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Siddharthnagar News: दावाें तक तटबंधों पर तैयारियां... हकीकत में इंतजाम अधूरे
Sat, 30 May 2026 01:49 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
Updated Sat, 30 May 2026 01:49 AM IST
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सिद्धार्थनगर। मानसून की दस्तक से पहले जिले के बाढ़ प्रभावित इलाकों में डर और बेचैनी बढ़ने लगी है। नदियों के जाल से घिरे जिले में हर साल आने वाली बाढ़ हजारों परिवारों के लिए तबाही लेकर आती रही है। इस बार भी सिंचाई विभाग बांधों की मरम्मत, रेनकट भरने और कटान रोधी कार्यों में जुटा है।
प्रशासन बाढ़ चौकियों, नाव के साथ राहत व्यवस्था की तैयारियां तेज करने का दावा कर रहा है लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और है। कई स्थानों पर बचाव कार्य अब भी अधूरे हैं। ऐसे में ग्रामीणों को आशंका है कि तेज बारिश और नदियों का बढ़ता दबाव एक बार फिर गांवों को संकट में डाल सकता है। कटोरेनुमा भौगोलिक बनावट वाले सिद्धार्थनगर में बूढ़ी राप्ती, राप्ती, बानगंगा, घोघी और कूड़ा समेत कई नदियां बरसात में उफान पर आ जाती हैं। इसका सबसे अधिक असर नौगढ़, शोहरतगढ़ और डुमरियागंज तहसील में पड़ता है जबकि बांसी और इटवा क्षेत्र भी बाढ़ की चपेट से अछूते नहीं रहते। बीते वर्षों में आई बाढ़ ने हजारों परिवारों को बेघर किया और किसानों की फसल को भारी नुकसान पहुंचाया था।
जिले के लोग अब भी वर्ष 1998 की भयावह बाढ़ को नहीं भूल पाए हैं। तब जिले के 2300 गांवों में से 1693 गांव बाढ़ से प्रभावित हुए थे। एक हजार से अधिक गांवों का संपर्क टूट गया था और करीब सात लाख की आबादी प्रभावित हुई थी। बाढ़ में 52 लोगों और पांच सौ से अधिक पशुओं की मौत हुई थी। इसके बाद भी कई वर्षों में आई बाढ़ ने बड़े पैमाने पर तबाही मचाई। तीन वर्ष पहले बांध टूटने के बाद पांच सौ से अधिक गांव जलमग्न हो गए थे। उसका क्षेत्र के कुआहाटा निवासी जगदीश ठकुराई कहते हैं कि बूढ़ी राप्ती का जलस्तर बढ़ा तो क्षतिग्रस्त बांध दबाव नहीं झेल पाएंगे और हालात फिर बिगड़ सकते हैं।
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बने हैं 454 किमी लंबे 39 बांध, लेकिन गैप बना मुसीबत : जिले में बाढ़ से बचाव के लिए सिंचाई विभाग ने विभिन्न नदियों के किनारे 454 किलोमीटर लंबे 39 बांध बनाए हैं। इसके बावजूद कई स्थानों पर अधूरे बांध और गैप हर साल तबाही का कारण बनते हैं। राप्ती नदी किनारे अधूरा पड़ा बांसी-डुमरियागंज बांध आज भी बड़ा खतरा बना हुआ है। भोजपुर-शाहपुर और छगड़िहवा-सोनबरसा बांध के गैप से भी कई गांवों में पानी घुस जाता है। हालांकि पहले फत्तेपुर और खजुरडाड़-अजगरा बांध के गैप से हर वर्ष गांव डूबते थे, जिन्हें अब भर दिया गया है।
