{"_id":"6250765113a63f59e374a913","slug":"giving-art-skills-to-children-along-with-education-siddharthnagar-news-gkp4326936110","type":"story","status":"publish","title_hn":"शिक्षा के साथ बच्चों को दे रहे कला का हुनर","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
शिक्षा के साथ बच्चों को दे रहे कला का हुनर
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
शिक्षा के साथ बच्चों को दे रहे कला का हुनर
सिद्धार्थनगर। कोरोना संक्रमण के दो साल के खराब दौर के बाद खुले विद्यालयों में पढ़ाई के प्रति बच्चों में विशेष उत्साह है। वहीं शिक्षकों ने भी अध्यापन का तरीका बदल दिया है। संक्रमण काल में लगी पाबंदियों के कारण स्कूल बंद और कुछ बच्चे अवसाद की चपेट आ गए थे। अब स्कूल फिर से खुलने के बाद शिक्षक बच्चों को अवसाद से लड़ने के लिए तैयार कर रहे हैं। वे किताबी ज्ञान के साथ उन्हें विभिन्न प्रकार की कला का हुनर सिखा रहे हैं ताकि उनकी जीवन शैली में खुश रहने की आदत शामिल हो जाए।
कोरोना संक्रमण काल में सबसे उपयोगी साबित हुए परिषदीय विद्यालयों के शिक्षक ज्यादा सक्रिय हैं ताकि उनके विद्यालयों के बच्चे दो साल तक बंद रही पढ़ाई की पूर्ति कर सकें। शिक्षा का कोर्स पूरा करने के साथ वे बच्चों का समूह बनाकर उन्हें संगीत, नृत्य, अंताक्षरी, चित्रकला, पेंटिंग एवं इंडोर गेम से जोड़ रहे हैं। मानसिक रोग विशेषज्ञों के अनुसार अब भी कुछ बच्चे अवसादग्रस्त हैं। शिक्षकों का मानना है कि बच्चे अकेले में रहते हुए भी खुश रहने की कला सीख लेंगे तो वे चुनौतीपूर्ण दौर में भी अवसाद की चपेट में नहीं आएंगे। बेसिक शिक्षा विभाग के अंतर्गत संचालित 2,262 परिषदीय विद्यालयों में 3,34,497 बच्चे पंजीकृत हैं। शिक्षण के साथ कला के प्रशिक्षण के कारण बच्चों की रुचि बढ़ गई है, जबकि प्रधानाध्यापक, सहायक अध्यापक, शिक्षामित्र एवं अनुदेशकों की संख्या 9,261 है।
कोरोना संक्रमण काल में बच्चों सहित सभी को समाज से अलग रहना पड़ा। उस दौर में कुछ बच्चे अवसादग्रस्त हो गए। जिनके अंदर संगीत, नृत्य या अन्य प्रतिभा थी, उन्होंने खुद को अकेला नहीं महसूस किया। जीवन में विषम परिस्थितियों में खुश रहने के लिए कला की बड़ी भूमिका है। बच्चों का कला से जोड़ने के लिए विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
विज्ञापन
- कलीमुल्लाह, प्रधानाध्यापक
कोरोना काल के बाद विद्यालय खुले तो बच्चों को ज्यादा रचि के साथ पढ़ने की आवश्यकता है। जिन बच्चों की जिस कला में रुचि है, उसे उससे जोड़ा जा रहा है। बच्चे खुश रहेंगे तो अवसाद का असर नहीं पड़ेगा। एक घंटी में कला सीखने वाले बच्चों की शिक्षा में भी रुचि ज्यादा है। बच्चों को व्यावहारिक ज्ञान दिया जा रहा है ताकि वे चुनौतियों से लड़ने में सक्षम हों।
