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नारद मोह के जीवंत मंचन से मंत्रमुग्ध हुए श्रद्धालु
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भनवापुर ब्लाक क्षेत्र के सहिजवार में रामलीला में झांकी का मंचन करते कलाकार। संवाद
- फोटो : SIDDHARTHNAGAR
नारद मोह के जीवंत मंचन से मंत्रमुग्ध हुए श्रद्धालु
भनवापुर। ब्लॉक क्षेत्र के सहिजवार में नौ दिवसीय लक्ष्मी पूजा एवं रामलीला समारोह के पहले दिन कलाकारों ने नारद मोह से श्रीरामजन्म तक का मंचन किया। नारद मोह के जीवंत मंचन से श्रद्धालु मंत्रमुग्ध हो गए।
श्रीरामलीला में नारद उत्तम स्थान पर बैठकर भगवान हरि की तपस्या करने लगते हैं, जिस कारण भगवान इंद्र का सिंहासन हिलने लगता है। इंद्र को मालूम पड़ता है कि नारद की तपस्या से उनका सिंहासन हिल रहा है। उनकी तपस्या भंग करने के लिए इंद्र देव अप्सराओं को भेजते हैं। रंभा, उर्वशी आदि अप्सराएं भी नारद की तपस्या भंग नहीं कर पातीं। उसके बाद भगवान इंद्र कामदेव को भेजते हैं। कामदेव नारद की तपस्या को भंग नहीं कर पाते हैं। नारद अपनी तपस्या को स्वयं विराम देते हैं और कामदेव को माफ कर देते हैं। इस कारण भगवान नारद को अभिमान आ जाता है कि मैंने काम और क्रोध को जीत लिया है, जबकि भगवान शंकर भी क्रोध पर विजय नहीं कर पाए थे।
मंचन में दिखाया गया कि भगवान अपने भक्त को कभी भी अभिमानी होना नहीं देखना चाहते हैं। भगवान विष्णु के प्रकट होने पर नारद ने उनसे हरि रूप मांगा तो उन्होंने नारद के अभिमान को खत्म करने के लिए नारद को हरि (विष्णु) रूप की जगह बंदर (हरि) का रूप प्रदान किया। वही रूप लेकर वह एक स्वयंवर में गए, जहां लोगों ने उनका खूब मजाक उड़ाया। तब उनको पता चला कि उनका रूप तो बंदर का है, जिससे नारद जी क्रोधित हो गए।
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उन्होंने भगवान को शाप दिया कि आने वाले समय में आप भी पत्नी के लिए वन-वन भटकेंगे, तब यही बंदर आपकी मदद करेंगे। इस अवसर पर समिति के निर्देशक रामप्रताप चौधरी, प्रदीप चौधरी, बुद्धि सागर, उत्तम प्रसाद, अकित, मनीष कुमार, बालगोविंद, रामजीत गिरी, रामजीत यादव, सूरज कुमार आदि मौजूद रहे।
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भनवापुर। ब्लॉक क्षेत्र के सहिजवार में नौ दिवसीय लक्ष्मी पूजा एवं रामलीला समारोह के पहले दिन कलाकारों ने नारद मोह से श्रीरामजन्म तक का मंचन किया। नारद मोह के जीवंत मंचन से श्रद्धालु मंत्रमुग्ध हो गए।
श्रीरामलीला में नारद उत्तम स्थान पर बैठकर भगवान हरि की तपस्या करने लगते हैं, जिस कारण भगवान इंद्र का सिंहासन हिलने लगता है। इंद्र को मालूम पड़ता है कि नारद की तपस्या से उनका सिंहासन हिल रहा है। उनकी तपस्या भंग करने के लिए इंद्र देव अप्सराओं को भेजते हैं। रंभा, उर्वशी आदि अप्सराएं भी नारद की तपस्या भंग नहीं कर पातीं। उसके बाद भगवान इंद्र कामदेव को भेजते हैं। कामदेव नारद की तपस्या को भंग नहीं कर पाते हैं। नारद अपनी तपस्या को स्वयं विराम देते हैं और कामदेव को माफ कर देते हैं। इस कारण भगवान नारद को अभिमान आ जाता है कि मैंने काम और क्रोध को जीत लिया है, जबकि भगवान शंकर भी क्रोध पर विजय नहीं कर पाए थे।
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मंचन में दिखाया गया कि भगवान अपने भक्त को कभी भी अभिमानी होना नहीं देखना चाहते हैं। भगवान विष्णु के प्रकट होने पर नारद ने उनसे हरि रूप मांगा तो उन्होंने नारद के अभिमान को खत्म करने के लिए नारद को हरि (विष्णु) रूप की जगह बंदर (हरि) का रूप प्रदान किया। वही रूप लेकर वह एक स्वयंवर में गए, जहां लोगों ने उनका खूब मजाक उड़ाया। तब उनको पता चला कि उनका रूप तो बंदर का है, जिससे नारद जी क्रोधित हो गए।
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उन्होंने भगवान को शाप दिया कि आने वाले समय में आप भी पत्नी के लिए वन-वन भटकेंगे, तब यही बंदर आपकी मदद करेंगे। इस अवसर पर समिति के निर्देशक रामप्रताप चौधरी, प्रदीप चौधरी, बुद्धि सागर, उत्तम प्रसाद, अकित, मनीष कुमार, बालगोविंद, रामजीत गिरी, रामजीत यादव, सूरज कुमार आदि मौजूद रहे।