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क्या पता था बिटिया अब नहीं लौटेगी
Tue, 01 Jan 2019 11:24 PM IST
राकेश पांडेय
siddharthnagar
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Published by: राकेश पांडेय
Updated Tue, 01 Jan 2019 11:24 PM IST
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MURDER
- फोटो : self
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सिद्धार्थनगर। बिटिया रविवार को हंसते-खिलखिलाते हुए घर से निकली थी, लेकिन हमें क्या पता था कि हमारी लाडली घर नहीं लौटेगी। उसे दरिदों की नजर लग गई। इतना कहते ही बिटिया की मां का गला रुंध गया और वह फफक कर रोने लगी।
पिता ने कहा कि हमें नहीं पता था कि कभी ऐसा दिन भी देखना पड़ेगा। जिसकी हंसी से हमारी सुबह होती थी, उसके साथ ऐसा होगा। उन्होंने कहा कि उनकी बेटी की जान लेने वालों को फांसी पर चढ़ा देना चाहिए। उन्होंने बेटी की इज्जत से खेलने की कोशिश की, लेकिन बेटी ने उनका पूरी ताकत से विरोध किया। जब वे कामयाब नहीं हुए तो तीनों ने मिलकर उसे मार डाला। ऐसे लोगों को कड़ी सजा मिलनी चाहिए। पिता ने बताया कि वह घर और बाहर हर काम में मदद करती थी। खाना बनाने से लेकर पशुओं को चारा देने और उन्हें चराने तक की जिम्मेदारी निभाती थी। रविवार को भी वह भैंस चराने गई थी। वह उनके लिए बेटे से कम नहीं थी। उन्होंने कहा कि हत्यारे गांव के ही हैं। पूरे दिन गांव में घूमते रहते थे। कौन जानता था कि ये इंसान नहीं, जानवर हैं। गांव में भी बिटिया के मौत से मातम छाया हुआ है। हर कोई आरोपियों को कड़ी सजा देने की मांग कर रहा है। साथ ही गांव के लोग बिटिया की बहादुरी की चर्चा करते दिखे। उनका कहना था कि बेटी ने दरिंदों का मुकाबला किया। वे तीन थे और जब अपने नापाक इरादे में कामयाब नहीं हुए तो जान ले ली।
बदलता परिवेश बन रहा कारण
- पंडित दीन दयाल उपाध्याय विवि की मनोविज्ञान विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ .सुषमा पांडेय ने बताया कि बदलते परिवेश के कारण ऐसी घटनाएं हो रही हैं। यह निंदनीय है। मौजूदा दौर में मोबाइल का उपयोग बच्चों को और गलत संगत में डाल रहा है। 12-13 साल की उम्र में शरीर में बदलाव होता है। ऐसे समय में बच्चे विवेक का इस्तेमाल नहीं करते और गलत कर बैठते हैं।
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पिता ने कहा कि हमें नहीं पता था कि कभी ऐसा दिन भी देखना पड़ेगा। जिसकी हंसी से हमारी सुबह होती थी, उसके साथ ऐसा होगा। उन्होंने कहा कि उनकी बेटी की जान लेने वालों को फांसी पर चढ़ा देना चाहिए। उन्होंने बेटी की इज्जत से खेलने की कोशिश की, लेकिन बेटी ने उनका पूरी ताकत से विरोध किया। जब वे कामयाब नहीं हुए तो तीनों ने मिलकर उसे मार डाला। ऐसे लोगों को कड़ी सजा मिलनी चाहिए। पिता ने बताया कि वह घर और बाहर हर काम में मदद करती थी। खाना बनाने से लेकर पशुओं को चारा देने और उन्हें चराने तक की जिम्मेदारी निभाती थी। रविवार को भी वह भैंस चराने गई थी। वह उनके लिए बेटे से कम नहीं थी। उन्होंने कहा कि हत्यारे गांव के ही हैं। पूरे दिन गांव में घूमते रहते थे। कौन जानता था कि ये इंसान नहीं, जानवर हैं। गांव में भी बिटिया के मौत से मातम छाया हुआ है। हर कोई आरोपियों को कड़ी सजा देने की मांग कर रहा है। साथ ही गांव के लोग बिटिया की बहादुरी की चर्चा करते दिखे। उनका कहना था कि बेटी ने दरिंदों का मुकाबला किया। वे तीन थे और जब अपने नापाक इरादे में कामयाब नहीं हुए तो जान ले ली।
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बदलता परिवेश बन रहा कारण
- पंडित दीन दयाल उपाध्याय विवि की मनोविज्ञान विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ .सुषमा पांडेय ने बताया कि बदलते परिवेश के कारण ऐसी घटनाएं हो रही हैं। यह निंदनीय है। मौजूदा दौर में मोबाइल का उपयोग बच्चों को और गलत संगत में डाल रहा है। 12-13 साल की उम्र में शरीर में बदलाव होता है। ऐसे समय में बच्चे विवेक का इस्तेमाल नहीं करते और गलत कर बैठते हैं।
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