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जिम्मेदार व्यस्त, आचार संहिता तोड़ने वाले मस्त
अमर उजाला ब्यूरो/ सिद्धार्थनगर
Updated Wed, 02 Dec 2015 11:17 PM IST
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पंचायत की प्रतिष्ठापरक कुर्सी पर अपना कब्जा जमाने के लिए प्रत्याशी कोई कसर नहीं छोड़ रहे। साम, दाम, दंड, भेद सहित हर तरह के हथकंडे अपनाए जा रहे हैं।
ऐन-केन प्रकारेण कुर्सी हथियाने की जुगत लगाई जा रही है। धनबल-बाहुबल के साथ मतदाताओं को तमाम तरह के प्रलोभन दिए जा रहे हैं। आम जनता की नजर में भले ही सब कुछ सरेआम हो, मगर प्रशासन को कुछ भी नजर नहीं आ रहा। खुलेआम आचार संहिता टूटने के बावजूद जिम्मेदार चुप्पी साधे हुए हैं। अफसरों की दलील है कि वह व्यस्त हैं। नतीजा आचार संहिता तोड़ने वाले भी मस्त पड़े हुए हैं।
पंचायत चुनाव की अधिसूचना जारी होने के साथ ही आदर्श आचार संहिता लागू हो गई है। इसके प्रभावी होने के बाद प्रत्याशियों पर तमाम तरह के प्रतिबंध लग गए हैं।
मसलन, पोस्टर-बैनर, लाउडस्पीकर, जुलूस जैसे प्रचार-प्रसार के साधन का सीमित इस्तेमाल ही हो सकता है। मतदाताओं को प्रलोभन नहीं दिया जा सकता और न ही वोट के लिए डराया-धमकाया जा सकता है। शराब-पैसा वितरण, दावतों का आयोजन सब कुछ प्रतिबंधित है। इसे सीधे तौर पर आचार संहिता का उल्लंघन मानते हुए कार्रवाई की जानी है। जुबानी तौर पर जिले में भी इसे लागू किया गया है, मगर धरातल पर इसका पालन कराने में अफसर भी रूचि नहीं दिखा रहे। ग्रामीण क्षेत्रों में शराब का वितरण लगातार हो रहा है।
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इसमें बड़ी मात्रा में कम खर्चीली कच्ची व नकली शराब का इस्तेमाल हो रहा है। गोरखपुर जैसी बड़ी घटना होने के बाद भी प्रशासन आचार संहिता के पालन को लेकर गंभीर नहीं दिख रहा। ऐसे मामलों को रोकने को ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे हैं। उच्चाधिकारी शिकायतों को निचले स्तर के अफसरों को प्रेषित कर रहे हैं, जहां से कोरमपूर्ति कर रफा-दफा कर लिया जा रहा है।
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ऐन-केन प्रकारेण कुर्सी हथियाने की जुगत लगाई जा रही है। धनबल-बाहुबल के साथ मतदाताओं को तमाम तरह के प्रलोभन दिए जा रहे हैं। आम जनता की नजर में भले ही सब कुछ सरेआम हो, मगर प्रशासन को कुछ भी नजर नहीं आ रहा। खुलेआम आचार संहिता टूटने के बावजूद जिम्मेदार चुप्पी साधे हुए हैं। अफसरों की दलील है कि वह व्यस्त हैं। नतीजा आचार संहिता तोड़ने वाले भी मस्त पड़े हुए हैं।
पंचायत चुनाव की अधिसूचना जारी होने के साथ ही आदर्श आचार संहिता लागू हो गई है। इसके प्रभावी होने के बाद प्रत्याशियों पर तमाम तरह के प्रतिबंध लग गए हैं।
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मसलन, पोस्टर-बैनर, लाउडस्पीकर, जुलूस जैसे प्रचार-प्रसार के साधन का सीमित इस्तेमाल ही हो सकता है। मतदाताओं को प्रलोभन नहीं दिया जा सकता और न ही वोट के लिए डराया-धमकाया जा सकता है। शराब-पैसा वितरण, दावतों का आयोजन सब कुछ प्रतिबंधित है। इसे सीधे तौर पर आचार संहिता का उल्लंघन मानते हुए कार्रवाई की जानी है। जुबानी तौर पर जिले में भी इसे लागू किया गया है, मगर धरातल पर इसका पालन कराने में अफसर भी रूचि नहीं दिखा रहे। ग्रामीण क्षेत्रों में शराब का वितरण लगातार हो रहा है।
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इसमें बड़ी मात्रा में कम खर्चीली कच्ची व नकली शराब का इस्तेमाल हो रहा है। गोरखपुर जैसी बड़ी घटना होने के बाद भी प्रशासन आचार संहिता के पालन को लेकर गंभीर नहीं दिख रहा। ऐसे मामलों को रोकने को ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे हैं। उच्चाधिकारी शिकायतों को निचले स्तर के अफसरों को प्रेषित कर रहे हैं, जहां से कोरमपूर्ति कर रफा-दफा कर लिया जा रहा है।