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Siddharthnagar News: सिद्धार्थनगर की बेटियों ने क्रिकेट को बनाया जुनून, आसमान में उड़ने की चाहत में मैदान पर बहा रहीं पसीना
Wed, 07 Jan 2026 12:17 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
Updated Wed, 07 Jan 2026 12:17 AM IST
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जिला स्पोर्ट्स स्टेडियम में क्रिकेट की प्रैक्टिस करती बच्ची। संवाद
- फोटो : 1
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- नेट्स पर घंटों पसीना बहा रही हैं जिले की बेटियां, क्रिकेट को खेल नहीं बल्कि करियर के रूप में ले रहीं
सिद्धार्थनगर। जबसे भारतीय महिला टीम ने महिला वनडे वर्ल्ड कप 2025 का खिताब जीता है, तब से देश की बेटियों का रुझान तेजी से क्रिकेट की ओर बढ़ा है। अब वह क्रिकेट को केवल खेल के रूप में न लेकर करियर के रूप में ले रही हैं। इसमें सिद्धार्थनगर की बेटियां भी किसी से पीछे नहीं हैं। वह घंटों मैदान पर जमकर पसीना बहा रही हैं।
जिले की बेटियां टीम इंडिया की ऑलराउंडर शेफाली वर्मा और दिग्गज सलामी बल्लेबाज स्मृति मंधाना की तरह बनना चाहती हैं। प्रशिक्षक बताते हैं कि क्रिकेट अकादमी के नेट्स में जिले की बेटियां घंटों प्रैक्टिस करती हैं। इनका सबसे पहला लक्ष्य अंडर-14 की टीम में शामिल होना है। इसके लिए ये अपना बचपन भुलाकर गेंद और बल्ले को ही अपना दोस्त बना लिया है। वे कहती हैं कि उनका लक्ष्य सिर्फ हरमनप्रीत कौर, जेमिमा रोड्रिग्स, स्मृति मंधाना और शेफाली वर्मा जैसा बनना नहीं, बल्कि अपनी अलग पहचान बनाना भी है। यहां की बेटियों के सामने बेलवा शोहरतगढ़ की ऋद्धि सिंह जैसी मिसाल है, जो बड़ोदरा क्रिकेट एसोसिएशन की तरफ से इन दिनों अंडर-19 टीम की उप कप्तान के तौर पर खेल रही हैं।
तीन महीने से स्टेडियम में प्रशिक्षण ले रहीं लेफ्ट आर्म मीडियम पेसर शिवांगी गौड़ ने बताया कि उनके लिए क्रिकेट केवल एक खेल नहीं है, वह उसे एक करियर के रूप में ले रही हैं। इसी लक्ष्य को लेकर आगे बढ़ रही हैं। पिछले एक साल से क्रिकेट का प्रशिक्षण ले रहीं 11 साल की निधि यादव के पिता राकेश यादव ने बताया कि उसे क्रिकेट का जैसे जुनून हो। उसे यह शौक आठ वर्ष की उम्र से ही लग गया था। उसकी रुचि देखकर क्रिकेट में ही आगे बढ़ाने का फैसला लिया। निधि कहती हैं कि वह देश के लिए खेलना चाहती हैं।
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महज सात वर्ष की एंद्री मोदनवाल पर क्रिकेट का जैसे भूत सवार हो गया हो। कोच विपिन त्रिपाठी बताते हैं कि उनके पिता शैलेंद्र मोदनवाल उसे लेकर ट्रेनिंग दिलाने आए तो मैं सोच में पड़ गया, लेकिन एंद्री के भीतर आत्मविश्वास और क्रिकेट के प्रति जुनून देखकर हामी भर दी। तीन महीने के प्रशिक्षण में उसे कई बार चोट लगी, लेकिन वह घबराई नहीं। कोच विवेक का कहना है कि सिद्धार्थनगर की इन बच्चियों में सीखने की भूख है। तकनीक के साथ-साथ वे गेम अवेयरनेस और मानसिक मजबूती पर भी काम कर रही हैं। हार को बहाना नहीं, सीख मानने का रवैया उन्हें आगे ले जा रहा है।
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सिद्धार्थनगर। जबसे भारतीय महिला टीम ने महिला वनडे वर्ल्ड कप 2025 का खिताब जीता है, तब से देश की बेटियों का रुझान तेजी से क्रिकेट की ओर बढ़ा है। अब वह क्रिकेट को केवल खेल के रूप में न लेकर करियर के रूप में ले रही हैं। इसमें सिद्धार्थनगर की बेटियां भी किसी से पीछे नहीं हैं। वह घंटों मैदान पर जमकर पसीना बहा रही हैं।
जिले की बेटियां टीम इंडिया की ऑलराउंडर शेफाली वर्मा और दिग्गज सलामी बल्लेबाज स्मृति मंधाना की तरह बनना चाहती हैं। प्रशिक्षक बताते हैं कि क्रिकेट अकादमी के नेट्स में जिले की बेटियां घंटों प्रैक्टिस करती हैं। इनका सबसे पहला लक्ष्य अंडर-14 की टीम में शामिल होना है। इसके लिए ये अपना बचपन भुलाकर गेंद और बल्ले को ही अपना दोस्त बना लिया है। वे कहती हैं कि उनका लक्ष्य सिर्फ हरमनप्रीत कौर, जेमिमा रोड्रिग्स, स्मृति मंधाना और शेफाली वर्मा जैसा बनना नहीं, बल्कि अपनी अलग पहचान बनाना भी है। यहां की बेटियों के सामने बेलवा शोहरतगढ़ की ऋद्धि सिंह जैसी मिसाल है, जो बड़ोदरा क्रिकेट एसोसिएशन की तरफ से इन दिनों अंडर-19 टीम की उप कप्तान के तौर पर खेल रही हैं।
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तीन महीने से स्टेडियम में प्रशिक्षण ले रहीं लेफ्ट आर्म मीडियम पेसर शिवांगी गौड़ ने बताया कि उनके लिए क्रिकेट केवल एक खेल नहीं है, वह उसे एक करियर के रूप में ले रही हैं। इसी लक्ष्य को लेकर आगे बढ़ रही हैं। पिछले एक साल से क्रिकेट का प्रशिक्षण ले रहीं 11 साल की निधि यादव के पिता राकेश यादव ने बताया कि उसे क्रिकेट का जैसे जुनून हो। उसे यह शौक आठ वर्ष की उम्र से ही लग गया था। उसकी रुचि देखकर क्रिकेट में ही आगे बढ़ाने का फैसला लिया। निधि कहती हैं कि वह देश के लिए खेलना चाहती हैं।
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महज सात वर्ष की एंद्री मोदनवाल पर क्रिकेट का जैसे भूत सवार हो गया हो। कोच विपिन त्रिपाठी बताते हैं कि उनके पिता शैलेंद्र मोदनवाल उसे लेकर ट्रेनिंग दिलाने आए तो मैं सोच में पड़ गया, लेकिन एंद्री के भीतर आत्मविश्वास और क्रिकेट के प्रति जुनून देखकर हामी भर दी। तीन महीने के प्रशिक्षण में उसे कई बार चोट लगी, लेकिन वह घबराई नहीं। कोच विवेक का कहना है कि सिद्धार्थनगर की इन बच्चियों में सीखने की भूख है। तकनीक के साथ-साथ वे गेम अवेयरनेस और मानसिक मजबूती पर भी काम कर रही हैं। हार को बहाना नहीं, सीख मानने का रवैया उन्हें आगे ले जा रहा है।