- वंदना त्रिपाठी, प्रभारी प्रधानाध्यापक
बाल संसद के गठन के बाद बच्चों को हमेशा खुश रहने के तरीके सिखाए जा रहे हैं। नाटक और गीत की प्रस्तुति कराई जा रही है। सांस्कृतिक कार्यक्रम में समाज की कुरीतियों से दूर रहने की प्रेरणा दी जा रही है, इसमें बच्चों को सामाजिक सरोकार की भी प्रेरणा भी दी जाती है। प्रत्येक सप्ताह विभिन्न प्रकार की कला प्रतियोगिता कराई जा रहीं हैं।
- सुषमा मिश्रा, सहायक अध्यापक
शिक्षा के साथ विद्यालय में रचनात्मक क्रिया कलाप आयोजित किए जा रहें हैं। 100 दिन के रीडिंग कैंपेन के साथ बच्चों को कला से जोड़ा जा रहा है। कोरोना काल में बच्चे कुछ बच्चे अवसाद में आए होंगे, इसे देखते हुए बेहतर शिक्षा देना शिक्षक की जिम्मेदारी है। बच्चों को चुनौतियों से लड़ने के लिए शिक्षक भी ज्यादा सक्रिय हैं, सभी चाहते हैं कि उनके विद्यालय के बच्चे ज्यादा सफल हों।
- कैलाशमणि त्रिपाठी, प्रधानाध्यापक
ओपीडी में पहुंच रहे हैं अवसादग्रस्त बच्चे
माधव प्रसाद त्रिपाठी मेडिकल कॉलेज के डॉ. अफजल बताते हैं कि ओपीडी में पहुंचने वाले मरीजों में बच्चे भी अवसादग्रस्त मिल रहे हैं। मेडिकल कॉलेज से संबद्ध जिला अस्पताल की ओपीडी में प्रतिदिन 4-5 बच्चे अवसाद वाले मिल रहे हैं। इनमें 40 फीसदी बच्चों में सिर दर्द, पढ़ाई में मन नहीं लगने, गुमसुम रहने और चिड़चिड़ापन के लक्षण मिल रहे हैं। अभिभावकों को चाहिए कि बच्चों के स्वभाव में परिवर्तन हो तो चिकित्सक की सलाह जरूर लें। अभिभावकों को चाहिए कि बच्चों को बेहतर जीवन शैली अपनाने के लिए प्रेरित करें। जीवन में योग, व्यायाम और कला महत्वपूर्ण है।
विज्ञापन
सिद्धार्थनगर। कोरोना संक्रमण के दो साल के खराब दौर के बाद खुले विद्यालयों में पढ़ाई के प्रति बच्चों में विशेष उत्साह है। वहीं शिक्षकों ने भी अध्यापन का तरीका बदल दिया है। संक्रमण काल में लगी पाबंदियों के कारण स्कूल बंद और कुछ बच्चे अवसाद की चपेट आ गए थे। अब स्कूल फिर से खुलने के बाद शिक्षक बच्चों को अवसाद से लड़ने के लिए तैयार कर रहे हैं। वे किताबी ज्ञान के साथ उन्हें विभिन्न प्रकार की कला का हुनर सिखा रहे हैं ताकि उनकी जीवन शैली में खुश रहने की आदत शामिल हो जाए।
कोरोना संक्रमण काल में सबसे उपयोगी साबित हुए परिषदीय विद्यालयों के शिक्षक ज्यादा सक्रिय हैं ताकि उनके विद्यालयों के बच्चे दो साल तक बंद रही पढ़ाई की पूर्ति कर सकें। शिक्षा का कोर्स पूरा करने के साथ वे बच्चों का समूह बनाकर उन्हें संगीत, नृत्य, अंताक्षरी, चित्रकला, पेंटिंग एवं इंडोर गेम से जोड़ रहे हैं। मानसिक रोग विशेषज्ञों के अनुसार अब भी कुछ बच्चे अवसादग्रस्त हैं। शिक्षकों का मानना है कि बच्चे अकेले में रहते हुए भी खुश रहने की कला सीख लेंगे तो वे चुनौतीपूर्ण दौर में भी अवसाद की चपेट में नहीं आएंगे। बेसिक शिक्षा विभाग के अंतर्गत संचालित 2,262 परिषदीय विद्यालयों में 3,34,497 बच्चे पंजीकृत हैं। शिक्षण के साथ कला के प्रशिक्षण के कारण बच्चों की रुचि बढ़ गई है, जबकि प्रधानाध्यापक, सहायक अध्यापक, शिक्षामित्र एवं अनुदेशकों की संख्या 9,261 है।
