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Siddharthnagar News: कोटिया बार्डर तस्करों का लांचिंग प्वाइंट... पिकअप से पार कर रहे यूरिया
Fri, 06 Dec 2024 11:21 PM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
Updated Fri, 06 Dec 2024 11:21 PM IST
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एसएसबी कोटिया के गिरफ्त में खाद के साथ आराोपी।
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सिद्धार्थनगर। नेपाल में मांग बढ़ी तो यूरिया की जिले से तस्कर बढ़ गई। तस्कर सेटिंग वाली दुकानों से यूरिया उठा रहे हैं। मोटी रमक कमाने के लिए साइकिल और बाइक से कम बड़े वाहनों से ढोने का काम शुरू कर दिए हैं। मौजूदा समय में कोटिया बार्डर तस्करों के लिए लांचिंग प्वाइंट बन गया है। क्योंकि पांच दिन में दो पिकअप से 100 बोरी यूरिया पकड़ी गई। इसके अलावा बढ़नी से पुलिस और एसएसबी की ओर से सक्रियता दिखाते हुए खेप पकड़ी गई।
नेपाल से जुड़े लोगों की मानें तो पूरी रात इस समय यूरिया बार्डर पार करने का कार्य हो रहा है। कोटिया में सक्रियता के कारण तस्कर पकड़ लिए जा रहे हैं। अन्य स्थानों पर न पकड़ा जाना कहीं न कहीं कार्यशैली पर सवाल खड़ा कर रहा है। क्याेंकि, नेपाल के सीमावर्ती इलाके में प्रर्याप्त मात्रा में यूरिया मिल रहा है। एक बोरी की कीमत 800 से 1000 रुपये लग रहा है। वहीं, भारतीय सीमावर्ती क्षेत्र के किसानों का कहना है कि जैसे डीएपी के लिए परेशान हुए थे, अब यूरिया के लिए समितियों का चक्कर लगाना पड़ेगा।
जिले की 68 किलोमीटर सीमा नेपाल से लगती है जो पूरी तरह से खुली हुई है। सीमा खुली इसलिए है कि जिससे दोनों देश के लोग आराम से आ और जा सकें। कभी यह सीमा रिश्तों की डोर मजबूत बनाने के लिए थी। लेकिन आज यह तस्करों के कमाई का जरिया बन चुका है। दोनों देशों में जिस वस्तु या पदार्थ की मांग बढ़ती है उसकी पूर्ति तस्करी के जरिए करते हैं। इसमें तस्करों की मोटी कमाई होती है। जिले में डीएपी की मांग शुरु होने से पहले ही बार्डर पार कर दिया और किसानों को एक-एक बोरी के लिए परेशान होना पड़ा। अब यूरिया की तस्करी ने जोड़ पकड़ा है।
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क्षेत्र के किसानों के मुताबिक सीमावर्ती क्षेत्र में उवर्रक के दुकान और गोदाम अलग-अलग बने हैं। जहां से तस्करों की सेटिंग हैं, दुकान से लाइन में मिलती है और रुपये जमा होता है। इसके बाद गोदाम से खाद दी जाती है। भोर और शाम ढलते समय साइकिल, बाइक और रात में पिकअप से बार्डर पार कर देते हैं। 266 की यूरिया निजी दुकान वाले 400 रुपये तक दे रहे हैं। वही खाद के बार्डर पार पहुंचने के बाद 800-1000 रुपये प्रति बोरी की दर से बिक रही है। इस बात से तस्कर का अंदाजा लगा सकते हैं कि पांच दिन में एसएसबी और पुलिस बढ़नी क्षेत्र और कोटिया बार्डर से 100 बोरी से अधिक यूरिया पकड़ चुकी है।
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पांच दिन में पकड़ी गई यूरिया
27 नवंबर को एसएसबी ने नौ बोरी डीएपी और यूरिया पकड़ा। इसके बाद 29 नवंबर को कोटिया से एसएसबी 50 बोरी यूरिया के साथ एक पिकअप चाल को पकड़ा था। उसी दिन ढेबरुआ पुलिस ने पांच आठ बोरी यूरिया के साथ पांच नेपाली नागरिकों को पकड़ा। एक नवंबर से ककरहवा बार्डर से तीन बोरी यूरिया पकड़ा था। अब पांच दिसंबर एसएसबी कोटिया की टीम ने पिकअप में लदी में 42 बोरी यूरिया के साथ एक को पकड़ा। इसके अलावा तस्करी के अन्य मामले आए हैं।
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बार्डर पर काम नहीं करती है मशीन
सीमावर्ती क्षेत्र में खाद की तस्करी नहीं रुकने के पीछे से सबसे बड़ी समस्या यह है कि यहां ई-पाॅश मशीन काम नहीं करता है। उसी की आड़ में बड़े किसानों के नाम पर एक साथ कई बोरी खाद रजिस्टर में दर्ज कर देते हैं। इसके बाद वह खाद तस्करों के हाथ बेच देते हैं। रजिस्टर की चेकिंग में रिपोर्ट भी सही रहता है और काम भी हो जाता है। इसमें छोटे किसानों की उपयोग नहीं करते हैं। क्योंकि रकबे की जांच में पकड़े जा सकते हैं। इसलिए क्षेत्र के बड़े किसानों की आड़ में खाद खपा लेते हैं। अगर मशीन काम करता तो रिकाॅर्ड ऑनलाइन दिखता।
