{"_id":"a83d5e4cd9ae3b6b21a5dfcb2d479212","slug":"not-a-head-office-in-11-villages-hindi-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"11 गांवों में प्रधान पद का कोई योग्य नहीं","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
11 गांवों में प्रधान पद का कोई योग्य नहीं
अमर उजाला ब्यूरो/ सिद्धार्थनगर
Updated Mon, 16 Nov 2015 11:19 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
जिले के 11 गांवों में इस बार कोई प्रधान नहीं चुना जा सकेगा। इन गांवों में ऐसा कोई भी योग्य व्यक्ति नहीं है, जो शासन की शर्तों को पूरा करते हुए प्रधान पद के लिए नामांकन कर सके। चौंकने की जरूरत नहीं है।
दरअसल, प्रशासन ने इन गांवों में प्रधान का पद अनुसूचित जन जाति के लिए आरक्षित कर दिया है। अब पूरे गांव में जब इस जाति का कोई परिवार ही नहीं है तो उम्मीदवार कहां से आएगा। इसे लापरवाही कहें या प्रशासनिक चूक, मगर खामियाजा अब पूरे गांव को भुगतना पड़ रहा है।
प्रधान बनने की ख्वाहिश रखने वालों की सारी उम्मीदें टूट गई हैं। प्रशासन भी मुश्किल में है। नई आरक्षण व्यवस्था पर इन गांवों का चुनाव कैसे होगा, किसी को नहीं सूझ रहा।
विज्ञापन
जिले के 14 ब्लॉकों में कुल 1199 ग्राम पंचायतें हैं। आरक्षण व्यवस्था के अनुसार गांव में सामान्य, पिछड़ी, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति की आबादी को ध्यान में रखते हुए वहां का प्रधान पद संबंधित श्रेणी के लिए आरक्षित किया जाना था। सर्वे करने निकले कर्मचारियों ने 11 गांवों में एसटी वर्ग की आबादी भी दर्शा दी।
नतीजा आरक्षण की प्रक्रिया शुरू हुई तो इन तीनों गांवों में प्रधान का आरक्षण एसटी वर्ग के हिस्से में चला गया। चुनावी दंगल में ताल ठोंकने को उत्साहित उम्मीदवार अब आरक्षण को लेकर माथा पीट रहे हैं।
कई सालों से वह अपनी चुनावी जमीन तैयार करने में जुटे हुए थे, अब आरक्षण अनुकूल न होने से उनकी सारी हसरतों पर पानी फिर गया है। इनकी परेशानी इसलिए भी अधिक है कि इस आरक्षण पर वह अपने किसी करीबी को भी उतारने की स्थिति में नहीं है।
आरक्षण बदलवाने के लिए काफी कोशिशें भी की गई हैं, मगर कोई सफलता नहीं मिली। चुनावी समर शुरू होने के बाद जहां अन्य गांवों में जोड़-तोड़ की रणनीतियां बन रही हैं, वहीं इन गांवों में सन्नाटा पसरा हुआ है। अगला प्रधान कौन होगा, इसे लेकर ग्रामीण संशय में है।
जिला निर्वाचन अधिकारी डॉ. सुरेन्द्र कुमार ने बताया कि रैपिड सर्वे के दौरान गड़बड़ी के चलते ऐसी नौबत आई होगी। इस बारे में आयोग को अवगत करा दिया गया है। वहां से जो निर्देश मिलेंगे, उसके अनुरूप चुनावी प्रक्रिया संचालित कराई जाएगी।
विज्ञापन
दरअसल, प्रशासन ने इन गांवों में प्रधान का पद अनुसूचित जन जाति के लिए आरक्षित कर दिया है। अब पूरे गांव में जब इस जाति का कोई परिवार ही नहीं है तो उम्मीदवार कहां से आएगा। इसे लापरवाही कहें या प्रशासनिक चूक, मगर खामियाजा अब पूरे गांव को भुगतना पड़ रहा है।
विज्ञापन
प्रधान बनने की ख्वाहिश रखने वालों की सारी उम्मीदें टूट गई हैं। प्रशासन भी मुश्किल में है। नई आरक्षण व्यवस्था पर इन गांवों का चुनाव कैसे होगा, किसी को नहीं सूझ रहा।
विज्ञापन
जिले के 14 ब्लॉकों में कुल 1199 ग्राम पंचायतें हैं। आरक्षण व्यवस्था के अनुसार गांव में सामान्य, पिछड़ी, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति की आबादी को ध्यान में रखते हुए वहां का प्रधान पद संबंधित श्रेणी के लिए आरक्षित किया जाना था। सर्वे करने निकले कर्मचारियों ने 11 गांवों में एसटी वर्ग की आबादी भी दर्शा दी।
नतीजा आरक्षण की प्रक्रिया शुरू हुई तो इन तीनों गांवों में प्रधान का आरक्षण एसटी वर्ग के हिस्से में चला गया। चुनावी दंगल में ताल ठोंकने को उत्साहित उम्मीदवार अब आरक्षण को लेकर माथा पीट रहे हैं।
कई सालों से वह अपनी चुनावी जमीन तैयार करने में जुटे हुए थे, अब आरक्षण अनुकूल न होने से उनकी सारी हसरतों पर पानी फिर गया है। इनकी परेशानी इसलिए भी अधिक है कि इस आरक्षण पर वह अपने किसी करीबी को भी उतारने की स्थिति में नहीं है।
आरक्षण बदलवाने के लिए काफी कोशिशें भी की गई हैं, मगर कोई सफलता नहीं मिली। चुनावी समर शुरू होने के बाद जहां अन्य गांवों में जोड़-तोड़ की रणनीतियां बन रही हैं, वहीं इन गांवों में सन्नाटा पसरा हुआ है। अगला प्रधान कौन होगा, इसे लेकर ग्रामीण संशय में है।
जिला निर्वाचन अधिकारी डॉ. सुरेन्द्र कुमार ने बताया कि रैपिड सर्वे के दौरान गड़बड़ी के चलते ऐसी नौबत आई होगी। इस बारे में आयोग को अवगत करा दिया गया है। वहां से जो निर्देश मिलेंगे, उसके अनुरूप चुनावी प्रक्रिया संचालित कराई जाएगी।