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Siddharthnagar News: अनुमान नहीं, आंकड़े बताएंगे हवा कितनी साफ

Wed, 22 Jul 2026 11:32 PM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर Updated Wed, 22 Jul 2026 11:32 PM IST
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Statistics, not estimates, will reveal how clean the air is.
संवाद न्यूज एजेंसी
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सिद्धार्थनगर। तराई के सिद्धार्थनगर में अब लोग जिस हवा में सांस ले रहे हैं, उसकी गुणवत्ता का वैज्ञानिक आंकलन होगा। उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूपीपीसीबी) ने सिद्धार्थ विश्वविद्यालय, कपिलवस्तु में परिवेशीय वायु गुणवत्ता (एंबिएंट एयर क्वालिटी) मॉनिटरिंग स्टेशन शुरू करने की प्रक्रिया तेज कर दी है।
स्टेशन पर पीएम-2.5, पीएम-10 (पार्टिकुलेट मैटर) समेत वायु प्रदूषकों की नियमित निगरानी की जाएगी और इसके आंकड़े केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) तथा यूपीपीसीबी को भेजे जाएंगे। इससे पहली बार जिले में हवा की गुणवत्ता का प्रमाणिक और नियमित वैज्ञानिक रिकॉर्ड तैयार होगा।
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यूपीपीसीबी के क्षेत्रीय अधिकारी माहिर हुसैन ने तीन जुलाई को विश्वविद्यालय के रसायन विज्ञान विभागाध्यक्ष और परियोजना के प्रधान अन्वेषक प्रो. (डॉ.) लक्ष्मण सिंह को भेजे पत्र में बस्ती क्षेत्रीय कार्यालय से परिवेशीय वायु गुणवत्ता अनुश्रवण के लिए आवंटित उपकरण तत्काल प्राप्त कर उनका संचालन शुरू करने के निर्देश दिए हैं। पत्र में कहा गया है कि मॉनिटरिंग से प्राप्त सभी आंकड़े निर्धारित प्रारूप में नियमित रूप से केंद्रीय और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को उपलब्ध कराए जाएं।
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इसके बाद परियोजना के प्रधान अन्वेषक प्रो. लक्ष्मण सिंह ने जिला प्रशासन से भी सहयोग मांगा है। उन्होंने कैलिब्रेटेड पीएम-10 और पीएम-2.5 मॉनिटरिंग उपकरणों का शीघ्र हस्तांतरण कराने का अनुरोध किया है, ताकि स्वीकृत परियोजना के अनुसार समय पर मॉनिटरिंग शुरू की जा सके।

सिद्धार्थनगर जैसे तराई जिले में अब तक वायु गुणवत्ता का कोई नियमित स्थानीय वैज्ञानिक डाटा उपलब्ध नहीं था। ऐसे में यह स्पष्ट नहीं हो पाता था कि मौसम, धूल, ईंट-भट्ठों, सड़क निर्माण, डीजल वाहनों या अन्य स्रोतों का हवा पर कितना असर पड़ रहा है। मॉनिटरिंग स्टेशन शुरू होने के बाद जिले की हवा का पहला वैज्ञानिक डाटाबेस तैयार होगा। इससे प्रदूषण की वास्तविक स्थिति सामने आएगी और प्रशासन के लिए प्रदूषण नियंत्रण की रणनीति बनाना, स्वास्थ्य विभाग के लिए संवेदनशील वर्गों को समय पर सलाह जारी करना और शोध व पर्यावरणीय योजनाओं के लिए विश्वसनीय आधार उपलब्ध होगा।
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