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सिंचाई संसाधन भरपूर, फिर भी पानी टेल से दूर
ब्यूरो/अमर उजाला सिद्धार्थनगर
Updated Mon, 16 Jan 2017 11:08 PM IST
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अंबेडकरनगर की शारदा नहर में नहीं बचा पानी।
- फोटो : अमर उजाला
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सिद्धार्थनगर। कृषि प्रधान जिले का भला हो भी तो कैसे। जब यहां खेतों के सिंचाई की व्यवस्था की बदहाल है। नहरें क्षतिग्रस्त हैं या फिर सूखी हुई हैं। उनमें टेल तक पानी नहीं पहुंच पा रहा। ट्यूबवेल व पंप कैनाल बिजली अव्यवस्था से ठप हैं। ऐसे में किसानों के पास निजी संसाधनों से सिंचाई ही मुख्य सहारा है। वर्षा की अनिश्चितता के दौर में किसान हर साल अपनी मेहनत को बर्बाद होते देखने को मजबूर हैं। सिंचाई के क्षेत्र में यहां बड़े काम की जरूरत है। अब तक किसी भी दल या नेता ने इस ओर दिलचस्पी नहीं दिखाई है। सिंचाई की समस्या विधानसभा चुनाव में किसानों के लिए अहम मुद्दा है।
कहने को तो जिले में नहरों का जाल बिछा है। राप्ती, बूढ़ी राप्ती, बानगंगा, कूड़ा, घोघी जैसी नदियां जिले से होकर गुजरती हैं। मगर संसाधनों की बदहाली से किसानों को इनका भरपूर लाभ नहीं मिल पा रहा। नदियों से निकली ज्यादातर नहरें जर्जर और उपेक्षित हैं। सिल्ट से पटी इन नहरों में टेल तक पानी पहुंचा पाना दूर की कौड़ी है। सरजू नहर खंड की बलरामपुर व बस्ती से निकली शाखाओं का बड़ा हिस्सा जिले से गुजरता है। इन बड़ी नहरों से निकली दर्जनों अल्पिकाओं की हालत भी बदतर है।
हेड पर दो-तीन किमी तक तो पानी पहुंचता, मगर टेल के 90 फीसदी किसान पूरे सीजन नहरों में पानी की बाट जोहते रह जाते हैं। इटवा क्षेत्र सेमरी रजवाहा, ऊंचडीह रजवाहा, सोहना शाखा सहित पिपरा, कटया, करहीं, बलुआ, अकडेंगवा, पथरहिया, मदनपुर अल्पिकाओं का हाल कमोवेश एक सा है। काला नमक की खेती को बढ़ावा देने के लिए ब्रिटिश काल में 12 सागर व ताल बनाए गए थे। इनसे भी नहरें निकाल कर खेतों तक पानी पहुंचाने की व्यवस्था की गई थी। देख-रेख के अभाव में तालाब और सागर में पानी नहीं ठहरता तो नहरें भी अस्तित्व बचाने को जूझ रही हैं।
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इटवा। नहर है पर पानी नहीं और जहां पानी है वहां खेत ऊंचे हैं। जिले के किसान ऐसे ही दुश्वारियों से जूझ रहे हैं। हेड पर ही नहरों की बदहाली और झाड़-झंखाड़ के चलते पानी टेल तक नहीं पहुंच पा रहा। किसान इस पीड़ा को वर्षों से सहते आ रहे हैं, मगर सुनवाई न होने से बेबस बने हुए हैं। अब उन्हें मौका मिला है तो चुनावी मंच पर इसे जोर-शोर से उठाने को तैयार हैं। किसानों का कहना है कि वह प्रत्याशियों से टेल तक पानी पहुंचाने का जवाब मांगेंगे। इस पर खरा उतरने वालों को ही वोट करेंगे। बलुआ अल्पिका से जुड़े मल्हवार निवासी राजदेव मिश्र का कहना है कि नहरों की मरम्मत के नाम पर सिर्फ धन का बंदरबाट होता है। किसानों को कोई लाभ नहीं मिलता। नेता भी हमारी समस्या में रुचि नहीं दिखाते। पिपरा अल्पिका के किसान देवी प्रसाद का कहना है कि हेड के एक-दो किमी तक ही पानी आता है।
