसे जल्द ही वन विभाग को सौंपने की तैयारी है।
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वन विभाग के निमंत्रण पर पहुंचे पक्षी विशेषज्ञों ने दो दिन तक जिले के प्राकृतिक वातावरण के अध्ययन के बाद इसकी रिपोर्ट तैयार कर ली है। जल्द ही वह रिपोर्ट वन विभाग को सौंपेंगे, जिसके बाद विभाग उसे शासन तक पहुंचाएंगा। भगवान बुद्ध की क्रीड़ास्थली कपिलवस्तु हिमालय की तराई में स्थित है।
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मैदानी क्षेत्र का अंतिम और पर्वतीय क्षेत्र की शुरुआत यहीं से होती है। लिहाजा प्रचूर प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर इस क्षेत्र में दोनों तरह का वातावरण मौजूद है। सर्दी में जब पहाड़ों पर बर्फ जमनी तेज होती है तो उस क्षेत्र में पाए जाने वाले पक्षी मैदानी इलाकों का रूख कर लेते हैं।
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हजारों किमी की दूरी तय कर आने वाले पक्षियों के लिए कपिलवस्तु का मझौली सागर प्रमुख शरणस्थली रही है। यही कारण भी रहा है कि यहां पक्षी विहार बनाने की जरूरत अरसे से महसूस की जाती रही है। इन संभावनाओं को अब ताजा सर्वेक्षण से बल मिले हैं। वन विभाग के विशेष आमंत्रण पर पहुंची पक्षी विशेषज्ञों की दो सदस्यीय टीम ने क्षेत्र में दो दिनों तक रहकर पक्षियों की गणना की है।
इस दौरान स्थानीय पक्षियों के अलावा लेसर एड्ज्यूमेंट भी गिने गए हैं।
सारस की तरह दिखने वाले लंबी चोंच वाले यह पक्षी पिछले दो वर्षों से इस क्षेत्र में नजर नहीं आ रहे थे। कम वर्षा के कारण बजहां ताल सूखा हुआ है। मझौली सागर में कम पानी होने के बावजूद इनकी फिर से उपस्थिति से जाहिर हो रहा है कि यहां का वातावरण पक्षियों के लिए बेहद अनुकूल है। उनके रहने, खाने, स्वछंद विचरण करने, विकास करने की पूरी संभावना है। इसे आधार बनाकर पक्षी विशेषज्ञों ने रिपोर्ट बनाई है, जिसे जल्द ही वन विभाग को सौंपने की तैयारी है।