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Siddharthnagar News: हर साल बेघर करती है बूढ़ी राप्ती, 25 घरौंदे फिर तबाही के मुहाने पर

Wed, 27 May 2026 12:42 AM IST
Gorakhpur Bureau गोरखपुर ब्यूरो
Updated Wed, 27 May 2026 12:42 AM IST
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Every year, Budhi Rapti leaves people homeless, 25 homes on the verge of destruction again.
बाढ़ बढ़ाती है बेचैनी : बीते वर्षों में उसका क्षेत्र के हथिवड़ताल गांव में 16 मकान समा चुके हैं नदी में
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सिद्धार्थनगर। मानसून के दिन जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं हथिवड़ताल गांव स्थित तिवारीडीह टोला के लोगों की बेचैनी बढ़ने लगी है। हर वर्ष बाढ़ और नदी कटान की त्रासदी झेल रहे ग्रामीणों को इस बार भी आशियाने उजड़ने का डर सता रहा है। बीते वर्षों में 16 से अधिक मकान नदी में समा चुके हैं जिससे कई परिवार बेघर होकर विस्थापित हो गए। 25 से अधिक मकान तबाही के मुहाने पर खड़े हैं। यह हाल तब है बूढ़ी राप्ती की बाढ़ से बचाव के नाम पर हर साल लंबा बजट खर्च होता है। लोगों का कहना है कि हर साल प्रशासन से गुहार लगाने के बावजूद स्थायी समाधान नहीं हो पाया है।
ग्रामीणों का कहना है कि लखनापार बांध और बूढ़ी राप्ती के बीच स्थित तिवारीडीह टोला के किनारे सिंचाई विभाग द्वारा मनरेगा के तहत तीन वर्ष पूर्व बांध पर कटानरोधी कार्य कराया गया था लेकिन अब बांध पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुका है। सुरक्षा के लिए लगाए गए बोल्डर और अन्य संरचनाएं बह चुकी हैं जिससे नदी का रास्ता साफ हो गया है। ग्रामीणों को आशंका है कि यदि समय रहते प्रभावी बचाव कार्य नहीं कराए गए तो इस बार मानसून में कई और घर नदी में समा सकते हैं। लोगों ने प्रशासन और सिंचाई विभाग से तत्काल कटान रोकने के लिए ठोस कदम उठाने की मांग की है। हथिवड़ताल निवासी पूर्व क्षेत्र पंचायत सदस्य घनश्याम कहते हैं कि दिन हो या रात हर समय नदी के पानी पर ही नजर रहती है। कब उफान आ जाए और यहां से पलायन करना पड़े इसका अंदाजा लगाना मुश्किल होता है। हम लोगों ने पलायन की तैयारी शुरू कर दी है।
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ग्रामीण बोले- अब तो यह नियति है हमारी
वर्तमान में हथिवड़ताल के शैलेंद्र नाथ त्रिपाठी, महेश, रघुवीर, बाबूराम, महावीर, शिवप्रसाद, अकाले और घनश्याम के मकान के करीब से नदी बह रही है। ग्रामीणों को हर समय यह भय सताता रहता है कि कहीं उनका मकान भी नदी में न समा जाए। इसी गांव के रहने वाले अधिवक्ता वीरेंद्र नाथ त्रिपाठी का कहना है कि हर साल बाढ़ और कटान की विभीषिका यहां के लोगों की नियति बन चुकी है। बाढ़ के दौरान कई परिवारों को पलायन के लिए मजबूर होना पड़ता है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो इस बार मानसून में कई परिवार बेघर हो सकते हैं।
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विस्थापन का झेल रहे दर्द
कटान से साधुसरन, नरोत्तम, मोहरत, शोहरत, कौशल, दशरथ, चंद्रिका, भुवाल, पुजारी, कन्हैया, अंबिका व राजाराम के घर नदी में विलीन हो चुके हैं। इनमें मोहरत, दशरथ, सोहरत, कन्हैया, भुवाल, दिनेश ने तो बांध के किनारे ही अपना आशियाना बना लिया है। वहीं कटान से बेघर हुए साधुसरन और कौशल भी दूसरी जगह अपना ठिकाना बनाने को मजबूर हो गए। जबकि कुछ लोगों ने नगर पंचायत उसका बाजार और आसपास के इलाके में घर बना लिया है।
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इन गांवों ने भी झेली है पीड़ा
बाढ़ की मार से उसका क्षेत्र के छितरापार, जोगिया के फत्तेपुर और टलडिहवा गांवों में भारी तबाही हो चुकी है। बीते वर्षों में इन गांवों के डेढ़ सौ से अधिक परिवारों के घर नदी में समा गए, जिससे लोग बेघर होकर पलायन को मजबूर हुए। सबसे अधिक प्रभावित छितरापार गांव रहा जहां 100 से अधिक मकान नदी की भेंट चढ़ चुके हैं। छितरापार निवासी परमेश्वर और रामकीरत यादव बताते हैं कि घर नदी में समा जाने के बाद उन्हें दूसरे स्थान पर बसना पड़ा। हर साल कटान का दायरा बढ़ता जा रहा है, जिससे ग्रामीणों में डर और असुरक्षा का माहौल बना रहता है। वहीं नदी के किनारे बसे संगलदीप और अमरिया गांव भी कटान की चपेट में आ चुके हैं। यहां भी कई मकान नदी में विलीन हो जाने से परिवार बेघर हो चुके हैं। ग्रामीणों ने प्रशासन से स्थायी कटानरोधी कार्य कराने की मांग की है।
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सिंचाई विभाग का तर्क-सीधे सुरक्षा देना संभव नहीं
सिंचाई विभाग का कहना है कि विभागीय स्तर पर केवल बांधों की सुरक्षा के लिए ही कटानरोधी कार्य कराए जाते हैं। ऐसे में नदी और बांध के बीच बसे तिवारीडीह टोला को विभागीय परियोजना के तहत सीधे सुरक्षा देना संभव नहीं है। हालांकि, विभाग के अधिकारियों ने यह जरूर कहा कि मनरेगा अथवा वर्तमान में संचालित वीबी-जीरामजी योजना के तहत यहां कटानरोधी कार्य कराए जा सकते हैं।



जहां भी जरूरत होगी, काम कराए जाएंगे
सभी संवेदनशील स्थलों पर बचाव एवं मरम्मत कार्य कराए गए हैं। वर्तमान में कई कटान स्थलों पर कार्य कराए जा रहे है। जहां भी जरूरत होगी विभागीय नियमों के अनुसार सुरक्षा की दृष्टि से कार्य कराए जाएंगे। इसमें किसी प्रकार की लापरवाही नहीं की जा रही है।
- कृपाशंकर भारती, अधिशासी अभियंता, ड्रेनेज खंड
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