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इतनी खाद होती है आवंटित
आकड़ाें के मुताबिक जिले में लगभग डेढ़ लाख हेक्टेयर भूमि पर गेहूं की खेती होती है। आंकड़ों के मुताबिक इतने रकबे के लिए 10687 मीट्रिक टन डीएपी, 6211 मीट्रिक टन एनपीके, एमओपी 1381 मीट्रिक, सुपर फास्फेट 20899 मीट्रिक टन। जबकि, यूरिया 47 हजार मीट्रिक टन लक्ष्य है। इसमें 27 हजार एमटी, निजी दुकानों और समितियों को आवंटित किया जा चुका है।
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नेपाल से जुड़े लोगों की मानें तो पूरी रात इस समय यूरिया बार्डर पार करने का कार्य हो रहा है। कोटिया में सक्रियता के कारण तस्कर पकड़ लिए जा रहे हैं। अन्य स्थानों पर न पकड़ा जाना कहीं न कहीं कार्यशैली पर सवाल खड़ा कर रहा है। क्याेंकि, नेपाल के सीमावर्ती इलाके में प्रर्याप्त मात्रा में यूरिया मिल रहा है। एक बोरी की कीमत 800 से 1000 रुपये लग रहा है। वहीं, भारतीय सीमावर्ती क्षेत्र के किसानों का कहना है कि जैसे डीएपी के लिए परेशान हुए थे, अब यूरिया के लिए समितियों का चक्कर लगाना पड़ेगा।
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जिले की 68 किलोमीटर सीमा नेपाल से लगती है जो पूरी तरह से खुली हुई है। सीमा खुली इसलिए है कि जिससे दोनों देश के लोग आराम से आ और जा सकें। कभी यह सीमा रिश्तों की डोर मजबूत बनाने के लिए थी। लेकिन आज यह तस्करों के कमाई का जरिया बन चुका है। दोनों देशों में जिस वस्तु या पदार्थ की मांग बढ़ती है उसकी पूर्ति तस्करी के जरिए करते हैं। इसमें तस्करों की मोटी कमाई होती है। जिले में डीएपी की मांग शुरु होने से पहले ही बार्डर पार कर दिया और किसानों को एक-एक बोरी के लिए परेशान होना पड़ा। अब यूरिया की तस्करी ने जोड़ पकड़ा है।
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क्षेत्र के किसानों के मुताबिक सीमावर्ती क्षेत्र में उवर्रक के दुकान और गोदाम अलग-अलग बने हैं। जहां से तस्करों की सेटिंग हैं, दुकान से लाइन में मिलती है और रुपये जमा होता है। इसके बाद गोदाम से खाद दी जाती है। भोर और शाम ढलते समय साइकिल, बाइक और रात में पिकअप से बार्डर पार कर देते हैं। 266 की यूरिया निजी दुकान वाले 400 रुपये तक दे रहे हैं। वही खाद के बार्डर पार पहुंचने के बाद 800-1000 रुपये प्रति बोरी की दर से बिक रही है। इस बात से तस्कर का अंदाजा लगा सकते हैं कि पांच दिन में एसएसबी और पुलिस बढ़नी क्षेत्र और कोटिया बार्डर से 100 बोरी से अधिक यूरिया पकड़ चुकी है।
पांच दिन में पकड़ी गई यूरिया
27 नवंबर को एसएसबी ने नौ बोरी डीएपी और यूरिया पकड़ा। इसके बाद 29 नवंबर को कोटिया से एसएसबी 50 बोरी यूरिया के साथ एक पिकअप चाल को पकड़ा था। उसी दिन ढेबरुआ पुलिस ने पांच आठ बोरी यूरिया के साथ पांच नेपाली नागरिकों को पकड़ा। एक नवंबर से ककरहवा बार्डर से तीन बोरी यूरिया पकड़ा था। अब पांच दिसंबर एसएसबी कोटिया की टीम ने पिकअप में लदी में 42 बोरी यूरिया के साथ एक को पकड़ा। इसके अलावा तस्करी के अन्य मामले आए हैं।
बार्डर पर काम नहीं करती है मशीन
सीमावर्ती क्षेत्र में खाद की तस्करी नहीं रुकने के पीछे से सबसे बड़ी समस्या यह है कि यहां ई-पाॅश मशीन काम नहीं करता है। उसी की आड़ में बड़े किसानों के नाम पर एक साथ कई बोरी खाद रजिस्टर में दर्ज कर देते हैं। इसके बाद वह खाद तस्करों के हाथ बेच देते हैं। रजिस्टर की चेकिंग में रिपोर्ट भी सही रहता है और काम भी हो जाता है। इसमें छोटे किसानों की उपयोग नहीं करते हैं। क्योंकि रकबे की जांच में पकड़े जा सकते हैं। इसलिए क्षेत्र के बड़े किसानों की आड़ में खाद खपा लेते हैं। अगर मशीन काम करता तो रिकाॅर्ड ऑनलाइन दिखता।
इतनी खाद होती है आवंटित
आकड़ाें के मुताबिक जिले में लगभग डेढ़ लाख हेक्टेयर भूमि पर गेहूं की खेती होती है। आंकड़ों के मुताबिक इतने रकबे के लिए 10687 मीट्रिक टन डीएपी, 6211 मीट्रिक टन एनपीके, एमओपी 1381 मीट्रिक, सुपर फास्फेट 20899 मीट्रिक टन। जबकि, यूरिया 47 हजार मीट्रिक टन लक्ष्य है। इसमें 27 हजार एमटी, निजी दुकानों और समितियों को आवंटित किया जा चुका है।