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मां भवानी को घर लाए राजा जय प्रताप
siddharthnagar
Updated Tue, 16 Oct 2018 11:01 PM IST
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बांसी में राप्ती तट से काली माता को लाते कैबिनेट मंत्री जयप्रताप सिंह
- फोटो : अमर उजाला
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बांसी। जनपद का ऐतिहासिक एवं पुरातत्व महत्व का बांसी राज घराने द्वारा बांसी नगर से मां भवानी को लाने की परंपरा को दूर-दराज ग्रामीण अंचलों के अलावा सुदूर क्षेत्र के लोग देखने आते हैं। बांसी राज घराने के वंशज प्रदेश के कैबिनेट मंत्री व क्षेत्रीय विधायक जयप्रताप सिंह शारदीय नवरात्र की सप्तमीं मंगलवार को नगर के श्यामनगर मोहल्ला निवासी विश्वंभर माली के घर से मां भवानी को लेने पुराने राजसी तरीके से पैदल चल कर राप्ती नदी पुल पर आए।
जहां माली से मां भवानी को लेकर पुन: पैदल लेकर राजमहल पहुंचे, वहां पूर्वजों द्वारा स्थापित मंदिर में उनकों सम्मान पूर्वक रखा गया और नवमी के दिन हवन-पूजन के बाद बलि दी जाएगी और मां भवानी का वहां उपस्थित सभी लोग दर्शन प्राप्त करेंगे। राजा जय प्रताप सिंह ने बताया कि यह परंपरा पूर्वजों द्वारा 100 साल के अधिक समय से होती रही है, जिसका निर्वहन आज भी उसी धार्मिक रीति रिवाज से किया जाता है। अनादिकाल से चली आ रही बांसी राजघराने की परंपरा का निर्वहन करते हुए बांसी रियासत हर वर्ष शारदीय नवरात्र के अवसर पर मां भवानी को लेने अस़्त्र-शस्त्र से सुसज्जित होकर नगर के श्यामनगर वार्ड के रहने वाले विशंभर माली के यहां पहुंचकर भवानी को ससम्मान लेने पहुंचता है।
उसी का निर्वहन करते हुए बांसी रियासत के चश्मों चिराग राजा जय प्रताप सिंह पूरे लाव-लश्कर के साथ सप्तमी के दिन मां भवानी को लेने राप्ती पुल के मध्य पहुंचते हैं। जहां से बांसी रियासत की फौज अस्त्र-शस्त्र से लैस होकर श्यामनगर वार्ड के विशंभर माली के यहा पहुंचकर मां भवानी को राजपुरोहित ईश्वर चंद्र पांडेय वैदिक मंत्रोच्चारण के बीच आमंत्रित कर राज महल चलने के लिए आमंत्रित करते हैं और इस तरह विशंभर माली का परिवार बैंड-बाजे व रियासत की फौज के साथ राप्ती पुल के मध्य इंतजार कर रहे क्षेत्रीय विधायक राजकुमार जय प्रताप सिंह को मां भवानी को सौंपते हैं। जहां से वह लेकर राज महल पहुंचकर पूरे श्रद्धा भाव व राजकीय सम्मान से मां भवानी का पूजा पाठ कर स्थापित करते हैं। इस दौरान विधायक जय प्रताप सिंह के छोटे पुत्र अभय प्रताप सिंह के अलावा बांसी राज घराने से जुड़े व उनके वशंजों के अलावा प्रभास्कर राय, शैलेंद्र दूबे, यदुनंदन सिंह, रंजीत सिंह, हरि प्रसाद सिंह, निखिल सिंह, संतोष, झाबर, सुरेश, राघवेंद्र प्रताप सिंह, नन्हे, विजयकांत चतुर्वेदी और भूपेश द्विवेदी मौजूद थे।
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जहां माली से मां भवानी को लेकर पुन: पैदल लेकर राजमहल पहुंचे, वहां पूर्वजों द्वारा स्थापित मंदिर में उनकों सम्मान पूर्वक रखा गया और नवमी के दिन हवन-पूजन के बाद बलि दी जाएगी और मां भवानी का वहां उपस्थित सभी लोग दर्शन प्राप्त करेंगे। राजा जय प्रताप सिंह ने बताया कि यह परंपरा पूर्वजों द्वारा 100 साल के अधिक समय से होती रही है, जिसका निर्वहन आज भी उसी धार्मिक रीति रिवाज से किया जाता है। अनादिकाल से चली आ रही बांसी राजघराने की परंपरा का निर्वहन करते हुए बांसी रियासत हर वर्ष शारदीय नवरात्र के अवसर पर मां भवानी को लेने अस़्त्र-शस्त्र से सुसज्जित होकर नगर के श्यामनगर वार्ड के रहने वाले विशंभर माली के यहां पहुंचकर भवानी को ससम्मान लेने पहुंचता है।
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उसी का निर्वहन करते हुए बांसी रियासत के चश्मों चिराग राजा जय प्रताप सिंह पूरे लाव-लश्कर के साथ सप्तमी के दिन मां भवानी को लेने राप्ती पुल के मध्य पहुंचते हैं। जहां से बांसी रियासत की फौज अस्त्र-शस्त्र से लैस होकर श्यामनगर वार्ड के विशंभर माली के यहा पहुंचकर मां भवानी को राजपुरोहित ईश्वर चंद्र पांडेय वैदिक मंत्रोच्चारण के बीच आमंत्रित कर राज महल चलने के लिए आमंत्रित करते हैं और इस तरह विशंभर माली का परिवार बैंड-बाजे व रियासत की फौज के साथ राप्ती पुल के मध्य इंतजार कर रहे क्षेत्रीय विधायक राजकुमार जय प्रताप सिंह को मां भवानी को सौंपते हैं। जहां से वह लेकर राज महल पहुंचकर पूरे श्रद्धा भाव व राजकीय सम्मान से मां भवानी का पूजा पाठ कर स्थापित करते हैं। इस दौरान विधायक जय प्रताप सिंह के छोटे पुत्र अभय प्रताप सिंह के अलावा बांसी राज घराने से जुड़े व उनके वशंजों के अलावा प्रभास्कर राय, शैलेंद्र दूबे, यदुनंदन सिंह, रंजीत सिंह, हरि प्रसाद सिंह, निखिल सिंह, संतोष, झाबर, सुरेश, राघवेंद्र प्रताप सिंह, नन्हे, विजयकांत चतुर्वेदी और भूपेश द्विवेदी मौजूद थे।
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