टेल के किसानों के लिए नहर से सिंचाई तो सपना है। जब नहर में पानी नहीं है तो खेती कैसे करें। कृषि भूमि भी बेकार हो रही है। ऊंचडीह रजवाहा से जुड़े किसान रमेश तिवारी, गड़ावर के रंजन पांडेय, रामगुलाम का कहना है कि किसानों के बूते ही नेताओं को कुर्सी मिलती है, मगर सिंचाई संसाधनों की बदहाली का मुद्दा कभी भी उनके एजेंडे में नहीं रहा। किसान बदहाल रहेंगे तो जनता खुशहाल कैसे होगी। विकास के मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए खेती को बेहतर बनाना जरूरी है। इसके लिए नेताओं को अपनी प्रतिबद्धता दिखानी ही होगी।
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कहने को तो जिले में नहरों का जाल बिछा है। राप्ती, बूढ़ी राप्ती, बानगंगा, कूड़ा, घोघी जैसी नदियां जिले से होकर गुजरती हैं। मगर संसाधनों की बदहाली से किसानों को इनका भरपूर लाभ नहीं मिल पा रहा। नदियों से निकली ज्यादातर नहरें जर्जर और उपेक्षित हैं। सिल्ट से पटी इन नहरों में टेल तक पानी पहुंचा पाना दूर की कौड़ी है। सरजू नहर खंड की बलरामपुर व बस्ती से निकली शाखाओं का बड़ा हिस्सा जिले से गुजरता है। इन बड़ी नहरों से निकली दर्जनों अल्पिकाओं की हालत भी बदतर है।
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हेड पर दो-तीन किमी तक तो पानी पहुंचता, मगर टेल के 90 फीसदी किसान पूरे सीजन नहरों में पानी की बाट जोहते रह जाते हैं। इटवा क्षेत्र सेमरी रजवाहा, ऊंचडीह रजवाहा, सोहना शाखा सहित पिपरा, कटया, करहीं, बलुआ, अकडेंगवा, पथरहिया, मदनपुर अल्पिकाओं का हाल कमोवेश एक सा है। काला नमक की खेती को बढ़ावा देने के लिए ब्रिटिश काल में 12 सागर व ताल बनाए गए थे। इनसे भी नहरें निकाल कर खेतों तक पानी पहुंचाने की व्यवस्था की गई थी। देख-रेख के अभाव में तालाब और सागर में पानी नहीं ठहरता तो नहरें भी अस्तित्व बचाने को जूझ रही हैं।
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इटवा। नहर है पर पानी नहीं और जहां पानी है वहां खेत ऊंचे हैं। जिले के किसान ऐसे ही दुश्वारियों से जूझ रहे हैं। हेड पर ही नहरों की बदहाली और झाड़-झंखाड़ के चलते पानी टेल तक नहीं पहुंच पा रहा। किसान इस पीड़ा को वर्षों से सहते आ रहे हैं, मगर सुनवाई न होने से बेबस बने हुए हैं। अब उन्हें मौका मिला है तो चुनावी मंच पर इसे जोर-शोर से उठाने को तैयार हैं। किसानों का कहना है कि वह प्रत्याशियों से टेल तक पानी पहुंचाने का जवाब मांगेंगे। इस पर खरा उतरने वालों को ही वोट करेंगे। बलुआ अल्पिका से जुड़े मल्हवार निवासी राजदेव मिश्र का कहना है कि नहरों की मरम्मत के नाम पर सिर्फ धन का बंदरबाट होता है। किसानों को कोई लाभ नहीं मिलता। नेता भी हमारी समस्या में रुचि नहीं दिखाते। पिपरा अल्पिका के किसान देवी प्रसाद का कहना है कि हेड के एक-दो किमी तक ही पानी आता है।
टेल के किसानों के लिए नहर से सिंचाई तो सपना है। जब नहर में पानी नहीं है तो खेती कैसे करें। कृषि भूमि भी बेकार हो रही है। ऊंचडीह रजवाहा से जुड़े किसान रमेश तिवारी, गड़ावर के रंजन पांडेय, रामगुलाम का कहना है कि किसानों के बूते ही नेताओं को कुर्सी मिलती है, मगर सिंचाई संसाधनों की बदहाली का मुद्दा कभी भी उनके एजेंडे में नहीं रहा। किसान बदहाल रहेंगे तो जनता खुशहाल कैसे होगी। विकास के मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए खेती को बेहतर बनाना जरूरी है। इसके लिए नेताओं को अपनी प्रतिबद्धता दिखानी ही होगी।