विज्ञापन
कोरोना संक्रमण काल में बच्चों सहित सभी को समाज से अलग रहना पड़ा। उस दौर में कुछ बच्चे अवसादग्रस्त हो गए। जिनके अंदर संगीत, नृत्य या अन्य प्रतिभा थी, उन्होंने खुद को अकेला नहीं महसूस किया। जीवन में विषम परिस्थितियों में खुश रहने के लिए कला की बड़ी भूमिका है। बच्चों का कला से जोड़ने के लिए विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
विज्ञापन
- कलीमुल्लाह, प्रधानाध्यापक
कोरोना काल के बाद विद्यालय खुले तो बच्चों को ज्यादा रचि के साथ पढ़ने की आवश्यकता है। जिन बच्चों की जिस कला में रुचि है, उसे उससे जोड़ा जा रहा है। बच्चे खुश रहेंगे तो अवसाद का असर नहीं पड़ेगा। एक घंटी में कला सीखने वाले बच्चों की शिक्षा में भी रुचि ज्यादा है। बच्चों को व्यावहारिक ज्ञान दिया जा रहा है ताकि वे चुनौतियों से लड़ने में सक्षम हों।
- वंदना त्रिपाठी, प्रभारी प्रधानाध्यापक
बाल संसद के गठन के बाद बच्चों को हमेशा खुश रहने के तरीके सिखाए जा रहे हैं। नाटक और गीत की प्रस्तुति कराई जा रही है। सांस्कृतिक कार्यक्रम में समाज की कुरीतियों से दूर रहने की प्रेरणा दी जा रही है, इसमें बच्चों को सामाजिक सरोकार की भी प्रेरणा भी दी जाती है। प्रत्येक सप्ताह विभिन्न प्रकार की कला प्रतियोगिता कराई जा रहीं हैं।
- सुषमा मिश्रा, सहायक अध्यापक
शिक्षा के साथ विद्यालय में रचनात्मक क्रिया कलाप आयोजित किए जा रहें हैं। 100 दिन के रीडिंग कैंपेन के साथ बच्चों को कला से जोड़ा जा रहा है। कोरोना काल में बच्चे कुछ बच्चे अवसाद में आए होंगे, इसे देखते हुए बेहतर शिक्षा देना शिक्षक की जिम्मेदारी है। बच्चों को चुनौतियों से लड़ने के लिए शिक्षक भी ज्यादा सक्रिय हैं, सभी चाहते हैं कि उनके विद्यालय के बच्चे ज्यादा सफल हों।
- कैलाशमणि त्रिपाठी, प्रधानाध्यापक
ओपीडी में पहुंच रहे हैं अवसादग्रस्त बच्चे
माधव प्रसाद त्रिपाठी मेडिकल कॉलेज के डॉ. अफजल बताते हैं कि ओपीडी में पहुंचने वाले मरीजों में बच्चे भी अवसादग्रस्त मिल रहे हैं। मेडिकल कॉलेज से संबद्ध जिला अस्पताल की ओपीडी में प्रतिदिन 4-5 बच्चे अवसाद वाले मिल रहे हैं। इनमें 40 फीसदी बच्चों में सिर दर्द, पढ़ाई में मन नहीं लगने, गुमसुम रहने और चिड़चिड़ापन के लक्षण मिल रहे हैं। अभिभावकों को चाहिए कि बच्चों के स्वभाव में परिवर्तन हो तो चिकित्सक की सलाह जरूर लें। अभिभावकों को चाहिए कि बच्चों को बेहतर जीवन शैली अपनाने के लिए प्रेरित करें। जीवन में योग, व्यायाम और कला महत्वपूर्ण है।