कटान स्थलों पर अब भी अधूरे हैं बचाव कार्य : नदियों के किनारे कटान रोकने के लिए विभाग ने 39 स्थलों को चिह्नित कर कार्य कराया है, लेकिन कई संवेदनशील स्थान अब भी असुरक्षित हैं। उसका ब्लॉक के हथिवड़ताल गांव के तिवारीडीह टोला और जोगिया ब्लॉक के खजुरडाड़ गांव के पास कटान तेजी से हो रही है। यहां खेत, बाग और मकान नदी के किनारे पहुंच चुके हैं। ग्रामीणों का कहना है कि समय रहते बचाव कार्य नहीं हुआ तो इस बार कई परिवारों को घर छोड़ना पड़ सकता है।
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प्रशासन बाढ़ चौकियों, नाव के साथ राहत व्यवस्था की तैयारियां तेज करने का दावा कर रहा है लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और है। कई स्थानों पर बचाव कार्य अब भी अधूरे हैं। ऐसे में ग्रामीणों को आशंका है कि तेज बारिश और नदियों का बढ़ता दबाव एक बार फिर गांवों को संकट में डाल सकता है। कटोरेनुमा भौगोलिक बनावट वाले सिद्धार्थनगर में बूढ़ी राप्ती, राप्ती, बानगंगा, घोघी और कूड़ा समेत कई नदियां बरसात में उफान पर आ जाती हैं। इसका सबसे अधिक असर नौगढ़, शोहरतगढ़ और डुमरियागंज तहसील में पड़ता है जबकि बांसी और इटवा क्षेत्र भी बाढ़ की चपेट से अछूते नहीं रहते। बीते वर्षों में आई बाढ़ ने हजारों परिवारों को बेघर किया और किसानों की फसल को भारी नुकसान पहुंचाया था।
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जिले के लोग अब भी वर्ष 1998 की भयावह बाढ़ को नहीं भूल पाए हैं। तब जिले के 2300 गांवों में से 1693 गांव बाढ़ से प्रभावित हुए थे। एक हजार से अधिक गांवों का संपर्क टूट गया था और करीब सात लाख की आबादी प्रभावित हुई थी। बाढ़ में 52 लोगों और पांच सौ से अधिक पशुओं की मौत हुई थी। इसके बाद भी कई वर्षों में आई बाढ़ ने बड़े पैमाने पर तबाही मचाई। तीन वर्ष पहले बांध टूटने के बाद पांच सौ से अधिक गांव जलमग्न हो गए थे। उसका क्षेत्र के कुआहाटा निवासी जगदीश ठकुराई कहते हैं कि बूढ़ी राप्ती का जलस्तर बढ़ा तो क्षतिग्रस्त बांध दबाव नहीं झेल पाएंगे और हालात फिर बिगड़ सकते हैं।
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बने हैं 454 किमी लंबे 39 बांध, लेकिन गैप बना मुसीबत : जिले में बाढ़ से बचाव के लिए सिंचाई विभाग ने विभिन्न नदियों के किनारे 454 किलोमीटर लंबे 39 बांध बनाए हैं। इसके बावजूद कई स्थानों पर अधूरे बांध और गैप हर साल तबाही का कारण बनते हैं। राप्ती नदी किनारे अधूरा पड़ा बांसी-डुमरियागंज बांध आज भी बड़ा खतरा बना हुआ है। भोजपुर-शाहपुर और छगड़िहवा-सोनबरसा बांध के गैप से भी कई गांवों में पानी घुस जाता है। हालांकि पहले फत्तेपुर और खजुरडाड़-अजगरा बांध के गैप से हर वर्ष गांव डूबते थे, जिन्हें अब भर दिया गया है।
कटान स्थलों पर अब भी अधूरे हैं बचाव कार्य : नदियों के किनारे कटान रोकने के लिए विभाग ने 39 स्थलों को चिह्नित कर कार्य कराया है, लेकिन कई संवेदनशील स्थान अब भी असुरक्षित हैं। उसका ब्लॉक के हथिवड़ताल गांव के तिवारीडीह टोला और जोगिया ब्लॉक के खजुरडाड़ गांव के पास कटान तेजी से हो रही है। यहां खेत, बाग और मकान नदी के किनारे पहुंच चुके हैं। ग्रामीणों का कहना है कि समय रहते बचाव कार्य नहीं हुआ तो इस बार कई परिवारों को घर छोड़ना पड़ सकता है।